गुरुवार, 5 मार्च 2026

एक अधूरी ख्वाहिश तुमसे मुलाक़ात की

 कुछ दिनों पहले जानकारी मिली कि तुम जमशेदपुर आई हुई हो. हालांकि मैं अगस्त महीने के लिए इंतज़ार कर रहा था. कारण कि पिछले कुछ सालों से तुम अमूमन अगस्त महीने जमशेदपुर आ रही थी. अचानक फ़रवरी - मार्च के दौरान तुम्हारा इस शहर में मौजूद रहने की जानकारी मिलते ही न जाने क्यूँ ह्रदय में तुमसे एक बार फिर से मुलाक़ात की ख्वाहिश जाग गई. 

मैंने तुमसे मुलाक़ात की अर्जी भी लगा दी. इस बार मुलाकात की ख्वाहिश के साथ दोपहर का लंच भी करने की अर्जी लगाई. कई सारे इफ बट के साथ 5 मार्च की अर्जी मैंने लगाई क्यूंकि मिली जानकारी के अनुसार तुम 6 मार्च को जमशेदपुर से वापस जा रही थी. 

3 मार्च को ऑफिस जाते समय तुम्हारे लिए कुछ नमकीन ले लिए और ऑफिस में रख आया. 4 को ऑफिस की छुट्टी थी, दिन से लेकर रात तक होली के माहौल के बीच तुम्हें याद कर करके तुझसे मुलाक़ात की हसरत में गुजार दिए. 

5 मार्च, इस उम्मीद के साथ ऑफिस गया कि पता नहीं कब तुमसे मुलाक़ात का समय मुझे बताया जाये और मुझे तुरंत निकलना पड़े इसी इंतजार में एक-एक पल बोझ जैसे काटता रहा और पूरा दिन तुमसे मुलाक़ात की अधूरी ख्वाहिश में बीत गया. 

पिछले पांच छह दिनों से तुमसे मुलाक़ात की बेचैनी में एक एक पल काटना मुश्किल लग रहा था. आज जब 5 मार्च बीत चूका और कल 6 मार्च को तुम जमशेदपुर से वापस भी चली जाओगी, तुमसे मुलाक़ात की मेरी अधूरी ख्वाहिश यह सोचने को विवश कर रही है कि आखिर इस मुलाक़ात की ख्वाहिश का क्या औचित्य था? तुमने ने कभी भी (1994 से आजतक) मुझे पल भर के लिए भी अपनी जिंदगी के किसी पल का हिस्सा माना ही नहीं तो फिर मेरे ह्रदय में आखिर तुमसे मुलाक़ात की ख्वाहिश क्यूँ? मेरे एकतरफा रिश्ते को अब तुम्हारी जरुरत क्यूँ? 

(2026-1994) लगभग 32 वर्षो के पागलपन में आज भी तुम्हारे साथ एक लगाव का जुड़ा रहना अपने आप में एक सुखद एहसास दिलाता है. तुम जहाँ रहो खुश रहो, ईश्वर से यही कामना है. अपना ध्यान रखना. 

उम्र के इस पड़ाव में भी काफ़ी कुछ अनुभव प्राप्त हो रहा है. काश! तुम मुझे, मेरे एहसासों को समझ पाती!

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