शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

इश्वर, आत्मा और कुछ अनसुलझे रहस्य !

आत्मा, ना जन्म लेती है, ना ही मरती है, और ना ही उसे जलाकर नष्ट किया जा सकता है। ये वो सारी बातें हैं, जो हम गीता स्मरण के कारण जानते और मानतें हैं। हम हिन्दुस्तानी हैं, हम लिखी बातोंपर जल्द ही यकीं कर लेतें हैं और फ़िर हमारे वंशज उसी को मानते चले जातें हैं। हम हिन्दुस्तानी हैं, विश्वास करना हमारे रगों में है, किसी ने कुछ लिख दिया, किसी ने कुछ कह दिया बस हमने उसपर बिना कोई सवाल किए विश्वास कर लिया। हम रामायण से लेकर महाभारत तक तो सिर्फ़ मानकर विश्वास करते ही तो आ रहें हैं। हम शिव से लेकर रावण तक सिर्फ़ विश्वास के बल पर ही तो टिके हुए हैं। हमें हमारे माता-पिता ने बतलाया कि ब्रम्हा, बिष्णु, शिव, राम, हनुमान, गणेश, विश्वकर्मा, काली, दुर्गा आदि हमारे भाग्य विधाता हैं और हमने हिन्दुस्तानी का धर्म निभाते हुए ये मान लिए कि वे इश्वर हैं, हमारे भाग्य विधाता हैं। जब कोई विपत्ति कि बेला आई हमने उनका ध्यान करना आरम्भ कर दिया। बिना कोई सवाल किए हमने उनको इश्वर मानना आरम्भ कर दिया और फिर येही परम्परा बन स्थापित हो गई। ये ही दुहराव फिर हम भी अपने-अपने संतानों के साथ करेंगे, जो हमारे साथ किया गया।

हमारे हिंदू समाज में दशरथ पुत्र राम को ना सिर्फ़ इश्वर का दर्जा प्राप्त है अपितु उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम का सम्मान भी दिया जाता है। बचपन से लेकर आज तक मेरे अन्तःमन में राम के इश्वर और मर्यादा पुरुषोत्तम को लेकर कई सवाल उभरतें रहें हैं, किंतु आज तक किसी ने मेरे उन सवालों का मुझे संतुष्ट करने लायक जवाब नहीं दिया।

* अयोध्या में राम राज्य की स्थापना राजा राम ने नहीं बल्कि उनके छोटे भाई भरत ने की थी, और यह वो समय था जब राम वनवास में थे और उनके भाई भरत अयोध्या की बागडोर संभल रहे थे।
* बाली का वध राम ने छुपकर किया था वो भी सुग्रीव के निकटता के कारण जबकि सुग्रीव और बाली की निजी शत्रुता थी। छुपकर किया गया बाली का वध राम के इश्वर चरित्र और मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र को कलंकित करता है।
* लंका में अग्नि द्वारा अपनी पत्नी सीता के चरित्र का सत्यापन करने के बावजूद बिना बताये अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर उसे अपने भाई लक्ष्मण द्वारा जंगल में अकेला छोड़ देना उनके इश्वर चरित्र और मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र को कलंकित करता है।
और भी ऐसे कई उदहारण हैं जो राम के इश्वर और मर्यादा पुरुषोत्तम चरित्र के ऊपर प्रश्न अंकित करता है। येही कारण है की मैं व्यक्तिगत रूप से उन्हें इश्वर नहीं मानता।

ऐसे ही कई सवाल कृष्ण को इश्वर मानने से लेकर है। मुझे पता है यदि कोई इनके इश्वर चरित्र पर सवाल मात्र उठाए तो हमारे हिंदुस्तान तो मानो भूचाल ही आ जाएगा। क्या हमें हक़ नहीं अपनी परम्पराओं को सार्थक रूप देने का। क्या हमें हक़ नहीं विश्वास करने से पहले उसके बारे में जानने का।

हम आत्मा की बात करतें हैं। एतिहासिक संदर्भो के आधार पर हम मानते चले आ रहें है की ये अजन्मा है, ये अविनाशी है, ये अजर - अमर है। मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण कुछ अलग ही है।

* यदि आत्मा जन्म नही लेती तो फ़िर ये जनसँख्या निरंतर इतनी बढ़ क्यों रही है? नए लोग जो पैदा हो रहें हैं वे आत्माएं कहाँ से आ रहीं हैं?

इन्ही आत्मा-paramatmaon के कारण हम मनुष्यता को बिल्कुल ही भूलते जा रहें हैं। हम हिंदू हैं, वो मुस्लिम है, वो सिख है, वो इसाई है। क्या हो रहा है यहाँ? क्यों हो रहा है ये सब? कौन है इन सब के पीछे? एक सवाल मगर कोई जवाब नही :?
* कई गैर मुस्लिम लोग महज इस कारण की मांस कटाने वाला कोई मुस्लमान है, उससे मांस नहीं खरीदता, उनका मानना है की मुस्लिम मांस हलाल करके काटते हैं जिससे मरने वाला जानवर को धीरे धीरे करके मारा जाता है। मेरा ये मानना है की जानवर की किसी प्रकार से मारा जाए अंततः वो मारा तो जाता ही है, फिर उसके मारे जाने के तरीकों पर सवाल खड़े करना कहाँ तक शोभा देता है। एक तो आप जानवर के मृत शरीर के टुकड़े (मांस) को खाने जा रहें हैं और फिर ये भी सोचने बैठतें हैं की इसे कितनी पीडा से मारा गया है। है ना क्या दिलचस्प सवाल?

कई सवाल हैं मेरे अंतर्मन में जो जवाब की प्रतीक्षा में हैं।
आप अपने राय जरुर कमेन्ट में लिखें।

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

मुद्रास्फुर्ति और वास्तविक महंगाई

स्थानीय बाज़ारों में बदस्तूर बढ़ती हुई महंगाई ने आम लोगों के जीवन को नर्क सा बना दिया है। एक तरफ़ आंकडों की बाजीगरी में महंगाई की दर शुन्य से भी नीचेहै और दूसरी तरफ़ वास्तविक जीवन में महंगाई के मार से हर तरफ़ हर कोई परेशान सा है। महंगाई पर काबू करने की दिशा में कोई सार्थक प्रयत्न धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। आलू से लेकर चीनी तक हर कुछ आम आदमी के पहुँच के बाहर है। ना तो जमाखोरों पर लगाम लगनी की दिशा में कोई सार्थक प्रयास ही हो रहा है और ना ही बाज़ार के इस ऊँचे दामों का फायदा किसानों को ही मिल रहा है। कभी बारिश की कमी तो कभी मुसलाधार बारिश के कहर से परेशां आम किसान तो हर बार धोखा ही खाता है। ऊँचे तबके वाले किसानों की बैंक लोन माफ़ कर दी जाती है मगर उन छोटे छोटे किसानों का क्या तो घर के पैसों से खेती बारी करतें हैं और उन्हें कोई सरकारी सहायता तक नसीब नहीं होती।

शहर में बिक रही सब्जियों के भाव मंडियों से दुगुने और कुछ ही दूरीपर स्थित गाँव से चौगुनी होती है। कोई देखेवाला नहीं, कोई इस पर लगाम लगानेवाला नही। हर चीज की कालाबाजारी की जा रही है। बाज़ार में सामानों की कमी दिखाकर सामानों को गोदामों में भरा जाताहै लेकिन कोई इसे देखनेवाला नहीं। कोई इसपर लगाम लगाने वाला नहीं।

छठे वेतन आयोग की अनुशंषा पर सरकारी कार्मिकों का तो वेतन बढाया गया है लेकिन पूरे हिंदुस्तान में केवल सरकारी कर्मचारी ही तो नहीं रहतें हैं। उन आम लोगों का क्या जिनपर वेतन आयोग का दखल है ही नहीं।

जब तक जमाखोरों पर सख्ती से कारवाई नही की जायगी, जब तक धर पकड़ अभियान चलाकर अवैध गोदामों को सीलकरने की कारवाई नही की जायेगी और उन तमाम लोगों को चिन्हित कर उन पर सख्त कारवाई नहीं की जायेगी तब तक महंगाई की मार से आम आदमी मरता कराहता ही रहेगा।

बुधवार, 22 जुलाई 2009

जमशेदपुर में ट्रैफिक की समस्या

जमशेदपुर आज ट्रैफिक समस्याओं से बुरी तरस से ग्रसित है। मगर ना जाने क्यूंकिसी को इसकी परवाह नहीं है। चाहे बिस्टुपुर हो या स्टेशन एरिया या फिर साक्ची हो अथवा शहर के दुसरे इलाके हों सभी ट्रैफिक समस्यायों से बुरी तरह से ग्रसित हैं।

  • बिष्टुपुर एरिया के मेनरोड को देखकर तो ऐसा लगता है की ये कोई मुख्यसड़क नही होकर कोई पार्किंग एरिया है। पता नहीं कैसे लोग खुले तौरपर अपने दो पहिये और चार पहिये वाहन को निर्भीक होकर मुख्य सड़क पर पार्क कर रोजमर्रा के कार्य करने में लीनहो जातें हैं। कोई देखने वाला नहीं की वाहन मुख्य सड़क पर पार्क कर दी गयी है। और तो और मुख्य सड़क पर पार्क कराकर पार्किंग टैक्स की वसूली भी की जाती है। आज की तिथि में बिष्टुपुर एरिया के मुख्य सड़क का आधा भाग तो वाहनों के ही पार्किंग से भरा परा रहता है। समूचा बिस्टुपुर एरिया देखने से ही किसी पार्किंग स्थल सा प्रतीत होता है। कोई देखने वाला नहीं, कोई एक्शन लेने वाला नही।
  • कुछ इसी तरह के हालात साक्ची एरिया के भी हैं। जहाँ तहां खोमचे वाले, ठेले वाले, टेम्पू वाले अपने अपने मनमुताबिकजगह पर तैनात हैं। किसी को किसी की परवाह ही नहीं है। किसी को किसी का डर ही नहीं है। कोई देखनेवाला ही नहीं है। जहाँ से जिसको शार्टकट दिखता है वहीँ से अपना काम चला लेता है, किसी को किसी नियम से कोई सारोकार नहीं है। जिसको जहाँ बिज़नस दिखता हैंवो वोहीं अपनी दूकान लगा लेता हैं।
  • सबसे मजेदार नज़ारा तो रेलवे स्टेशन के ओवर ब्रिज से पहले का हैं। ओवर ब्रिज क्रॉस करने से पहले ट्रैफिक जाम का नज़ारा मिलना आम बात हैं। सब्जी वालों के समान टेम्पुओंमें यहाँ हमेशा ही लोड - अनलोड होते रहतें हैंजिसके कारण ट्रैफिक जाम रहता हैं। एक दो नहीं कई की संख्याओं में टेंपो मुख्य सड़क पर खड़ी रहती हैं और सब्जी वालों के सामान लोड - अनलोड बिना किसी रुकावट के दिन भर होते रहतें हैं। इसके ठीक आगे ओवर ब्रिज से ठीक पहले एक टेम्पू स्टैंड भी अपने बिज़नस को अंजाम तक पहुँचने का काम करतें हैं। पता नहीं क्यूंइस टेम्पू स्टैंड को आज तक इस जगह से कोई हटा नही पाया जबकि इससे ट्रैफिक की गंभीर समस्या उत्पन्न होती हैं। और तो और नो एंट्री समय में भी यहाँ से बड़ी गाड़ियों को पास कराया जाता हैं। ये सब देखकर तो लगता हैं की नए ओवर ब्रिज का जो फायदा आम लोगों को होना चाहिए वो आज तकआम लोगों को नसीब नही हुआ हैं।
  • बिस्टुपुर हो या साक्ची या फ़िर स्टेशन हो या जुगसलाई कहीं भी सड़क के बगल वाली जगह जो पैदल चलने वाले लोगों के लिए रहती है, का अस्तित्व विलुप्त हो चुका है। दुकानदारों नें पैदल चलने वाले जगह को अतिक्रमित कर अपने दुकानों होटलों को मुख्य सड़क तक विस्तारित कर लिया है जिसे कोई देखने वाला नहीं। दुकानें धीरे धीरे आगे करके सड़क तक ला दी गयीं हैं मगर कोई इस पर एक्शन लेने वाला नहीं।
  • ट्रैफिक समस्याओं में अपना बहुत बड़ा योगदान इस शहर में चल रहीं बसें भी दे रहें हैं जो जब मन चाहा जहाँ मन चाहा वहीँ रोककर अपने ग्राहक को उठा लेती हैं या फिर उतार देतीं हैं। बस स्टैंड नाम की कोई चीज ही नहीं रह गयी हैंकोई ये देखने वाला नहीं की बस मुख्य सड़क पर खड़ी हैं और अपने ग्राहकों को मज़े से उतार रहीं हैं या उठा रहीं हैं। सबसे मजेदार पहलु तो ये हैं की जमशेदपुर के लगभग सभी बस स्टैंड पर टेंपो वालों का कब्जा हो गया हैं। कई बस स्टैंड तो टेंपो वालों के आरामगाह बन गए हैं। किसी को इसकी परवाह नहीं है। कोई एक्शन लेने वाला नहीं है।

सोमवार, 15 जून 2009

बीता वक्त और आज के बीच मैं

दुनिया अजीब है। कौन कब कहाँ आकर मिल जाए कोई सोच नहीं सकता। बीते हुए वक्त और आज के बीच में ख़ुद को एक नए दुनिया में देख रहा हूँ। कल भी मेरे पास सबकुछ होकर भी मैं तनहा था और आज भी मैं सबकुछ पाकर भी तनहा ही हूँ। खुश हूँ बहुत खुश हूँ जी रहा हूँ बस जिए जा रहा हूँ।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

सी आई एस आर में तक्नीकी और गैर तकनीकी कार्मिक

CSIR तकनीकी और गैर तकीनीकी संवर्गों का एक अदभुत मिलाप है। यहाँ ना सिर्फ़ गैर तकनीकी कार्मिक अपनी लगनशीलता से कार्य करतें है बल्कि तकनीकी कार्मिक भी अपनी इच्छाशक्ति के दम पर CSIR का झंडा विश्व के क्षितिज पटल पर लाने में कामयाब हुए हैं.

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

अमित मंडल को विवाह की ढेरो बधाईयाँ

अमित मंडल जो CMERI दुर्गापुर के Accounts विभाग में तैनात है। उसे मेरे तरफ़ से विवाह की ढेरो शुभकामनाएं ।
मैं अमित मंडल को कभी नही भूल सकता क्यूंकि अमित के साथ मैंने सौर रिक्सा प्रोजेक्ट में काम किया था। इस प्रोजेक्ट में अमित के साथ काम करने का मेरे अनुभव बहुत ही अच्छा रहा। उसके दिल में गरीब लोगों के प्रति जो मानवता है, नीचे तबके के लोगों के उत्थान के लिए जो उसके मन में श्रद्धाहै वो बहुत ही कम लोगों में मिलती है। अमित मंडल से जब कभी मेरा डिबेट हुआ उसने अंतर्मन से ये बात स्वीकारी उसने माना की राजनितिक पार्टियां महज अपने फायदे के लिए लोगों का इस्तमाल कर रही हैं। चाहे सीपीएम हो या कोई और।
उसमें मैंने आने वाली उज्जवल भविष्य को देखा है। उसके सोच में दूरदर्शिता है, उसमें मननशीलता, लगनशीलता है। उसमे निश्वार्थ भावना से लोगों को ऊपर उठाने का जूनून है। उसमे दोस्ती का विश्वास है। मेरे ख़याल से इस लड़के में समाजसेवा का जो भावः है वो शायाद ही किसी और में हो।

अमित तुझे नएभविष्य की अनंत शुभकामनाएं।

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

मुंबई कल और आज

राज ठाकरे ने मुंबई में जो उथल पुथल मचाया और उसके बाद मुंबई पुलिस के द्वारा राहुल राज के कत्ल के बाद जो स्थिति मुंबई की हुई ये हमने कभी सोचा नहीं था। खुलेआम गुंडागर्दी खुलेआम कत्ल खुलेआम कानून का मजाक उडाना सब कुछ मुंबई ने पिछले दिनों देखा। निहत्थे लोगों पर सिर्फ़ राजनीति की दूकान चलाने के लिए जुल्म करना और आमची मुंबई का नारा बुलंद करना ये कहाँ का इंसाफ है। कभी दक्षिण भारत तो कभी उत्तर भारत के लोगों पर ठाकरे जैसे नेताओं ने जो जुल्म किये उसे हम सबने अपने अपने अंतरात्मा से महसूस किया। सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनीति की रोटी सेकने के लिए कभी हिंदू मुस्लिम के बीच दंगे कराए जाते थे तो आज स्थिति इतनी बदल गयी है की क्षेत्रीय राजनीति के नाम पर एक नए आतंकवाद की पटकथा लिख दी है। उस वक्त जब राज ठाकरे के गुंडे क्षेत्रीय राजनीति के नाम पर उत्तर भारत के लोगों पर अत्याचार कर रहे थे, समूचा लोकतंत्र शर्मिंदा हो गया था तब किसीं ने यी नहीं कहा था कि ये ग़लत हो रहा है।
मुंबई, जहाँ अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, लता मंगेशकर से लेकर सचिन तेंदुलकर तक बड़ी से बड़ी हस्तियां रहतीं हैं मगर किसी ने इस मामले में दखल देना मुनासिब नही समझा। क्यो? आख़िर क्यो? क्या हो गया था उन हस्तियों को जो आज आतंकवाद के मसले पर अपने अपने ब्लॉग पर अपनी अपनी दुःख भरी व्यथा लिख रहे हैं और जो दिन प्रतिदिन समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ कि शोभा बन रहें है। चाहे अमिताभ भाच्चन हों या लता मंगेशकर या फिर धर्मेन्द्र हों सभी खुलकर आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाजें बुलंद कर रहें है, उनसे मेरा एक सवाल है - क्या आतंकवादियों द्वारा किए गए कत्लेआम का ही विरोध करेंगे, पिछले दिनों जो राज ठाकरे और उसके मनसे के गुंडे ने राजनीति के नाम पर आतंकवाद का नया रूप पेश किया उसका विरोध क्योँ नहीं किया गया। यदि वर्तमान कि तरह मुखर होकर उस समय येही प्रतिक्रया की गई होती तो राज ठाकरे जैसे नेता को मजबूरन अपनी राजनीति की दूकान बंद करनी पड़ती।
मुंबई में 200 के लगभग लोग मर गए, वे भी इंसान ही थे, 22 लोगों को छोड़कर बाकी लोग हमारे अपने ही थे, हमारे हिन्दुस्तान के ही थे, मगर ना जाने क्यों इस बार मुझे व्यक्तिगत रूप से ये एहसास ही नही हुआ की मैंने कुछ खोया है, मुझे ऐसा लगा ही नही की मैंने अपने लोगों को खोया है। ना जाने क्यों मेरे जेहन से वो अपनापन गायब हो गया था। मैंने ये महसूस किया की जब राज ठाकरे जैसा नेता मुंबई को अपने बाप की जागीर समझता है और मुंबई में रह रहे सामान्य लोगों से लेकर खास लोगों तक में कोई भी ऐसा नही जो उसके इस जागीर पर ऐतराज करने का दम भरे। शायद येही कारन हैं जिसके कारन मैं सवेदंशुन्य होकर सिर्फ़ न्यूज़ और न्यूज़ देखता रहा कहीं से कोई भावः मेरे अंतरात्मा से नही निकले कहीं से कोई मर्म मुझे एहसास नहीं हुआ मुझे ऐसा लगा जैसे मुंबई किसी दूसरे देश में चली गयी हो, मुंबई से अब हमारे देश का कोई मतलब नही।

सोमवार, 17 नवंबर 2008

साइंटिस्ट तथा एडमिनिस्ट्रेशन का अदभुत मिलाप - सी एम् इ आर आई दुर्गापुर

वैज्ञानिक संस्थानों में हमेशा ही वैज्ञानिक तथा एडमिनिस्ट्रेशन में बहुत बड़ी दूरी बनी रहती है किंतु सी एम् इ आर आई दुर्गापुर में मैंने व्यक्तिगत स्तर पर ये महसूस किया है की यहाँ वो दूरी दूसरे संस्थानों की तरह इतनी गहरी नहीं थी। मेरे अपने 2.2 साल की अवधि में कई बार साइंटिस्ट और गैर - साइंटिस्ट (एडमिनिस्ट्रेशन) के बीच पनपे ऐसे अदभूत संगम को देखा और इस संगम के परिणामस्वरूप सफल हुए कई आयोजनों का मैं स्वयं गवाह भी बना। इसके कई उदहारण हैं जैसे कि : .................................Annual Sports 2006
.................................Regular and Pensioner के लिए वृहत स्तर पर आयोजित समारोह 2007
................................. Annual Sports 2007
..................................SSBMT ZONAL TOURNAMENT 2007
..................................Solar Autorickshaw Project 2007
इतना ही नहीं जो भी समारोह अथवा सेमिनार आयोजित किए जाते उनमें एडमिनिस्ट्रेशन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। सी एम् आर आई दुर्गापुर में मैंने साइंटिस्ट और गैर साइंटिस्ट (एडमिनिस्ट्रेशन) का मिलाप देखा है। दोनों की सहभागिता प्रत्येक मामले में देखी है। चाहे सुप्रकाश हलदर हों या पी के चटर्जी, चाहें बी के कर हों या सुभाजीत बनर्जी या एम् सी मुर्मू सभी अनुभाग अधिकारियों के सम्बन्ध वैज्ञानिकों के साथ ना सिर्फ़ मधुर है बल्कि मिलकर काम करने की भावना इनमें दर्शनीय है। इसके लिए ना सिर्फ़ ये अधिकारी बधाई के पात्र हैं बल्कि इनके साथ साथ वहां के साइंटिस्ट भी बधाई के पात्र हैं जो हर कदम पर प्रशासनिक महकमे को साथ लेकर चलने का सफल प्रयास करता हैं।

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

केंद्रीय यांत्रिक अभियांत्रिक अनुसन्धान संस्थान, दुर्गापुर और मैं


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Dear Balu, We all miss you yaar ....................

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संजीत कुमार तथा मनीष जी का शुक्रिया जो आप दोनों ने मेरे ब्लॉग पर कमेंट्स लिखा , इसी तरह सभी दोस्तों से मेरा अनुरोध है की कृपया करके आप भी अपने कमेंट्स जरुर से जरुर लिखें.
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मेरा बचपन बंगाली माहौल में गुजरा। 1978 के बालपन से लेकर 2006 की जवानी तक मैंने बंगाली माहौल में सांसे ली. मेरा पहला प्यार भी एक बंगाली ही थी। मुझे बंगाल से जुड़ी हर एक चीज पसंद लगती थी। मैंने बंगाली बोलना सीखा। मेरी नौकरी जब दुर्गापुर में केंद्रीय यांत्रिक अभियांत्रिक अनुसन्धान संसथान में हुई तो मेरी खुशी का ठिकाना ही नही रहा। जिस बंगाली माहौल से मुझे एक सभ्य संस्कार की खुशबू आती थी, उसी माहौल में रहने, काम करने का मुझे सौभाग्य मिला था। मेरे लिए बंगाल में काम करना, बंगाली माहौल में काम करना किसी सपने के सच होने के समान था। वो बंगाल जिसने रबिन्द्र नाथ टैगोर और अमर्त्य सेन जैसा नोबेल पदकधारी पैदा किया। वो बंगाल जिसने स्वतंत्रता संग्राम में अपना एक अहम् योगदान दिया। प्रत्येक बंगाली को जिस तरह अपने आप पर गर्व होता है ठीक उसी तरह मुझे भी बंगाल के माहौल में ख़ुद को पाकर असीम गर्व की अनुभूति हुई।
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.समस्त बंगाल के सभी निवासियों को मेरा कोटिशः नमन। .
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मैंने केंद्रीय यांत्रिक अभियांत्रिक अनुसन्धान संसथान, दुर्गापुर में 20 जून 2006को अपना पद ग्रहण किया। मुझे अच्छी तरह से याद है उस समय मेरा स्वाभाव अजीबोगरीब था। जब मैं पद ग्रहण करने RCT अनुभाग गया था तो मेरे सर पे टोपी थी, मेरे हांथो में बैन्ड बंधा हुआ था। मेरे स्वर में एक अजीब तरह का बडबोलापन था, जो उस समय कई लोगों को जरुर खटका होगा। इसमे कोई दो राय नही की व्यावहारिक स्तर पर मैं ग़लत था। इसका एहसास मुझे लगभग 1 वर्षों के बाद हुआ। मेरे लिए ये नौकरी किसी जीवनदान से कम नहीं। मैं इसके लिए इश्वर को कोतिश: नमन करता हूँ। इस नौकरी से पहले मेरी क्या हालत थी, ये सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं ही जनता हूँ। सुबह 9 से साम 6 बजे तक NML जमशेदपुर की नौकरी और फिर रात 8 बजे से देर रात 2 बजे तक उदितवाणी समाचार पत्र में काम करके कुल मिलाकर जैसे तैसे 5500 रूपये कमा पाता था। इसी दौरान किसी तरह से कम्पीटिशन की तैयारी करके मैंने CMERI दुर्गापुर जैसे प्रतिष्ठित सन्स्थान में एक पोस्ट पर अपना कब्जा किया था।
मैंने जब CMERI में अपना पद ग्रहण किया था, उस समय मैं हॉस्टल में कुछ दिनों के लिए रहा था। मैं E-II में तैनात मनीष कुमार को नहीं भूल सकता। एक मनीष ही था जिससे मेरे सबसे पहले दोस्ती हुई थी। वो ही मुझे हॉस्टल आकर उठाता था और अपने साथ मुझे ऑफिस ले जाता था। किसी नए जगह में जो आरम्भ में सूनापन लगना चाहिए था वो मुझे मनीष कुमार की वजह से कभी नहीं लगा। इसके लिए मैं आजीवन मनीष का आभारी रहूँगा।
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मनीष मेरे दोस्त में तूझे भूल नहीं सकता यार।
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................." एक तुम ही थे जिसने मुझे तनहाइयों में दिया था सहारा ..............
..................एक तुम ही थे जिसने मेरी कश्ती को किया था किनारा ..................
..................तुझसे जुड़ी है कई यादें मेरी .................................................................
..................आज भी तेरी याद में पलकें भींगती है मेरी" ........................................
..............................................................................................................परमार्थ सुमन
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CMERI में join करने के बाद मेरी तैनाती सबसे पहले RCT अनुभाग में पूर्णिमा दीदी के अधीन हुई। मुझे परियोजना सहायक से सम्बंधित कार्य सौंपा गया किंतु अचानक ही 2 दिनों के बाद मेरी तैनाती E-II अनुभाग में कर दी गयी।
मैंने E-II अनुभाग में श्री बी पी साव, अनुभाग अधिकारी के अधीन अभी काम करना शुरू ही किया था की मेरी तैनाती हिन्दी अनुभाग में कर दी गई।