बुधवार, 4 दिसंबर 2019

MRP and our responsibility

विगत 30 नबम्बर, 2019 को परिवार के साथ निक्को पार्क गया था। जैसा की प्रायः ही होता है की छुट्टी के दिनों परिवार के साथ कहीं ना कहीं घूमने निकल जाता हूँ, इसमें ये एक तरह का रूटीन भ्रमण का कार्यक्रम जैसा ही था। अपने परिवार के साथ साल भर में करीब 2 से 3 बार निक्को पार्क की सैर कर आता हूँ। 

जमशेदपुर शहर के बिस्टुपुर स्थित निक्को जुबली पार्क अपने आप में एक बेहद ही अच्छा और अनूठा पार्क है, जिसमें बच्चों के साथ साथ बड़ों से संबन्धित कई प्रकार के झूले के साथ, नौकायन की भी सुविधा उपलब्ध है और अभी हाल ही में इस पार्क में वॉटर पार्क की भी सुविधा प्रदान की गई है। जमशेदपुर जैसे शहर में इस तरह का यह एकलौता पार्क है। 

हर बार की तरह एक-एक झूले को झूलता आगे बढ़ता गया। फिर बच्चे की जिद और दुकान से lays की चिप्स। हर बार की तरह दुकानदार ने MRP से ज्यादा पैसे के डिमांड की और मैंने भी हर बार की तरह MRP से ज्यादा डिमांड किए गए पैसे उस दुकानदार को खामोशी से दे दिये और आगे बढ़ गया। मगर कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद मुझे MRP से अधिक राशि उस दुकानदार को बिना किसी जिरह के दिये जाने पर अफसोस होने लगा और मैंने अन्तर्मन से ये फैसला किया कि हर बार की तरह इस बार मैं निक्को जुबिली पार्क से खामोशी से बाहर नहीं निकलूँगा। 

परिवार के साथ सारे झूले का आनंद उठाने के बाद अंतिम में सबके साथ नौकायन भी किया और जब पार्क के मुख्य द्वार पर पहुंचा तो मैंने वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी से शिकायत रजिस्टर की मांग की। सुरक्षाकर्मी ने जब इसका कारण पूछा तो मैंने पार्क के अंदर लगाए गए दुकान के दुकानदार द्वारा MRP से अधिक राशि लेने की जानकारी दी। इसके बाद सुरक्षा कर्मी मुझे निक्को जुबिली पार्क के ऑफिस के अंदर किसी वरीय अधिकारी के पास ले गया और स्थिति की जानकारी दी। वरीय अधिकारी ने तुरंत मुझे आदर के साथ कुर्सी पर बैठने का निवेदन किया और उस सुरक्षाकर्मी से उस दुकानदार को बुलाने को कहा। थोड़ी ही देर में वो दुकानदार उस कमरे में मौजूद था। इसके बाद उस वरीय अधिकारी द्वारा उस दुकानदार को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी गयी कि यदि MRP से अधिक राशि में समान बेचने संबंधी शिकायत भविष्य में दुबारा मिली तो उसके दुकान को निक्को जुबिली पार्क से हटा दिया जाएगा।  दुकानदार द्वारा तुरंत उस वरीय अधिकारी के साथ साथ ना सिर्फ मुझे माफी मांगी गयी अपितु मुझसे MRP से अधिक लिए गए राशि को मुझे वापस देने का प्रयास भी किया गया जिसे मैंने विनम्रतापूर्वक इंकार कर दिया। 

चेतावनी सुनकर और माफी मांगकर दुकानदार उस कमरे से बाहर जा चुका था। उस वरीय अधिकारी द्वारा मुझसे निक्को पार्क में भविष्य में इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति नहीं होने की बात कही गयी। मैं और मेरा अन्तर्मन आज निश्चिंतता के बोध के साथ एक दूसरे को शाबाशी दे रहे थे। 

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि अब आज के बाद से निक्को जुबिली पार्क के किसी दुकान में कोई भी समान MRP से अधिक कीमत पर नहीं बेची जाएगी। 

ऐसे कई जगह हैं जहां हम सभी लोगों की जानकारी में सामान MRP से अधिक कीमत लेकर खुलेआम बेची जाती है, जैसे कि बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन आदि। मुझे लगता है हम सबों को इसका खुलकर विरोध करना चाहिए और साथ साथ संबन्धित जगह इसकी शिकायत बिलकुल करनी चाहिए। 

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

आत्मसाक्षात्कार एवं नशा-मुक्ति मार्ग का सफर

आज के परिदृश्‍य में हमने खुद को मोबाइलटीवी तथा कम्‍प्‍यूटर की दुनिया से चिपका कर रखा है तथा हम फेसबुकटयूटर, वॉटसअपयू-टयूब जैसी कल्‍पनाशील दुनिया में खुद को कैद करके खोए-खोए से रहने लगे हैं। ऐसे में अंतरात्‍मा की गहराई से आने वाले भाव विलुप्‍त होते जा रहे हैं। इन भावों में दैविक शक्ति समाहित रहती हैजिससे प्रगतिशील विचारों के साथ-साथ सृजन की क्षमता का भी विकास होता है।
सोमवार, 2 जनवरी, 2012 को मैंने अपने ब्‍लॉग parmarthsuman.blogspot.in पर एक ब्‍लॉग लिखा 'नया साल 2012 : नए संकल्‍पऔर अपने आप से एक संकल्‍प लिया नशा नहीं करने का और मेरे लिए गर्व की बात है कि अगस्त, 2019 में प्रवेश करने के बाद भी आज मैं अपने उस संकल्‍प पर पूरी तरह से कायम हूं।
वर्ष 1994 अब तक के मेरे जीवन का सबसे उथल-पुथल करने वाला वर्ष । आत्‍महत्‍या में असफल रहा। इसके बाद जीवन में कोई लड़की नव-जीवन बनकर मेरे दिल में कैद हो गयी। घरेलू समस्‍याओं के साथ-साथ अन्‍य कई प्रकार की मानसिक वेदनाओं से ग्रस्‍त होकर अंतत: मैं इंटर प्रथम वर्ष में पदार्पण करते हुए नशा की दमघुटती राह में अग्रसर हो चला। यहां से आरंभ हुए मेरे इस नशा-यात्रा का अंत जनवरी 2012 में हुआयह भी एक अजीब संयोग ही है। इस 2012-1994 लगभग 18 वर्ष की यात्रा में मैंने अनेक उतार-चढाव देखे। उन दिनों की बातें याद करके आज भी मैं सिहर उठता हूं तथा उस दौरान किए गए कुकृत्‍य पर आज भी मैं शर्मिन्‍दा महसूस करता हूं। आज उन पलों को महसूस करता हूं तो यह पाता हूं कि इन 18 वर्षों के दौरान मैंने नशा नहीं किया अपितु नशे ने मुझे अपना शिकार बनाया।
वर्ष 1994 से मैंने गुटखा खाना आरंभ किया था। 1-2 की संख्‍या से आरंभ हुए इस नशा का शिकार मैं दिन प्रतिदिन होता ही चला गया। इस दौरान एक तो घरेलू परेशानियां तथा उसके बाद मानसिक अवसादजिसके परिणामस्‍वरूप मैं इस भंवर में न चाहते हुए भी उलझता चला गया। जैसा कि नशे के साथ होता है कि नशा करने के बाद ऐसा महसूस होता है कि मानसिक तनाव कुछ कम हो रहा है, ठीक मेरे मामले में भी यही होता रहा। गुटखे का हर पैकेट मुंह में डालने तथा उसका स्‍वाद जीभ से शरीर के अंदर जाने के बाद काल्‍पनिक रूप से मुझे भी औरों की तरह यही महसूस होता था कि मानसिक तनाव में कुछ कमी आई है। धीरे-धीरे एक दिन ऐसा भी आया कि गुटखे की संख्‍या प्रतिदिन 10-15 के बीच हो गई।
नशा के दौरान सोचने-समझने की शक्ति बिलकुल भी झीण हो जाती है तथा इस दौरान हम एक अलग ही दुनिया में लीन रहने लगते हैं एवं किसी के बोलने-टोकने का कोई फर्क नहीं पड़ता है। हम अपने आस-पास की दुनिया से अलग बेसुध होकर कहीं और ही खोए पड़े रहते हैं।
वर्ष 1994 से मैं अपने पडोस की एक लड़की से बेइंतहा मोहब्‍बत करता चला आ रहा था जबकि मेरे इकरारे मोहब्‍बत भरे दिल के टुकड़े खुद उसी ने अपने हाथों से करने में कोई गुरेज नहीं की थी। मैं उससे एकतरफा मोहब्‍बत में पागलों सा जीवन जी रहा था। इस दौरान 1995 में जैसे-तैसे मैं द्वितीय श्रेणी से इंटर भी पास कर गया। इसके बाद मैंने अपने स्‍वर्गीया माताजी के दबाव तथा अपने एक बचपन के दोस्‍त मनीष राज के अत्‍यधिक अनुरोध के कारण उसके साथ कम्‍प्‍यूटर प्रशिक्षण कोर्स करना आरंभ कर दिया तथा अलग-अलग संस्‍थाओं से कई प्रकार के कम्‍प्‍यूटर से संबंधित कोर्स मैंने सफलतापूर्वक पूरे भी किए। इस दौरान मैं पूरी तरह से नशा से ग्रस्‍त रहा तथा अब तो गुटखा के साथ-साथ जर्दायुक्‍त पान भी मेरे मुंह की शोभा बढाने लगे थे।
कम्‍प्‍यूटर से संबंधित बहुत सारे छोटे-मोटे तौर पर कोर्स करने के परिणामस्‍वरूप अगस्‍त 1997 के करीब मुझे अपने घर के समीप स्थित एनआईसीटी कम्‍प्‍यूटर में बतौर प्रशिक्षक कार्य करने का मौका मिला। प्रशिक्षण कार्य से जुड़ने के बावजूद मेरा नशा से संबंध विच्‍छेद नहीं हो पाया और मैं नशा करने की पराकाष्‍ठा तक पहुंच गया। इस दौरान वर्ष 1996-97 का वह दौर भी मैंने देखा जब मैं रात्रि के 7 बजे के करीब टाटा-पटना ट्रेन से अपने गांव फरदामुंगेर के लिए निकलता और टाटानगर स्‍टेशन से निकलने के बाद अपने गांव अगली सुबह 10 बजे के करीब पहुंचने तक 40-45 की संख्‍या में गुटखा का पैकट समाप्‍त कर लेता था। पूरी यात्रा के दौरान मेरा मुंह चलता ही रहता था और इसका पिक पूरी तरह से मेरे शरीर के अंदर चला जाया करता था।
यह वह दौर था जब मेरी जिंदगी से मिर्च और स्‍वाद दोनों ही गायब हो चुके थे। अब तो सब्जियों में हरी/लाल मिर्च की बात छोडिए, काली मिर्च तक मुझे परेशान करने लगी थी। इन दिनों मुझसे जुड़े लगभग सभी अपनों/दोस्‍तों/सगे-संबंधियों ने इस बुरी लत को छोड़ने का आग्रह किया था, मगर मैं अपनी एक अलग ही दुनिया में लीन होकर न जाने किस दिशा में बढ़ता चला जा रहा था। इस बीच 29 नवम्‍बर, 2000 का दिन भी आया जिस मैं आजीवन नहीं भूल सकता। इस दिन मेरी उस बेइंतहा मोहब्‍बत नेजिसे अपनी जिंदगी का लक्ष्‍य मानकर मैं जीने की कोशिश कर  रहा थामुझसे नशा छोडने का आग्रह कर दिया। मगर उस वक्‍त मैं तो एक अलग ही दुनिया में जी रहा था। बेहद ही अफसोस की बात है कि मैंने उस वक्‍त एक ऐसे शख्‍स के अनुरोध को ठोकर मार दिया जिसे कभी मैं अपने जीवन का हमसफर बनाना चाहता था और जिससे एकतरफा मोहब्‍बत में मैं वर्ष 1994 से सफर कर रहा था। नशा अपने परवान पर था और मैं पूरी तरह से उसकी गिरफ्त में कैद था।
अप्रैल 2002 में मेरी शादी हुई और सामान्‍यत: जैसा होता है पत्‍नी धर्म का पालन करते हुए मेरी नव विवाहिता पत्‍नी ने भी मुझसे गुटखा छोडने का प्रेममय अनुरोध अनेकों बार किया, जिसका मुझ पर कोई असर नहीं पड़ा। लगभग 3 महीने के बाद मेरे दोस्‍तों के दिए टिप्‍स पर अमल करते हुए मेरी पत्‍नी ने वह किया जो कभी मैं सोच भी नहीं सकता था। एक दिन अचानक जब मैं घर के अंदर दाखिल हुआ तो पाया कि सामने मेरी धर्मपत्‍नी साक्षात् दुर्गा का अवतार लिए मौजूद है। मेरे पैंट के पॉकेट में हाथ डालकर उसमें से गुटखा निकालते हुए मुझसे सवाल-जवाब का दौर उसने बिल्‍कुल ही कड़े लहजे में आरंभ करते हुए पूछा ''मैंने मना किया था ना? फिर भी आपको सुनाई नहीं पडताऐ क्‍या है आपके पॉकेट में?कितनी बार कहा यह सब बंद कीजिएआपको सुनाई नहीं पडता है क्‍या?'इस तरह का व्‍यवहार अपनी धर्मपत्‍नी से देखकर मैं एक बार तो विस्मित हुआ फिर संभलते हुए उससे पूछा ''आज क्‍या हो गया है तुमको?आखिर तुम चाहती क्‍या हो?'उसका जवाब एक आदेश की तरह मेरे रगों में महसूस हुआ ''आज से आप गुटखा नहीं खाएंगे'' मैंने उसके जवाब पर सवाल करते हुए पूछ डाला ''क्‍या करोगी यदि खाउंगा तो''  उसका सीधा और स्‍पष्‍ट जवाब तत्क्षण फिर मेरी ओर था ''तो फिर मैं भी खाउंगी'' इतना सुनना था कि एक नशेड़ी पति ने अपनी धर्मपत्‍नी के साथ वह सलूक किया, जिसका अफसोस आज भी मुझको है और ताउम्र रहेगा भी। आवेश में आकर मैंने तुरंत ही उस गुटखे के पॉकेट को उसके हाथों से छीनते हुए अपने हाथों में लिया और उसे फाडते हुए पूरा का पूरा पॉकेट अपनी पत्‍नी के मुंह में जबरदस्‍ती डाल दिया। इसके बाद लगभग 30 मिनट तक वह उल्‍टी पर उल्‍टी करती रही और मैं बेशर्म जैसा कुछ दूर पर खडा होकर यह तमाशा देखता रहा। आज महसूस करता हूं तो अपने इस कृकृत्‍य पर बेहद ही शर्मिन्‍दगी होती है और मुझे उस दिन की अपनी इस तरह की मर्दान्‍गी पर आज भी लानत महसूस होती है। हालांकि इस घटना के बाद मेरी धर्म पत्‍नी द्वारा फिर कभी मेरे नशे के मार्ग में बाधा उत्‍पन्‍न करने की कोशिश नहीं की गयी।
वर्ष 2002 से 2006 के दौरान राष्‍ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एन.एम.एल.)जमशेदपुर में अस्‍थायी पद पर वरिष्‍ठ हिन्‍दी अधिकारी डॉ. पुरुषोत्‍तम कुमार जी के अधीन कार्य करते हुए राजभाषा हिन्‍दी के प्रति लगाव व झुकाव का उत्‍पन्‍न होना तथा इसके बाद डॉ. कुमार के प्रोत्‍साहन से हिन्‍दी काव्‍य रचना की ओर प्रेरित होते हुए 'आराधनाकाव्‍य की रचना करना अपने आप में एक अद्भुत संयोग रहा। एनएमएलजमशेदपुर जैसे गौरवान्वित करने वाले प्रयोगशाला में रहते हुए भी नशा का साथ नहीं छूटना अपने आप में कई सवाल उत्‍पन्‍न करता हैजिसका मेरे पास कोई जवाब आज तक नहीं है।       
20 जून, 2006 को मुझे सरकारी नौकरी सीएमआईआरआईदुर्गापुरपश्‍चिम बंगाल में मिली और मैंने वहां कार्यभार ग्रहण किया। वहां का माहौल कुछ अलग था। अधिकतर लोग पान/गुटखा की बजाए बीडी/सिगरेट पीते थे। मैंने भी वहां के माहौल में अपने नशे को बदलने की कोशिश की, मगर एक दिन में 20-25 सिगरेट पीने के बाद भी सुकून नहीं मिल पाने की वजह से अंतत: मैं अपने पुराने नशे गुटखा/पान में ही आकर सिमट गया। लगभग दो वर्ष पश्चिम बंगाल में रहने के बाद मैं 1 सितम्‍बर, 2008 को एनएमएलजमशेदपुर वापस अपने नशे के साथ अपने पुराने शहर लौट आया था। स्थिति बद से बदतर होती जा रही थी। मैं खाने/पीने के उस दौर में पहुंच चुका था जहां कोल्‍ड ड्रिंक्‍स भी अब गले से नीचे नहीं उतर पा रही थी और अब मेरे लिए बिना हरी/लाल मिर्च और मसाले के घर में अलग से सब्‍जी बनने लगी थी। इतना कुछ होने के बावजूद मैं अपने आप को नशे की अंधेरी दुनिया से दूर ले जा पाने में सफल नहीं हो पा रहा था। इतनी शारीरिक परेशानियों के बावजूद नशा करने के बाद मुझे यही महसूस होता था कि इन सब मानसिक परेशानियों से छुटकारा नशा ही दिलाती है। नशा एक तरह से मेरी जिन्‍दगी का एक अभिन्‍न अंग बन चुकी थी तथा यह अब मेरे दैनिक जीवन का एक अहम् हिस्‍सा बन चुकी थी।
31 दिसम्‍बर, 2011 शनिवार मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन रहा। एक तरह से कहूं तो मेरे लिए आत्‍मसाक्षात्‍कार का दिन था।  संध्‍या समय पूरी तरह टीवी पर आ रहे नए साल से संबंधित कार्यक्रमों को देखते हुए बीता और इसी दौरान अंतर्मन में नव वर्ष पर कुछ नया करने का उमंग उठता प्रतीत हुआ। कुछ नया करने की उलझन में रात्रि प्रहर मैं बिस्‍तर पर इधर-उधर करवटें बदलता रहा कि अचानक महसूस हुआ कि स्‍नान आदि से निवृत होकर मैं गायत्री मंदिर के अंदर अपने दोनों हाथों को जोड़ते हुए प्रवेश कर रहा हूं। बार-बार कई बार यही दृश्‍य बिस्‍तर पर लेटे हुए मेरी आंखों के सामने से आर-पार होते रहे। थक हारकर मैं यह सोचने को विवश हो गया कि आखिर इन दृश्‍यों का मेरी वा‍स्‍तविक जिंदगी से क्‍या संबंध है और ये मुझे क्‍या संदेश देना चाहते हैं। इसी उधेडबुन में कब रात बीत गई और कब मै नव वर्ष के प्रांगण में अपने पैर रख गया, यह पता ही नहीं चला। रविवार, 1 जनवरी, 2012 का मेरा पूरा दिन इसी उलझन में कैसे बीत गया कुछ पता ही नहीं चला। संध्‍या समय मै अपने रूम पर अकेला ही था और बीते रात के दृश्‍यों पर चिंतन कर ही रहा था, तभी यह  ध्‍यान आया कि एक तरफ मैं आस्‍था से जुडे होने के कारण निर्जीव पत्‍थर की प्रतिमा का पूजन शुद्धता से करने के लिए देव स्‍थान के अंदर प्रवेश करने से पूर्व अपने शरीर को कितने अच्‍छे तरीके से स्‍वच्‍छ कर रहा हूं और उसके बाद ही वहां प्रवेश कर रहा हूं, वहीं दूसरी तरफ मैं अपने शरीर रूपी देव स्‍थल, जिसमें आत्‍मा रूपी ईश्‍वर सजीव रूप से विद्यमान हैं - इसके अंदर पान/गुटखा के रूप में कितने दूषित व विषैले तत्‍व को दैनिक रूप से समाहित कर रहा हॅूं। यह तो मेरी आस्‍था के दोहरे चरित्र को उजागर कर रहा है। यह भाव अंतर्मन में आते ही तत्‍क्ष्‍ण मैंने नशामुक्ति द्वार की ओर आगे बढने का निर्णय लिया और यह प्रण लिया कि मैं अपने जीवन को हर प्रकार के व्‍यसन से दूर रखूंगा।
आज जबकि वर्ष 2024 चल रहा है तथा वर्ष 2012 के दौरान लिए गए अपने प्रण में पूरी तरह सफल रहते हुए पिछले 12 वर्षों के दौरान अपने जीवन से हर प्रकार के व्‍यसन को पूरी तरह से दूर रखा। इसका सुखद परिणाम मैं मसहूस कर रहा हूँ। मेरे खाने की थाली में हर प्रकार के मसाले के साथ-साथ हरी मिर्च भी दैनिक रूप से परोसे जाने लगे हैं तथा अब हर प्रकार के मसाले के स्‍वाद को अंतर्मन से महसूस कर पा रहा हूँ।

आज भी मैं वर्ष 1994 से 2011 तक (23 वर्षों) के न भूल पाने वाले नशा के सफर को याद करके सिहर उठता हूँ । इन 23 वर्षों का नशा से मेरा अनुभव यही सीख देता है कि नशा हमें शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों के साथ-साथ हमारे अंदर से मनुष्‍यता के भाव को समाप्‍त कर देता हैहमारे अंदर अच्‍छे-बूरे में फर्क करने के भाव को समाप्‍त कर देता हैहमारे आत्‍मबल को कमजोर कर देता है तथा हमें अंदर से खोखला कर देता है।

मंगलवार, 1 मार्च 2016

धिक्कार है तूझपे

जिस माता ने तूझे जन्म दिया
उसकी गोद में बैठकर
दुश्मनों की जय जयकार करते हो
धिक्कार है तूझपे, धिक्कार है तूझपे
जिसकी छाती पर, गुजारा तूने अपना बचपन
उस माटी को कलंकित करते हो
धिक्कार है तूझपे, धिक्कार है तूझपे
देश की आस्था पर हमला करवाकर
जिसने आतंकवादियों का साथ दिया
उसको शहीद बताकर, शहीदों का अपमान करते हो
धिक्कार है तूझपे, धिक्कार है तूझपे
देश के भविष्य तुम, देश के तुम कर्णदार
ऐ कैसी अभिव्य्क्ति तेरी, जिससे समूचा देश हो शर्मसार
ऋषि-मुनियों की यह पवित्र भूमि
जिससे पूरा विश्व हुआ आलोकमय
उसी जमीं पर ऐसी, विकृत मानसिकता रखते हो
धिक्कार है तूझपे, धिक्कार है तूझपे
छात्र जीवन होता बडा संयमित
दार्शनिक-सा विचार होता
बाल-सुलभ सा व्यवहार होता
निश्छल-सा स्वभाव होता
छात्र नाम को लांछित करके
क्यों देशद्रोही साजिश रचते हो
धिक्कार है तूझपे, धिक्कार है तूझपे
सहिष्णु हैं सदभाव हैं,
हर धर्म के प्रति आदर भाव है
न जाने क्यों फिर कट्टरपंथी बनकर
गांधी की इस तपो‍भूमि को
हिंसात्मक नारों से उद्वेलित करते हो
धिक्कार है तूझपे, धिक्कार है तूझपे
................................................परमार्थ सुमन

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

Jawahar Lal University - aim

आज मैं जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी के वेबसाइट के हिन्‍दी संस्‍करण के मुख्‍य पृष्‍ठhttp://www.jnu.ac.in/Hindi/ पर दिए गए कुछ अंश यहां प्रस्‍तुत कर रहा हूँ -
...................................................................................................................................................................
"विश्‍वविद्यालय का उद्‍देश्य मानवता, सहनशीलता, तर्कशीलता, चिन्तन प्रक्रिया और सत्य की खोज की भावना को स्थापित करना होता है। इसका उद्‍देश्य मानव जाति को निरन्तर महत्तर लक्ष्य की ओर प्रेरित करना होता है। अगर विश्‍वविद्यालय अपना कर्तव्य ठीक से निभाएं तो यह देश और जनता के लिए अच्छा होगा।"

विश्‍वविद्यालय के उद्‍देश्य हैं : -
अध्ययन, अनुसंधान और अपने संगठित जीवन के उदाहरण और प्रभाव द्वारा ज्ञान का प्रसार तथा अभिवृद्धि करना। उन सिद्धान्तों के विकास के लिए प्रयास करना, जिनके लिए जवाहरलाल नेहरू ने जीवन-पर्यंत काम किया। जैसे - राष्‍ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता, जीवन की लोकतांत्रिक पद्धति, अन्तरराष्‍ट्रीय समझ और सामाजिक समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक दॄष्‍टिकोण।
...................................................................................................................................................................

मगर बेहद ही दुख के साथ कहना पड रहा है कि पिछले दिनों जे.एन.यू. के अंदर की देशद्रोह घटना की वीडियो कवरेज बाहर आने के बाद जब हमें यह पता चल रहा है कि यहां के न सिर्फ कुछ छात्र-छात्राएं देशद्रोही घटना में शामिल हैं बल्कि यहां के कुछ तथाकथित प्रोफेसर भी इसे अपना समर्थन दे रहे हैं, ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जे.एन.यू. जब अपने उददेश्‍यों से इतना भटक चुका है तो क्‍यों न इस प्रकार के विश्‍वविदयालय को नेस्‍तनाबूद कर दिया जाए तथा अब समय की यही मांग है कि इसे पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में लेने की दिशा में आवश्‍यक कार्रवाई की जाए तथा देशद्रोहियों के प्रति सख्‍त से सख्‍त कार्रवाई की जाए।
यह बेहद ही शर्म की बात है कि देश की राजधानी जिसे देश का दिल भ्‍ाी कहा जाता है वहीं के एक प्रसिद्ध विश्‍वविदयालय में इस तरह की खुलेआम घटना होती हो और दिल्‍ली पुलिस तक को इसके कैम्‍पस में घुसने के लिए काफी जददोजहद करनी पडती है वहीं दूसरी तरह हम आतंकी का पीछा करते हुए दूसरे देश की सीमा में घुसकर उसे मारने तक का दावा करते हैं।
राजनीतिक विरासत के लिए देशद्रोही गतिविधियों के प्रति इस तरीके से नरमी बरतना भविष्‍य के लिए अच्‍छा संकेत बिलकुल भी नहीं हैा कम से कम इस मुददे पर राजनीतिक रोटी सेकने की बजाए देश की एकता और अखंडता को ध्‍यान में रखते हुए सारे राजनैतिक दलों के आकाओं को एकजुटता दिखानी चाहिए।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

JNU men deshdroh sajish

जे.एन.यू जैसे विश्वविख्यात विश्वविदयालय में जो कुछ पिछले दिनों घटित हुआ वह घटनाक्रम वाकई सोचने को विवश करने वाला है। इसी विश्वविदयालय के कुछ छात्रों के समूह द्वारा पूरे देश को शर्मसार करने वाला वीडियो वायरल होने के बाद हम सभी यह सोचने को बाध्य हैं कि आखिरकार क्यों इनके द्वारा एक ऐसे आतंकी का महिमामंडन करते हुए न सिर्फ उसके लिए नारे लगाए गए बल्कि देशविरोधी नारे भी लगाए गए।

एक आतंकी के लिए इस तरह का प्रचार किया गया जैसे कि उसने देश की आजादी में अपने प्राण न्योछावर करते हुए शहादत पाई हो जबकि सच्चाई तो यही है कि देश के मंदिर कहे जाने वाले संसद पर आतंकवादी हमला करने में इस शख्‍स ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। शिक्षा के मंदिर में अपना भविष्य संवारने के लिए आए कुछ छात्रों द्वारा जो इस तरह के अनैतिक कार्य किए गए इससे न सिर्फ हिन्दुस्तान में अपितु पूरे विश्वय में इस विश्वविदयालय की गरिमा तार-तार हुई है ।

पिछले दिनों सहिष्णुता के नाम पर पूरे हिन्दुस्तान में बवाल काटा गया जिसकी परिणिती में कई सारे जाने माने लोगों ने तो अपने-अपने अवार्ड तक सरकार को वापस किए तथा कईयों ने भारत सरकार पर कठोर कटाक्ष तक किए। आज जबकि हालात सामने हैं खुलेआम देश की राजधानी में न सिर्फ आतंकवादी को शहीद का दर्जा देते हुए उसके पक्ष में नारेबाजी करते हुए कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा का नारा लगाया गया बल्कि 'पाकिस्तान जिंदाबाद, लडकर लेंगे आजादी, कश्मीर मांगे आजादी, भारत तेरे टुकडे होंगे, इंशाअल्लाह, इंशाअल्ला आदि । शिक्षा के मंदिर में इस तरह से खुलकर देशद्रोह का अपराध करते हुए जेएनयू के कई छात्रों का सरेआम अभिव्‍‍यक्ति की आजादी के नाम पर किया गया यह देशद्रोह जैसा अपराध किसी भी प्रकार से माफी के काबिल नही है। ऐसे छात्र किसी भी प्रकार से हमारे देश के भविष्‍य बिलकुल भी नहीं हो सकते।


मेरी जेएनयू विश्वसविदयालय के सभी बुदधजीवियों तथा देश के सभी राजनेताओं से नम्र अपील है कि वे सभी एक स्वर में देशद्रोहियों के प्रति किए जा रहे ठोस तथा सख्‍त कार्रवाई का समर्थन करें ताकि भविष्यि में हिन्दुतान की जमीन पर रहकर, यहीं का नमक खाकर कोई भी इस देश के प्रति गददारी, नमकहरामी करने से पहले सौ बार सोचे जिससे देश व देश के लोग संगठित तथा सुरक्षित रह सके।

सोमवार, 6 जुलाई 2015

Jharkhand Government : Tribal Areas/Scheduled Areas Allowance

भारत के राजपत्र में प्रकाशित, विधि व न्‍याय मंत्रालय, भारत सरकार के 11 अप्रैल, 2007 के आदेश के तहत झारखण्‍ड राज्‍य के कुछ जिलों जिसमें 1. रांची जिला, 2. लोहदगा जिला, 3. गुमला जिला, 4. सिमडेगा जिला, 5. लातेहार जिला, 6. पूर्वी सिंहभूम जिला, 7. पश्‍चिमी सिंहभूम जिला, 8. सरायकेला-खरसावां जिला, 9. साहेबगंज जिला, 10. दुमका जिला, 11. पाकुर जिला, 12. जामतारा जिला, 13. पलामू जिला -सतबरवा ब्‍लॉक की राबदा और बकोरिया पंचायतें, 14. गढवा जिला-भंडारिया ब्‍लॉक, 15. गोडडा जिला-सुंदर पहाडी और बौरीजोर ब्‍लॉक को अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया है। 


भारत सरकार के वित्‍त मंत्रालय के OM No.19(4)-E.IV(B)/70-Vol.II, dated 19.2.1972 जिसे OM No.17/1/98-E.II(B) dated 17.7.1998 तथा कार्यालय ज्ञापन संख्‍या 17(1)/2008-E.II(B) दिनांक 29 अगस्‍त, 2008 के तहत देय घोषित किए गए अनुसूचित क्षेत्र में कार्य करने वाले राज्‍य सरकार तथा केंद्र सरकार के कार्मिकों को अनुसूचित क्षेत्र भत्‍ता मिलने का प्रावधाना किया गया हैा 

भारत सरकार के 11 अप्रैल, 2007 के भारत के राजपत्र में प्रकाशन के बावजूद आज की तिथि तक झारखण्‍ड राज्‍य के कार्मिकों को देय अनुसूचित क्षेत्र भत्‍ता का लाभ नहीं मिल पाया है। इस दिशा में संबंधित अधिकारियों/प्रशासन के मातहतों को पहल करने की जरूरत है ताकि कार्मिकों को देय उनका हक मिल सके। 

विगत दिनों 4 जुलाई, 2015 के दैनिक भाष्‍कर के जमशेदपुर अंक के समाचार पत्र से मिली जानकारी के अनुसार हालांकि रेलवे ने झारखण्‍ड के उपरोक्‍त 15 जिलों में तैनात अपने कार्मिकों को अनुसूचित क्षेत्र भत्‍ता प्रदान करने की मंजूरी दे दी है। अब देखना है आखिर झारखण्‍ड सरकार के सरकारी कार्मिकों को आखिर कब तक उनका हक मिल पाता है। 







बुधवार, 29 अप्रैल 2015

मैं और मेरा अहंकार

बीते 30 मार्च, 2015 को अंतत: मैंने अपनी माँ को हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया।  वह चली गई, इस दुनिया को छोडकर हमेशा के लिए और अपने पीछे छोड गई मेरे लिए कई सवाल जिसके जवाब मैं खुद से पिछले कई दिनों से करता फिर रहा हूं। 

इन बीते 31 दिनों के खुद से सवाल-जवाब का निष्‍कर्ष यही है कि मेरे अंदर के अहंकार ने मुझसे मेरी मां को कम से कम 15 साल पहले जुदा कर दिया। मैंने अपने अहंकार की वजह से अपनी उस मां को हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया, जो दुनिया में सबसे ज्‍यादा मुझे मानती थी, सबसे ज्‍यादा मुझसे प्‍यार करती थी। 

खुद को सही मानकर सिर्फ और सिर्फ अहंकार की वजह से ही नहीं झुकने की सजा मुझे इतनी बडी मिली है, इसका एहसास आज जाकर मुझे हो रहा है। मैं आज बीच में दूसरों की बात बिलकुल भी नहीं करना चाहता, आज सिर्फ और सिर्फ मैं और मेरी मां के बीच की बात हो रही है, कोई बीच में नहीं, बिलकुल भी नहीं। 

मैंने अपनी उस मां को अपने अहंकार/अहम/दंभ  की वजह से खो दिया है जो मेरे जीवन की सारी सफलताओं की जिम्‍मेदार थी। मेरा बचपन में स्‍कूल जाना, हाईस्‍कूल में पढाई जारी रखना, कम्‍प्‍यूटर सीखना आदि सारी सफलताओं में मां एक जिम्‍मेदार तथा महत्‍तवपूर्ण कारक थी जिसके बिना कुछ भी संभव नहीं था। मगर मैंने उसे अपने अहंकार की वजह से खो दिया। 

क्‍या कुछ नहीं मिला मुझे विरासत में, संस्‍कार, सेवा भाव, परोपकार की भावना मगर न जाने कैसे मेरे पास इस तरह का अहंकार कैसे घर कर गया इसकी सजा का मैं आजीवन हकदार हूं। 

गुरुवार, 19 जून 2014

मेरा मन

मुझको मेरी मोहब्बत का
ऐ कैसा सिला मिला
खामोशी की चादर ओढ़े
अब सोने का जी करता है
तुझसे लिपट-लिपट कर
अब रोने का दिल करता है
तेरी मोहब्बत में फिर से बेकरार
अब होने का दिल करता है
खामोशी की चादर ओढ़े
अब सोने का जी करता है । 1 
 
ना जाने कहाँ तू चली गई
मेरी मोहब्बत से होकर अंजान
तेरी यादों में फिर से एकबार
अब खोने का दिल करता है
खामोशी की चादर ओढ़े
अब सोने का दिल करता है
तुझसे लिपट-लिपट कर
अब रोने का दिल करता है । 2 
 
मेरे दिल को तोड़ने वाले
ऐ संगदिल बेरहम
तेरे करीब फिर से एकबार
अब जाने का दिल करता है
खामोशी की चादर ओढ़े
अब सोने का जी करता है
तुझसे लिपट-लिपट कर
अब रोने का दिल करता है । 3 

मंगलवार, 17 जून 2014

क्यों

क्यों ख्वाबों की दुनियां में
हमें तुम दूर ले जाती हो
क्‍यों अनजान राहों में
हमें तुम अपना हमसफर बनाती हो
क्‍यों मोहब्बत के नगमें
हमें तुम सुनाती हो
क्‍यों पास अपने बुलाकर
हमें तुम अपनेपन का एहसास दिलाती हो
क्‍यों अपनी ज़ुल्फों की छांव में
हमें तुम सुलाती हो
क्‍यों झील सी निगाहों में
हमें तुम वफा के मंजर दिखाती हो
क्‍यों बांहों में बांहें डालकर
हमें तुम साथ जीने-मरने की कसमें खिलाती हो
क्‍यों ख्वाबों की दुनियॉं में
हमें तुम दूर ले जाती हो ।।

सोमवार, 16 जून 2014

तेरी आशिक़ी

बेरहम दुनिया के अनजान रास्‍ते
तनहाई भरे सफर में खुद को तलाशते
पूछता है दिल, अब कौन है अपना
हकीकत के आईने में अब टूट गया सपना
पूछता है दिल, अब कौन है अपना ।।1।।
 
बेवफाओं की मंडी में वफा की कहानी
तूझसे मोहब्‍बत करके क्‍यों की नादानी
मोहब्‍बत की राहों में अब
खुद को संभालते
पूछता है दिल, अब कौन है अपना
जख्‍म दिल के अब खुद ही है सहना
पूछता है दिल, अब कौन है अपना ।।2।।
 
तेरी आशिकी में बीताए लम्‍हें
लगने लगे हैं अब मुझको बेमानी
बेबस निगाहों में अब
सूखे समन्‍दर सा पानी
पूछता है दिल, अब कौन है अपना
छूट गया है अब तेरी गलियों से भी गुजरना
पूछता है दिल, अब कौन है अपना ।।3।।

गुरुवार, 5 जून 2014

Shadab Shafi, Doctor, Tata Main Hospital, Jamshedpur

Shadab Shafi, Doctor, Tata Main Hospital, Jamshedpur की करतूत
 
पिछले दिनों 31 मई, 2014 को संध्या 6 बजे के करीब मैं टीएमएच में भर्ती हुआ था। मुझे उस वक्त ठंड लगकर बुखार की शिकायत थी। मैं टीएमएच के 3ए वार्ड के बेड नं. 15 में एडमिट हुआ था। मेरा बेड दो बेडों के बीच में था, मेरे बेड के बाएं साइड बेड नं. 14 पर एक लगभग 65 वर्ष का बूढा मरीज एडमिट था जिसे शायद अस्थमा की शिकायत थी।
 
दिनांक 1 जून, 2014 दिन रविवार की बात है उस समय संध्या के लगभग 7 बज रहे होंगे। बेड सं. 14 के बूढे मरीज की तबीयत अचानक ही खराब हो गयी, वह बहुत ही जोर जोर से खांस रहा था तथा उसकी सांस तेजी से फूल रही थी। मेरे ख्याल से उसे अस्थमा का अटैक आया था। उस वक्त मुझसे मिलने मेरे एनएमएल में मेरे साथ काम करने वाले श्री केजी साइमन भी आए हुए थे। मैं उनसे बात कर रहा था तथा बीच बीच में उस बूढे मरीज की तेज कराहती आवाज बरबस हम दोनों का ध्यान उस ओर खींच रही थी तभी श्री साइमन ने मुझसे बिना चीनी की चाय लाने की बात कही और वार्ड से बाहर की ओर निकल गऐ।
 
बगल के बेड संख्या् 14 पर अफरा तफरी का महौल बना हुआ था। उस वक्त उस मरीज का कोई रिलेटिव उसके आस पास नहीं था। सिर्फ नर्स और वार्ड व्वा य इधर उधर दौड रहे थे तभी मैंने देखा कि एक नर्स ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर आयी और उससे मास्क निकालकर उस बूढे मरीज को लगाया मगर बूढा मरीज जोर जोर से कराहता हुआ तेज आवाजे निकाल रहा था, और हर तेज आवाज के बाद ऐसा लग रहा था कि अब उसकी सांस इस कराहने के बाद रूकने वाली है। नर्स से हालात नहीं संभल रहे थे। वह दौडकर केबिन की ओर भागी तभी देखा वार्ड के केबिन की ओर से एक रंगीन शर्ट पहने एक आदमी उस बेड की ओर आ रहा था। गौर से देखा तो उसके कंधे पर डॉक्टरों द्वारा रखने वाला यंत्र पाया तब मुझे समझ में आया कि यह तो कोई डॉक्टेर है फिर लेटे हुए ही मैंने अपना सर बेड नं. 14 की तरफ कर दिया।
 
वह डॉक्टर बेड नं. 14 के मरीज के बेहद ही करीब पहुंचा, उस वक्त भी मरीज जोर जोर से सांस लेता हुआ कराहता हुआ काफी तेज आवाज निकाल रहा था। स्थिति पूर्व की तरह ही बनी हुई थी। डॉक्टर वहां पहुंचा और मरीज के मास्क पर अपना हाथ रखा और झल्लाते हुए कहने लगा ' ‍मुंह बंद कर ' मगर मरीज जो कि बिलकुल ही असामान्य हालत में था, उस वक्त उसे कुछ भी आवाज शायद नहीं समझ में आ रही होगी इसलिए वह पूर्व की तरह ही जोर जोर से कराहते हुए आवाजें कर रहा था, इस पर वह डॉक्टर फिर से लगभग चिल्लाते हुए तीन बार 'मुंह बंद कर-मुंह बंद कर-मुंह बंद कर' कह गया मगर जब इस पर भी उस बूढे मरीज पर कोई प्रति्क्रिया नहीं हुर्इ और वह पूर्व की तरह जोर जोर से सांसे लेता हुआ कराहता हुआ चिल्लाता ही रहा तो अंत में वह डॉक्टर यह कहते हुए कि 'मर साले' आने हाथ में लिए कपडे के किसी चीज को उसके बेड पर फेंक दिया और वार्ड 3ए में नर्स के केबिन की ओर तेजी से बढ् गया।
मेरा चेहरा जो कि बेड नं. 14 की तरफ ही था और सारी बातें मेरे सामने किसी भयावह सपने की तरह अचानक ही घटित हो चुकी थी। मुझे समझ में ही नहीं आया कि मैं आखिर क्या करूँ। मैं पिछले लगभग 24 घंटों से अपने बेड पर लगभग बेसुध सा पडा था इतना कुछ देखने के बाद न जाने मुझमें कहां से शक्ति आई और मैं अचानक ही उठ खडा हुआ और धीरे धीरे एक एक बेड पकड पकड पर वार्ड 3 ए के नर्स केबिन तक पहुंचा जहां वह डॉक्टर जाकर बैठ गया था तथा कुछ लिख रहा था। वहां पहुंचकर मैंने उससे कहा 'डॉक्टर आपने क्या किया है, एक पेशेंट के साथ क्या ऐसी हरकत की जाती है, डाक्टर तो भगवान का रूप होता है मगर आपने उस मरीज के साथ कैसा बर्ताव किया है, चलिए उस मरीज से जाकर अभी माफी मांगिए' मेरा इतना कहना था कि वह डॉक्टर आग बबूला हो गया और उसने मुझसे झल्‍लाते हुए कहा 'कौन हो तुम, उस मरीज कोई रिलेटीव हो क्या' जब मैंने उससे कहा कि 'नहीं मैं कोई रिलेटिव नहीं हॅूं और क्या गलत काम को रोकने के लिए बोलने के लिए क्‍या किसी का रिलेटिव होना जरूरी है' इस पर उस डॉक्टर ने मुझे धमकाते हुए लहजे में कहा 'चुपचाप जाकर अपने बेड पर बैठो नहीं तो अभी सिक्यूरिटी बुला लूंगा' इतना सुनने के बाद मैंने कहा कि 'डॉक्टर आप अपना नाम बताइए, आपका कमप्‍लेन करना है' इस पर उस डॉक्टर ने कहा 'जाओ जहां जाना है जिसे कमप्‍लेन करना है करो, मैं देख लूंगा' इसके बाद मैंने वहां खडे सभी नर्सों से उस डाक्टर का नाम जानना चाहा मगर किसी भी नर्स ने उस समय उस डॉक्टर का नाम तक मुझे नहीं बताया और इतना ही नहीं जब मैंने टीएमएच में डॉक्टर का कमप्‍लेन करने के लिए किसी मोबाइल नम्बर आदि की मांग की तो वह भी मुझे नहीं दिया गया।
इसके बाद मैं किसी तरह धीरे धीरे करके टीएमएच के मुख्य द्वार स्थित इमरजेंसी कक्ष गया और वहां से आरएमओ का मोबाइल नम्बर प्राप्त किया तथा उस मोबाइल नम्बर पर फोन करने पर मुझे टीएमएच के कस्टमर केयर यूनिट के किसी दिवाकर जी का मोबाइल नम्बर दिया गया तथा अपनी शिकायत उनसे करने की बात कही गयी।
मैंने तत्काल ही टीएमएच के कस्टमर केयर यूनिट के दिए गए मोबाइल नम्बर पर अपनी शिकायत दर्ज करायी और सारे वाकये की जानकारी दी ।
कुछ देर बाद ही मुझे यह जानकारी प्राप्त हो चुकी थी कि एक बूढे मरीज से जानवरों सा सलूक करने वाले सख्स का नाम शफी शादाब है जो लोयोला स्कूल का छात्र रहा चुका है तथा जिसने अपनी मेडिकल की पढाई श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज व हास्पीटल मुजफफरपुर से पूरी की तथा दो वर्षों तक वह टाटा मोटर्स अस्पताल में अपनी सेवा दे चुका है तथा 1 जून 2013 से वह टीएमएच में बतौर चिकित्सक कार्यरकत है।
टाटा मेन हास्पीटल, जमशेदपुर जैसे नामी अस्परताल में कार्यरत शफी शदाब जैसे डॉक्टर की यह करतूत एक डॉक्टर के पेशे को न सिर्फ कलंकित करती है बल्कि टीएमएच के मान सम्मान और प्रतिष्ठा में भी एक काला धब्बा लगाती है । ऐसे ही गिने चुने कुछ चंद डॉक्टरों की करतूतों से जमशेदपुर स्थित टीएमएच की प्रतिष्ठा दिन प्रतिदिन धूमिल होती जा रही है।
अगले दिन 2 जून 2014 को मैंने टीएमएच के वार्ड 3ए की शिकायत पंजिका में उपरोक्त् घटना की विस्तृत जानकारी दी तथा उस डॉक्टर पर आवश्यरक कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। इसके साथ ही टीएमएच के कस्टमर केयर यूनिट के दिवाकर जी द्वारा 2 जून 2014 को सुबह के लगभग 10 बजे घटना के संबंध में जानकारी ली गयी तथा मेरे शिकायत के आलोक में आवश्यक कार्रवाई करने का भरोसा दिलाया गया।
सभी से मेरी गुजारिश है कि कृपया इस घटित सच्ची घटना को अधिक से अधिक लोग शेयर करके इस घटना की तथा टाटा मेन हास्‍पीटल के डॉक्‍टर शफी शादाब की पुरजोर तरीके से निंदा करें तथा टीएमएच जमशेदपुर प्रबंधन उस डॉक्टर के खिलाफ सख्त से सख्‍त कार्रवाई करें ।