We are all INDIAN before a Hindu, Muslim, Sikh aur Isai or a Bihari, Marathi, Bengali etc. Love to all human being........
सोमवार, 18 जुलाई 2011
उम्मीद
मधुशाला
जीवन के भाग दौड में
जब अस्त हो जाए सफर
पी लेना तू सब्र का प्याला
मत जाना प्यारे मधुशाला
मधुशाला है धैर्य विहीन संसार
जो पौरुष का नाश कर देता है
पुरुषार्थ जिससे विनाश हो जाता है
परमार्थ जिसका परित्याग कर देता है
मंजिल की राहों में जब
हर सफर थम जाए दो राहे पर आकर
पी लेना तू सब्र का प्याला
मत जाना प्यारे मधुशाला
मधुशाला के सोमरस में
डूबते ही तुम पाओगे
रिश्ते नातों की तकरार
कर्तव्य विहीन संसार
क्षणिक सुख की प्रत्याशा में
संसारिक दायित्यों को
भूलते ही तुम जाओगे
पी लेना तू सब्र का प्याला
मत जाना प्यारे मधुशाला
जब अस्त हो जाए सफर
पी लेना तू सब्र का प्याला
मत जाना प्यारे मधुशाला
मधुशाला है धैर्य विहीन संसार
जो पौरुष का नाश कर देता है
पुरुषार्थ जिससे विनाश हो जाता है
परमार्थ जिसका परित्याग कर देता है
मंजिल की राहों में जब
हर सफर थम जाए दो राहे पर आकर
पी लेना तू सब्र का प्याला
मत जाना प्यारे मधुशाला
मधुशाला के सोमरस में
डूबते ही तुम पाओगे
रिश्ते नातों की तकरार
कर्तव्य विहीन संसार
क्षणिक सुख की प्रत्याशा में
संसारिक दायित्यों को
भूलते ही तुम जाओगे
पी लेना तू सब्र का प्याला
मत जाना प्यारे मधुशाला
रविवार, 10 जुलाई 2011
आत्महत्या की तीसरी असफल कोशिश - 2001
वर्ष 2001 मेरी जिंदगी के लिए काफी उथल पुथल रहा। अपनी शादी के लिए मैंने काफी ना नुकर किया। पिताजी ने मुझसे यहाँ तक कह दिया कि यदि तुम्हारे जीवन में कोई लड़की है तो उसी से कर लो मगर मैंने अपने पिताजी को स्पष्ट कह दिया था कि लड़की तो है पापा मगर वो मुझे नहीं चाहती, यह सुनकर पिताजी ने कहा कि फिर जहां हमारी इच्छा है वहाँ कर लो, इसके बाद मेरे बहनोई तथा अन्य रिश्तेदारों के मानसिक यंत्रणा के परिणामस्वरूप मैंने अंतत: अपनी शादी के लिए हां कर दी। मेरी शादी के लिए कई फोटो भी आ गए तथा लडकी देखने का सिलसिला आरंभ भी हो गया। मेरी यही शर्त थी कि लडकी देखने मैं कतई नहीं जाउंगा जिसे मेरे घरवालों ने मान लिया। अंतत: मेरा रिश्ता तय भी हो गया। घरवालो ने लडकी देखी और उन्हें पसंद आ गया।
इस सबके बीच मैं पूरी तरह से मानसिक अवसाद से गुजर रहा था। मैंने अपनी जिंदगी में उस सख्श को छोड किसी और की कल्पना कभी नहीं की थी मगर आज ऐ सब कुछ हो रहा था वो भी मेरी मर्जी के बाद ही। मैं पूरी तरह से व्याकुलता के हद से बाहर था।
इसी बीच वेलेंटाइन्स डे के दिन मैं चुपके से बिना लडकी वाले के परिवार के लोगों बताए उसके घर भी चला गया था हाथ में गुलाब का फूल लिए और फिर कुछ देर तक लडकी तथा उनके सारे बहनों से अच्छी खासी बातें भी की मगर इस सब के बावजूद मैं अंदर से खुद को बिखरा-बिखरा सा महसूस कर रहा था। मुझमें जीने की ललक खत्म सी होती जा रही थी। न जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा था कि मैं कुछ गलत कर रहा हॅूं।
इसी उधेडबुन में 20 मई, 2001 की रात मैं जबकि घर में अकेला था परिवार के बाकी सारे सदस्य गांव में पूजा देने गए हुए थे। मैंने अपनी बीती नई जिंदगी जो मेरे अनुसार वर्ष 1994 से आरंभ हुई थी को खंगाल डाला और अचानक ही मैंने यह फैसला ले लिया कि अब इस जिंदगी में मैं जी नहीं सकता। जिसकी मोहब्बत ने मुझे यह नई जिंदगी दी यदि वही आज मेरे साथ नहीं तो फिर मेरे लिए इस जिंदगी के कुछ भी मायने बाकी नहीं। यही सब कुछ सोचकर मैंने अंतत: फैसला कर लिया कि अब नहीं जीना इस जींदगी को और फिर मैंने रात को घर में खोजना आरंभ किया जिससे मैं अपनी जिंदगी को समाप्त कर सकूं। थोडी ही देर में मेरे हाथों में एसिड की बोतल थी जो दरअसल बाथरूम साफ करने के लिए लाई गयी थी। मैंने अपने आप को सयंमित करते हुए बोतल में रखे एसिड को एक स्टील के ग्लास में डाली और उसे अपने हाथों में लेकर अपने मुंह तक लाया फिर अचानक मेरे आंखों के सामने एक मोहक मुस्कान जिंदगी की आ गई। मेरे दिल में उसे एक बाद देख लेने उससे अंतिम बार मिलकर उससे कुछ बातें कर लेने का ख्याल घर आया। न चाहते हुए भी आज मैं अपने दिल के हाथों हार गया और फिर मैंने यह सोच लिया कि एक बार अंतिम बार उससे मिल लेता हूं, दिल की बातें कुछ कह लेता हॅूं फिर मौत को गले लगा लूंगा। ऐसा सोचकर मैंने उस ग्लास भरे एसिड को दुबारा एसिड की बोतल में डाल दिया। अचानक मेरी नजर गई तो देखा कि स्टील के ग्लास के अंदर का रंग पूरी तरह बदरंग हो चुका था।
अगले ही दिन मैंने अपनी एक दीदी से अपनी उस जिंदगी से मिलाने का आग्रह किया तो वह मुझसे बोली कि अब क्यों मिलना चाहते हो, अब तो तुम्हारी शादी होने जा रही है। मैंने उससे अपने दिल की सारी बातें कह दी। इस पर उसने मुझे भरोसा देते हुए कहा कि मैं कोशिश करती हॅूं।
मगर अगले ही दिन मुझे उस दीदी ने बताया कि मेरी उस जिंदगी ने कहा कि वह नहीं मिलना चाहती है मुझसे, वह बोल रही थी कि "शादी हो रहा था तो बहुत खुश था, अब क्यों मिलना चाहता है वो मुझसे"।
इसके बाद मैं टूट कर बिखर गया और मुझमें हिम्मत नहीं रही मौत को गले लगाने की क्योंकि दिल कमबख्त आखिरी बार उससे मिलना चाहता था, एक अंतिम बार उसका करीब से दीदार करना चाहता था, दिल में दफन कुछ बातें उससे करना चाहता था। मगर शायद मेरे ईश्वर को यह मंजूर नहीं था।
आज भी जिंदा ही हॅूं और यह जिंदगी उसके बिना जी भी रहा हॅूं।
आत्महत्या की पहली असफल कोशिश - 1994
मुझे अच्छे से याद है वर्ष 1994 का वह साल था जबकि मैं के.एम.पी.एम. इण्टर कॉलेज के प्रथम वर्ष का छात्र था। वही पिताजी वाली साइकिल से लालबिल्डिंग के अपने घर से बिष्टुपुर स्थित कॉलेज जाना तथा वापस आना। कभी कभार पैदल ही स्टेशन जाकर वहां से बस पकडकर कॉलेज जाना तथा वापस आना। पढाई - लिखाई से संबंधित कभी कोई प्रश्न मेरे पिता ने मुझसे न तो बाल्यवस्था में पूछे थे और न ही कॉलेज लाइफ में। उन्हें कोई मतलब ही कभी नहीं रहा कि उनके बच्चे क्या-कहां-कब पढ रहे हैं, पढ भी रहें हैं कि नहीं। उनके लिए जिंदगी सामाजिक कार्य से लेकर घर के बगान तक सीमित रहती।
1994 के अगस्त महीने में मैंने आत्महत्या की पहली नाकाम कोशिश की थी। क्यों की थी आज तक मैंने यह बात किसी से शेयर नहीं की है। मगर अब लगता है कि अब इसे मैं अपने दिल के अंदर दबा कर और नहीं रख सकता। इसलिए आज बहुत दिनों के बाद काफी सोचने समझने के बाद इसके उपर से पर्दा उठाने जा रहा हॅूं।
मैंने बचपन से यही देखता आया कि किसी भी प्रकार की कोई समस्या होने पर उस समस्या के निराकरण के बदले मेरे पिताजी उस समस्या को लेकर किसी मेरी मां पर ही ताना कसने लगते थे तथा सभी प्रकार की समस्याओं को लेकर मेरी मां पर ही दोषारोपण करते थे। मेरे साथ भी वर्ष 1994 में लगभग यही हुआ। घटना वाले दिन किसी बात को लेकर मैंने अपने सबसे छोटे भाई को डांटा तथा उसकी पिटाई कर दी। इसके बाद वह मेरी शिकायत लेकर मेरे पिताजी के पास चला गया। मेरे पिताजी तुरंत इस बात को लेकर उसके सामने ही मुझे खरी खोटी सुनाने लगे तथा कहने लगे कि अभी मैं जिंदा हॅूं यदि यह कुछ गलत करता है तो आप मुझसे कहें आपको हाथ उठाने की डांटने की कोई आवश्यकता नहीं हैा यह बात मेरे दिल घर कर गई। मैंने अपने छोटे भाई को उसकी गलती के कारण डांटा था और थोडी पिटाई कर दी थी, क्या बडा भाई यह सब कुछ नहीं कर सकता मगर मुझे मेरे अधिकारों को सीमित कर दिया गया और मुझे ऐसा लगा कि मेरे छोटे भाई के सामने मुझे फटकार लगाकर मुझे जलील किया गया। यह सब कुछ मैं सहन नहीं कर पाया और मैंने तुरंत ही एक फैसला ले लिया। इस जिंदगी को छोडने का।
इसके बाद मैंने घर में रखे रेट प्वाइजन के चार पैकेट को लेकर अपने रूम में गया और सबके पैकेट को फाडकर अपने हथेली में लिया और फिर मेरे सामने जिंदगी और मौत की जंग जारी हो गयी। न जाने कैसे कैसे ख्यालात मेरे जेहन के आमने-सामने से आर-पार होते चले जा रहे थे। मैंने अचानक ही अपने हथेली को अपने मुंह के अंदर रख दिया। अंदर जाते ही मुझे अजीब सा स्वाद महसूस होने लगा तो फिर मैं तुरंत अपने घर के किचन के अंदर गया और वहां से सूखा दूध जो चाय बनाने के लिए घर में लाया जाता है, अमूल स्प्रे दो चम्मच लेकर अपने मुंह में डाला और फिर निगल लिया।
थोडी देर के बाद मैं इण्टर की टयूशन के लिए चला गया। लगभग दो घंटे बाद टयूशन से वापस आने के बाद मैं अपने रूम के बिस्तर पर लेट गया। तभी मेरा मित्र जो मेरे साथ टयूशन पढ रहा था वह भी मेरे रूम में आया और मुझसे पूछने लगा क्या बात है आज तुम्हारी तबीयत कुछ खराब लग रही था। कोई परेशानी तो नहीं। मैंने जवाब देते हुए उसे कहा - नहीं ऐसी कोई बात नहीं। फिर उसने जिद करते हुए कहा, - मुझसे कुछ मत छुपाओ, मैंने देखा आज तुम ठीक से टयूशन में नहीं थे। फिर मैंने उससे कहा - एक बात कहूं किसी से बताओगे तो नहीं, उसने कहा - नहीं, मैंने उससे कहा - मैं अब इस दुनियां से जा रहा हॅूं, यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो तो मुझे माफ करना। मेरे इस बात पर वह मुझसे पूछा - क्या बात कह रहे हो मुझे कुछ बताओ भी, मैंने कहा - मैंने रेट प्वाइजन खा लिया है और अब मुझे ऐसा लग रहा है कि जल्द ही मैं इस दुनिया से दूसरी दुनिया की ओर जाने वाला हॅूं। मेरा इतना कहना था कि मेरा दोस्तु चिल्लाते हुए मेरे घर के उस ओर भागा जहां मेरी मां थी और कहने लगा - चाची सुमन ने जहर खा लिया है।
घर वाले सारे आवाक होकर मेरे रूम की और दौडे और मुझे अस्पताल ले जाने की कोशिश करने लगे मगर मैं किसी कीमत पर अस्पताल जाने को तैयार नहीं था तभी मेरे टयूशन के सर आ गए और मुझे डांट फटकार कर जबरदस्ती कर एक टेम्पो में बिठाया और अस्पताल भेजा। अस्पताल जाने समय मैं लगभग बेहोशी की सी अवस्था में था। मुझे थोडा बहुत याद आता है वह लम्हा जब वह टेम्पो रेलवे की क्रासिंग पर रोक दिया गया था क्योंकि ट्रेन आने वाली थी तभी मेरा दोस्त मनीष टेम्पो से उतरकर क्रासिंग वाले पहरी से मेरी जान बचाने के लिए क्रासिंग खोलने को कह रहा था। उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं।
अस्पताल पहुंचने पर मेरे नाक के रास्ते से एक पाइप डाल दिया गया था तथा उसमें कुछ लिक्विड डालकर मुझे उल्टी करायी जाती रही।
लगभग दो दिनों तक अस्पताल के बिस्तर की शोभा बनकर मैं वापस घर चला आया मगर अपने साथ इस हकीकत को आज तक छुपाता फिरता रहा कि मैंने आखिर आत्महत्या की कोशिश की क्यों थी। मेरे पिताजी वो भी अंजान की ही तरह हर बार मुझसे पूछते रहे कि आखिर क्या बात है बेटा मगर मैंने आज तक उनसे यह बात नहीं बतायी। उस समय न तो मेरी जिंदगी में कोई लडकी थी जिसकी लिए मैं आत्महत्या जैसा कदम उठाने की सोचता।
आत्महत्या की असफल कोशिश ने मुझे जिंदगी से बेजार कर दिया था। इसके बाद जीवन जीने की कल्पना मात्र भी मेरे लिए एक सजा से कुछ कम नहीं थी, ठीक इसी समय मेरे दिल में जिंदगी बनकर एक शख्स ने अपनी दस्तक दी। जिसकी बदौलत मैं जिंदगी जीने को विवश हुआ सिर्फ यही सोचकर कि इसके साथ तो मैं दो खज में भी अपना जीवन गुजार सकता हॅूं मगर परिस्थितियां ऐसी हुई कि आज मैं यहां और वो न जाने कहां किस भीड में गुम हो चुकी है।
सबसे मजेदार बात तो यह कि जिसने मुझे जिंदगी से मोहब्बत कराया उसी को मैं अपनी मोहब्बत का फलसफां समझाने में नाकाम रहा।
इसके बाद मैंने घर में रखे रेट प्वाइजन के चार पैकेट को लेकर अपने रूम में गया और सबके पैकेट को फाडकर अपने हथेली में लिया और फिर मेरे सामने जिंदगी और मौत की जंग जारी हो गयी। न जाने कैसे कैसे ख्यालात मेरे जेहन के आमने-सामने से आर-पार होते चले जा रहे थे। मैंने अचानक ही अपने हथेली को अपने मुंह के अंदर रख दिया। अंदर जाते ही मुझे अजीब सा स्वाद महसूस होने लगा तो फिर मैं तुरंत अपने घर के किचन के अंदर गया और वहां से सूखा दूध जो चाय बनाने के लिए घर में लाया जाता है, अमूल स्प्रे दो चम्मच लेकर अपने मुंह में डाला और फिर निगल लिया।
थोडी देर के बाद मैं इण्टर की टयूशन के लिए चला गया। लगभग दो घंटे बाद टयूशन से वापस आने के बाद मैं अपने रूम के बिस्तर पर लेट गया। तभी मेरा मित्र जो मेरे साथ टयूशन पढ रहा था वह भी मेरे रूम में आया और मुझसे पूछने लगा क्या बात है आज तुम्हारी तबीयत कुछ खराब लग रही था। कोई परेशानी तो नहीं। मैंने जवाब देते हुए उसे कहा - नहीं ऐसी कोई बात नहीं। फिर उसने जिद करते हुए कहा, - मुझसे कुछ मत छुपाओ, मैंने देखा आज तुम ठीक से टयूशन में नहीं थे। फिर मैंने उससे कहा - एक बात कहूं किसी से बताओगे तो नहीं, उसने कहा - नहीं, मैंने उससे कहा - मैं अब इस दुनियां से जा रहा हॅूं, यदि मुझसे कोई भूल हो गई हो तो मुझे माफ करना। मेरे इस बात पर वह मुझसे पूछा - क्या बात कह रहे हो मुझे कुछ बताओ भी, मैंने कहा - मैंने रेट प्वाइजन खा लिया है और अब मुझे ऐसा लग रहा है कि जल्द ही मैं इस दुनिया से दूसरी दुनिया की ओर जाने वाला हॅूं। मेरा इतना कहना था कि मेरा दोस्तु चिल्लाते हुए मेरे घर के उस ओर भागा जहां मेरी मां थी और कहने लगा - चाची सुमन ने जहर खा लिया है।
घर वाले सारे आवाक होकर मेरे रूम की और दौडे और मुझे अस्पताल ले जाने की कोशिश करने लगे मगर मैं किसी कीमत पर अस्पताल जाने को तैयार नहीं था तभी मेरे टयूशन के सर आ गए और मुझे डांट फटकार कर जबरदस्ती कर एक टेम्पो में बिठाया और अस्पताल भेजा। अस्पताल जाने समय मैं लगभग बेहोशी की सी अवस्था में था। मुझे थोडा बहुत याद आता है वह लम्हा जब वह टेम्पो रेलवे की क्रासिंग पर रोक दिया गया था क्योंकि ट्रेन आने वाली थी तभी मेरा दोस्त मनीष टेम्पो से उतरकर क्रासिंग वाले पहरी से मेरी जान बचाने के लिए क्रासिंग खोलने को कह रहा था। उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं।
अस्पताल पहुंचने पर मेरे नाक के रास्ते से एक पाइप डाल दिया गया था तथा उसमें कुछ लिक्विड डालकर मुझे उल्टी करायी जाती रही।
लगभग दो दिनों तक अस्पताल के बिस्तर की शोभा बनकर मैं वापस घर चला आया मगर अपने साथ इस हकीकत को आज तक छुपाता फिरता रहा कि मैंने आखिर आत्महत्या की कोशिश की क्यों थी। मेरे पिताजी वो भी अंजान की ही तरह हर बार मुझसे पूछते रहे कि आखिर क्या बात है बेटा मगर मैंने आज तक उनसे यह बात नहीं बतायी। उस समय न तो मेरी जिंदगी में कोई लडकी थी जिसकी लिए मैं आत्महत्या जैसा कदम उठाने की सोचता।
आत्महत्या की असफल कोशिश ने मुझे जिंदगी से बेजार कर दिया था। इसके बाद जीवन जीने की कल्पना मात्र भी मेरे लिए एक सजा से कुछ कम नहीं थी, ठीक इसी समय मेरे दिल में जिंदगी बनकर एक शख्स ने अपनी दस्तक दी। जिसकी बदौलत मैं जिंदगी जीने को विवश हुआ सिर्फ यही सोचकर कि इसके साथ तो मैं दो खज में भी अपना जीवन गुजार सकता हॅूं मगर परिस्थितियां ऐसी हुई कि आज मैं यहां और वो न जाने कहां किस भीड में गुम हो चुकी है।
सबसे मजेदार बात तो यह कि जिसने मुझे जिंदगी से मोहब्बत कराया उसी को मैं अपनी मोहब्बत का फलसफां समझाने में नाकाम रहा।
गुरुवार, 23 जून 2011
कल और आज
आज 21 जून, 2011 हैा बीता कल 20 जून, 2011 था। आज ही के दिन अर्थात 20 जून, 2006 को मैंने दुर्गापूर में सरकारी कर्मचारी के रूप में कार्यभार ग्रहण किया था। एक सरकारी नौकरी जिसने मेरी जिंदगी ही पूरी तरह से बदल दी। क्या से क्या हो गया। 20 जून, 2006 से पहले के समय के बारे में कभी सोचता भी हूं तो सिहर जाता हॅूं। क्या जिंदगी थी।
सुबह 09.15 से 05.45 तक की ड़यूटी फिर 6.15 के करीब घर वापस आकर तैयार होकर रात 08 बजे से 01.30 बजे की दूसरी ड़यूटी को जाना फिर लगभग 2 बजे के करीब घर वापस आना। 3 से 4 बजे के करीब सुबह में सोना फिर सुबह 8.30 बजे उठकर पहली ड़यूटी की तैयारी में लग जाना। कभी कभी तो दूसरी ड़यूटी सुबह 2 बजे के बाद ही खत्म होती।
इतना भागदौड करने के बावजूद हाथों में महज 5500/- पांच हजार पांच सौ के करीब राशि का आना और इससे अपने छोटे से परिवार को चलाने के लिए गुत्थमगुत्थी करना।
वक्त बदला, मेरी मेहनत से ज्यादा मेरी किस्मत का हाथ रहा इसमें। 20 जून, 2006 को जब मैंने एक सरकारी कार्मिक के रूप में अपना कार्यभार संभाला तो उस समय मेरे हाथों में लगभग सबकुछ काटने के बाद 5000/- की राशि मिलने लगी। रहने का घर, पानी, बिजली और चिकित्सा सुविधा नि:शुल्क हो जाने के कारण 5000/- की राशि में मुझे सारा जहान नजर आने लगा। मैं खुद को दुनिया का सबसे अमीर आदमी मानने लगा।
वर्तमान में मैं जमशेदपुर वापस आ चुका हूँ। इस बीच मेरी पदोन्नति भी हो चुकी है। परिवार भी बढ चुका हूँ। अब मैं और मेरी पत्नी के साथ मेरे दो छोटे बच्चे भी हैं। जिन्दगी की गाडी चल रही है। बीच बीच में अवरोध आते रहते हैं मगर इससे कोई फर्क नहीं पडता। ईश्वर पर आस्था है और उस पर भरोसा है।
कल और आज के दरम्यान काफी कुछ बदला हुआ है। अगर कुछ नहीं बदला तो सिर्फ मेरी सोच। मैंने काफी तंग हालात में अपना बचपन बीताया है मैं उन हालातों में अपने बच्चों को नहीं देखना चाहता। यही कारण है कि आज लगभग 15000/- का वेतन होने के बावजूद मेरे पास महीने के अंत में एकाउंट राफ साफ रहता है। कई बार तो महीने के 15 तारीख के बाद ही अफरातफरी का माहौल बन जाता है। परंतु इसके बावजूद मुझे लगता है कि दुनिया का सबसे अमीर आदमी मैं ही हॅूं। पिछले ही दिनों जबकि मेरे बैंक एकाउंट में सिर्फ 72 रुपए बचे थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अब 20 जून के बाद से 30 जून तक का सफर कैसे कटेगा। इसी उधेडबून में अपने बॉस से मैंने यह आग्रह किया कि ट़यूशन फी का बिल पेमेंट यदि कर दिया जाए तो अच्छा होगा और साथ ही मैंने अपने व्यक्तिगत परेशानी की बात भी उनसे कह दी। उन्होंने अपनी हामी भरी और मैं लग गया ट़यूशन फी के बिल को बनाने में तकरीबन 2 से 3 दिनों में ही बिल तैयार कर मैंने उस बिल का पेमेंट करा लिया। 20 तारीख को ही ट़यूश्न फी के मद में मुझे 6740/- रुपए प्राप्त हुए।
क्या से क्या बदल गया है बीत कल और आज में, कहां 2006 में मेरी पूरी सैलरी ही 5000/- के करीब होती थी और कहां आज मुझे बच्चे को पढाने के मद में 6740/- का भुगतान हो रहा है।
यह सब कुछ देखकर तो यही लगता है कि मैं जो कुछ इस ऑफिस को दे रहा हॅूं वो बहुत ही कम है मुझे दिए जा रहे वेतन की तुलना में मेरे द्वारा किया जा रहा काम बहुत ही कम है। कहां मैं रोजाना 13 से 14 घंटे काम करके 5500/- कमा पाता था और कहां आज मुझे तकरीबन 15000/- रुपए सैलरी मिलती है वो भी रोजना 8 घंटे के काम के बदले जबकि साप्ताहिक छुट़टी दो दिनों की है। ऐसे में मुझे हर पल ऐसा एहसास होता है कि मैं इस ऑफिस के साथ नाइंसाफी कर रहा हॅूं। मुझे और भी मेहनत करना चाहिए तथा अपना इफोर्ट और भी देना चाहिए। इस दिशा में मैं प्रयासरत्न भी हॅूं यही कारण है कि मैं न सिर्फ मुझे दिए गए कार्य को कर रहा हॅूं बल्कि नए नए काम में भी अपना योगदान देने की कोशिश करता रहता हॅूं।
दुर्गापूर कार्यालय के लगभग सभी सहयोगियों को मैं भुला नहीं सकता। सिर्फ 2 वर्ष और कुछ महीनों के अपने कार्यकाल में ही मेरी घनिष्ठता अनेक लोगों से हो चुकी थी जो आज तक कायम है और आशा ही नहीं पूर्ण विश्वाष है कि आने वाले कल को भी कायम ही रहेगी।
सुबह 09.15 से 05.45 तक की ड़यूटी फिर 6.15 के करीब घर वापस आकर तैयार होकर रात 08 बजे से 01.30 बजे की दूसरी ड़यूटी को जाना फिर लगभग 2 बजे के करीब घर वापस आना। 3 से 4 बजे के करीब सुबह में सोना फिर सुबह 8.30 बजे उठकर पहली ड़यूटी की तैयारी में लग जाना। कभी कभी तो दूसरी ड़यूटी सुबह 2 बजे के बाद ही खत्म होती।
इतना भागदौड करने के बावजूद हाथों में महज 5500/- पांच हजार पांच सौ के करीब राशि का आना और इससे अपने छोटे से परिवार को चलाने के लिए गुत्थमगुत्थी करना।
वक्त बदला, मेरी मेहनत से ज्यादा मेरी किस्मत का हाथ रहा इसमें। 20 जून, 2006 को जब मैंने एक सरकारी कार्मिक के रूप में अपना कार्यभार संभाला तो उस समय मेरे हाथों में लगभग सबकुछ काटने के बाद 5000/- की राशि मिलने लगी। रहने का घर, पानी, बिजली और चिकित्सा सुविधा नि:शुल्क हो जाने के कारण 5000/- की राशि में मुझे सारा जहान नजर आने लगा। मैं खुद को दुनिया का सबसे अमीर आदमी मानने लगा।
वर्तमान में मैं जमशेदपुर वापस आ चुका हूँ। इस बीच मेरी पदोन्नति भी हो चुकी है। परिवार भी बढ चुका हूँ। अब मैं और मेरी पत्नी के साथ मेरे दो छोटे बच्चे भी हैं। जिन्दगी की गाडी चल रही है। बीच बीच में अवरोध आते रहते हैं मगर इससे कोई फर्क नहीं पडता। ईश्वर पर आस्था है और उस पर भरोसा है।
कल और आज के दरम्यान काफी कुछ बदला हुआ है। अगर कुछ नहीं बदला तो सिर्फ मेरी सोच। मैंने काफी तंग हालात में अपना बचपन बीताया है मैं उन हालातों में अपने बच्चों को नहीं देखना चाहता। यही कारण है कि आज लगभग 15000/- का वेतन होने के बावजूद मेरे पास महीने के अंत में एकाउंट राफ साफ रहता है। कई बार तो महीने के 15 तारीख के बाद ही अफरातफरी का माहौल बन जाता है। परंतु इसके बावजूद मुझे लगता है कि दुनिया का सबसे अमीर आदमी मैं ही हॅूं। पिछले ही दिनों जबकि मेरे बैंक एकाउंट में सिर्फ 72 रुपए बचे थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अब 20 जून के बाद से 30 जून तक का सफर कैसे कटेगा। इसी उधेडबून में अपने बॉस से मैंने यह आग्रह किया कि ट़यूशन फी का बिल पेमेंट यदि कर दिया जाए तो अच्छा होगा और साथ ही मैंने अपने व्यक्तिगत परेशानी की बात भी उनसे कह दी। उन्होंने अपनी हामी भरी और मैं लग गया ट़यूशन फी के बिल को बनाने में तकरीबन 2 से 3 दिनों में ही बिल तैयार कर मैंने उस बिल का पेमेंट करा लिया। 20 तारीख को ही ट़यूश्न फी के मद में मुझे 6740/- रुपए प्राप्त हुए।
क्या से क्या बदल गया है बीत कल और आज में, कहां 2006 में मेरी पूरी सैलरी ही 5000/- के करीब होती थी और कहां आज मुझे बच्चे को पढाने के मद में 6740/- का भुगतान हो रहा है।
यह सब कुछ देखकर तो यही लगता है कि मैं जो कुछ इस ऑफिस को दे रहा हॅूं वो बहुत ही कम है मुझे दिए जा रहे वेतन की तुलना में मेरे द्वारा किया जा रहा काम बहुत ही कम है। कहां मैं रोजाना 13 से 14 घंटे काम करके 5500/- कमा पाता था और कहां आज मुझे तकरीबन 15000/- रुपए सैलरी मिलती है वो भी रोजना 8 घंटे के काम के बदले जबकि साप्ताहिक छुट़टी दो दिनों की है। ऐसे में मुझे हर पल ऐसा एहसास होता है कि मैं इस ऑफिस के साथ नाइंसाफी कर रहा हॅूं। मुझे और भी मेहनत करना चाहिए तथा अपना इफोर्ट और भी देना चाहिए। इस दिशा में मैं प्रयासरत्न भी हॅूं यही कारण है कि मैं न सिर्फ मुझे दिए गए कार्य को कर रहा हॅूं बल्कि नए नए काम में भी अपना योगदान देने की कोशिश करता रहता हॅूं।
दुर्गापूर कार्यालय के लगभग सभी सहयोगियों को मैं भुला नहीं सकता। सिर्फ 2 वर्ष और कुछ महीनों के अपने कार्यकाल में ही मेरी घनिष्ठता अनेक लोगों से हो चुकी थी जो आज तक कायम है और आशा ही नहीं पूर्ण विश्वाष है कि आने वाले कल को भी कायम ही रहेगी।
रविवार, 22 मई 2011
पहली मोहब्बत का इजहार
मोहब्बत का इजहार करना कितना कठिन होता है उपर से उस समय जब आपको यह मालूम न हो कि उसके दिल में आपके लिए क्या है।
वर्ष 1994 की बात है जब मैं इंटर का प्रथम वर्ष का छात्र था। अगस्त का महीना चल रहा था जबकि मैंने आत्महत्या की नाकाम कोशिश की थी वजह सिर्फ और सिर्फ घरेलू परेशानी थी। इस सदमे से उबरने के बाद मैं जिंदगी जीने की जद्दोजहद कर ही रहा था कि पडोस में रहने वाली एक शख्स ने मेरे दिल में एक नई जिंदगी के रूप में दस्तक दी। मैं मानसिक रूप से परेशानी की हालत में था, खुद को इस दुनिया के किसी कोने में रख पाने का हौसला बिलकुल ही खो चुका था। ठीक इसी समय मुझे लगा कि मुझे एक नई जिंदगी मिल गई। उसकी ओर मैं खींचा चला गया सिर्फ जिंदगी जीने की मजबूरी के कारण।
मुझे ऐसा लगने लगा कि वही मेरी जिंदगी है और मैं उसे जिंदगी मानकर पुराने गम को भूलने की कोशिश करने लगा।
इस बात की खबर मेरे दोस्त प्रमोद पंडित को हो गई उसने मुझे अपनी मोहब्बत का इजहार उस शख्स से करने की बात कही मगर मैं इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था किंतु मेरे उस दोस्त ने मुझमें शक्ति का संचार किया और परिणामस्वरूप मैं एक लम्बा चौडा पत्र जिसमें अपनी दिल की बातें कई शेरो शायरी के साथ लिखकर कुछ ही दिनों में उसे अपनी मोहब्बत का इजहार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गया।
एक दिन जब वह टयूशन के लिए घर से निकली मैं दूसरे रास्ते से अपने हाथों में पत्र लेकर निकल पडा। थोडी ही देर के बाद हम दोनों आमने - सामने थे। मेरा दिल जोर-जोर से धडक रहा था। मेरी सांसें थम-थम कर चलने लगी थी। मेरे पांव इतने भारी हो गए थे कि जहां मैं खडा था वहां से एक कदम न तो आगे बढ पा रहा था और न एक कदम पीछे की ओर ले पा रहा था। इसी दौरान मैंने उसका नाम लेते हुए अपने हाथों मे रखे उस पत्र को उसकी ओर बढाकर कहा,
''एकटू ऐटाके पढे निबेन''
उसने मुस्कुराते हुए जवाब देते हुए कहा,
''केनो''
मैंने फिर से उससे कहा,
''एकटू पढे निबेन ना''
इस बार उसने बहुत ही विनम्र आवाज में कहा,
''देखून आमार टयूशन लेट होच्छे आमके जेते देन''
उसकी इस विनम्रता पर मैंने सहजता से कहा
''ठीक आच्छे''
और फिर हम दोनो के पांव दो विपरीत दिशा की ओर बढ गए।
मैं वापस घर आया और चुपचाप खामोशी से अपने बिस्तर पर लेट गया। थोडी देर के बाद मेरा दोस्त प्रमोद आया और मुझसे इजहारे मोहब्बत के बारे में पूछने लगा तो मैंने उसे विस्तार से बताया। इस पर उसने मुझे धीरज देते हुए कहा कि इसमें परेशानी की क्या बात है उसने तुम्हारे पत्र देने के दौरान न तो गुस्सा दिखाया और न ही तुमसे ऐसा नहीं करने संबंधी कोई बात कही। यदि उसके दिल में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं होता या फिर उसके दिल में कोई और लडका होता तो वह जरूर गुस्सा होती और तुमसे गुस्से में आकर कुछ जरूर कहती। मैं उसकी बातों से सहमत भी हुआ मगर.................।
कुछ ही दिनों बाद मेरे घर पडोस में रहने वाला एक छोटा लडका आया और मुझसे पूछा, ''सुमन भैया क्या आप आज बैडमिंटन खेलने नहीं जाएंगे''। उन दिनों सर्दी के मौसम में मैं आस पडोस के कुछ हमउम्र तथा छोटे लडकों के साथ शाम को बैडमिंटन खेला करता था। उस दिन मुझे घर से निकलने में देर हो चुकी थी तभी वह लडका मुझसे इससे सबंधित पूछने आया था। मैंने उससे कहा कि ''तुम चलो मैं थोडी ही देर में मैदान में पहुंचता हॅूं''।
कुछ ही देर बाद मैं अपना बैडमिंटन लेकर मैदान में पहुंचा तो मुझे मामला कुछ अजीब लगा, क्योंकि वहां मैदान के आस पास वह शख्स अपनी कुछ सहेलियों के साथ टहल रही थी। यह पहली बार था। मैं जैसे ही बैडमिंटन कोर्ट के पास पहुंचा, वह शख्स अपनी सहेलियों के साथ मेरे पास आई और उसने मुझसे कहा, ''.........हम आपको लाइक नहीं करते, आपके पास मेरा जो भी फोटो है मुझे वापस कर दीजिए'', अचानक हुए इस हमले पर मैं असहज रूप से उत्तर देते हुए कहा, ''मेरे पास जो फोटो है उसमें सिर्फ आप ही तो नहीं हैं''। मेरे इस जवाब पर उसकी सहेलियां बोलने लगीं, ''तो फिर और कौन लोग होगा उस फोटो में हम लोग होंगे''। मैंने फिर जवाब देते हुए कहा, ''नहीं आप लोग नहीं हैं''। और फिर कुछ देर खामोश रहने के बाद मैंने कहा, ''ठीक है, आज ही मैं वह फोटो वापस कर दूंगा'' इतना कहकर मैं वहां से अपने घर वापस आ गया।
जिस फोटो को वापस करने की बात मैंने कही थी वह एक ग्रुप फोटो थी, कुछ परिवार के सदस्यों की जिसमें मेरे पडोस में रहने वाली वह लडकी भी थी।
मैं घर वापस आया, बहुत रोया, बहुत रोया। मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने अपने जीने का हक खो दिया है। मैंने तुरंत ही सारे के सारे डायरी के पन्ने जो उसकी यादों में मैंने लिखे थे, को फाडकर आग के हवाले कर दिया और फिर कुछ देर बाद उस फोटो को लेकर उसकी सहली के पास गया और फोटो वापस करने के बारे में बताया।
कुछ ही देर के बाद वह शख्स अपनी सहेली के साथ मेरे नजर के सामने थी। मैंने उसकी हाथों में फोटो रख दी। उस ग्रुप फोटो को देखकर वह जोर से हंसने लगी। न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि यह मेरी मोहब्बत पर हंसी की जा रही है। मैं पलटकर वापस जाने ही वाला था कि अचानक मुझे याद आया कि उस फोटो का एक और टुकडा तो मेरे कॉलेज के आई.डी कार्ड के पीछे घुसा हुआ है। मैंने पलटे हुए अपने पॉकेट में रखे आई.डी कार्ड के पीछे से उस फोटो के टुकडे को निकाला और उस शख्स के हाथों में थमा दिया और वापस चल गया अपने उस वीरान घर की ओर। अब इस जहां में मेरा और कोई नहीं था सिर्फ और सिर्फ उदासी और गम के सिवा।
आज जबकि वर्ष 2011 का मई महीना चल रहा है, वर्ष 1998 के इसी मई महीने के 19 तारीख को वह शख्स अपने परिवार के साथ मेरे पडोस के घर को छोड कई किलोमीटर दूर रहने चली गई थी। आज भी हर एक दिन हर एक लम्हा जो मैंने उसकी यादों में बीताया है मुझे उसके साथ अपने पन की याद दिलाता है। वह जहां भी रहे खुशहाल रहे, अपने इष्ट से यही दुआ करता हॅूं।
मुझे ऐसा लगने लगा कि वही मेरी जिंदगी है और मैं उसे जिंदगी मानकर पुराने गम को भूलने की कोशिश करने लगा।
इस बात की खबर मेरे दोस्त प्रमोद पंडित को हो गई उसने मुझे अपनी मोहब्बत का इजहार उस शख्स से करने की बात कही मगर मैं इसके लिए तैयार नहीं हो रहा था किंतु मेरे उस दोस्त ने मुझमें शक्ति का संचार किया और परिणामस्वरूप मैं एक लम्बा चौडा पत्र जिसमें अपनी दिल की बातें कई शेरो शायरी के साथ लिखकर कुछ ही दिनों में उसे अपनी मोहब्बत का इजहार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गया।
एक दिन जब वह टयूशन के लिए घर से निकली मैं दूसरे रास्ते से अपने हाथों में पत्र लेकर निकल पडा। थोडी ही देर के बाद हम दोनों आमने - सामने थे। मेरा दिल जोर-जोर से धडक रहा था। मेरी सांसें थम-थम कर चलने लगी थी। मेरे पांव इतने भारी हो गए थे कि जहां मैं खडा था वहां से एक कदम न तो आगे बढ पा रहा था और न एक कदम पीछे की ओर ले पा रहा था। इसी दौरान मैंने उसका नाम लेते हुए अपने हाथों मे रखे उस पत्र को उसकी ओर बढाकर कहा,
''एकटू ऐटाके पढे निबेन''
उसने मुस्कुराते हुए जवाब देते हुए कहा,
''केनो''
मैंने फिर से उससे कहा,
''एकटू पढे निबेन ना''
इस बार उसने बहुत ही विनम्र आवाज में कहा,
''देखून आमार टयूशन लेट होच्छे आमके जेते देन''
उसकी इस विनम्रता पर मैंने सहजता से कहा
''ठीक आच्छे''
और फिर हम दोनो के पांव दो विपरीत दिशा की ओर बढ गए।
मैं वापस घर आया और चुपचाप खामोशी से अपने बिस्तर पर लेट गया। थोडी देर के बाद मेरा दोस्त प्रमोद आया और मुझसे इजहारे मोहब्बत के बारे में पूछने लगा तो मैंने उसे विस्तार से बताया। इस पर उसने मुझे धीरज देते हुए कहा कि इसमें परेशानी की क्या बात है उसने तुम्हारे पत्र देने के दौरान न तो गुस्सा दिखाया और न ही तुमसे ऐसा नहीं करने संबंधी कोई बात कही। यदि उसके दिल में तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं होता या फिर उसके दिल में कोई और लडका होता तो वह जरूर गुस्सा होती और तुमसे गुस्से में आकर कुछ जरूर कहती। मैं उसकी बातों से सहमत भी हुआ मगर.................।
कुछ ही दिनों बाद मेरे घर पडोस में रहने वाला एक छोटा लडका आया और मुझसे पूछा, ''सुमन भैया क्या आप आज बैडमिंटन खेलने नहीं जाएंगे''। उन दिनों सर्दी के मौसम में मैं आस पडोस के कुछ हमउम्र तथा छोटे लडकों के साथ शाम को बैडमिंटन खेला करता था। उस दिन मुझे घर से निकलने में देर हो चुकी थी तभी वह लडका मुझसे इससे सबंधित पूछने आया था। मैंने उससे कहा कि ''तुम चलो मैं थोडी ही देर में मैदान में पहुंचता हॅूं''।
कुछ ही देर बाद मैं अपना बैडमिंटन लेकर मैदान में पहुंचा तो मुझे मामला कुछ अजीब लगा, क्योंकि वहां मैदान के आस पास वह शख्स अपनी कुछ सहेलियों के साथ टहल रही थी। यह पहली बार था। मैं जैसे ही बैडमिंटन कोर्ट के पास पहुंचा, वह शख्स अपनी सहेलियों के साथ मेरे पास आई और उसने मुझसे कहा, ''.........हम आपको लाइक नहीं करते, आपके पास मेरा जो भी फोटो है मुझे वापस कर दीजिए'', अचानक हुए इस हमले पर मैं असहज रूप से उत्तर देते हुए कहा, ''मेरे पास जो फोटो है उसमें सिर्फ आप ही तो नहीं हैं''। मेरे इस जवाब पर उसकी सहेलियां बोलने लगीं, ''तो फिर और कौन लोग होगा उस फोटो में हम लोग होंगे''। मैंने फिर जवाब देते हुए कहा, ''नहीं आप लोग नहीं हैं''। और फिर कुछ देर खामोश रहने के बाद मैंने कहा, ''ठीक है, आज ही मैं वह फोटो वापस कर दूंगा'' इतना कहकर मैं वहां से अपने घर वापस आ गया।
जिस फोटो को वापस करने की बात मैंने कही थी वह एक ग्रुप फोटो थी, कुछ परिवार के सदस्यों की जिसमें मेरे पडोस में रहने वाली वह लडकी भी थी।
मैं घर वापस आया, बहुत रोया, बहुत रोया। मुझे ऐसा लगा जैसे मैंने अपने जीने का हक खो दिया है। मैंने तुरंत ही सारे के सारे डायरी के पन्ने जो उसकी यादों में मैंने लिखे थे, को फाडकर आग के हवाले कर दिया और फिर कुछ देर बाद उस फोटो को लेकर उसकी सहली के पास गया और फोटो वापस करने के बारे में बताया।
कुछ ही देर के बाद वह शख्स अपनी सहेली के साथ मेरे नजर के सामने थी। मैंने उसकी हाथों में फोटो रख दी। उस ग्रुप फोटो को देखकर वह जोर से हंसने लगी। न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि यह मेरी मोहब्बत पर हंसी की जा रही है। मैं पलटकर वापस जाने ही वाला था कि अचानक मुझे याद आया कि उस फोटो का एक और टुकडा तो मेरे कॉलेज के आई.डी कार्ड के पीछे घुसा हुआ है। मैंने पलटे हुए अपने पॉकेट में रखे आई.डी कार्ड के पीछे से उस फोटो के टुकडे को निकाला और उस शख्स के हाथों में थमा दिया और वापस चल गया अपने उस वीरान घर की ओर। अब इस जहां में मेरा और कोई नहीं था सिर्फ और सिर्फ उदासी और गम के सिवा।
आज जबकि वर्ष 2011 का मई महीना चल रहा है, वर्ष 1998 के इसी मई महीने के 19 तारीख को वह शख्स अपने परिवार के साथ मेरे पडोस के घर को छोड कई किलोमीटर दूर रहने चली गई थी। आज भी हर एक दिन हर एक लम्हा जो मैंने उसकी यादों में बीताया है मुझे उसके साथ अपने पन की याद दिलाता है। वह जहां भी रहे खुशहाल रहे, अपने इष्ट से यही दुआ करता हॅूं।
सोमवार, 11 अप्रैल 2011
आधुनिक स्वतंत्रता संग्राम
चुप बैठे, खामोश रहें
अब हमें ये गंवारा नहीं
समस्याओं को सुलझाने में
अब नेताओं का लेना सहारा नहीं
उमड पडी है जन शक्ति
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
चुप बैठे, खामोश रहें
अब हमें ये गंवारा नहीं
जन लोकपाल विधेयक लाकर
अब भ्रष्टाचार को आगे बढाना नहीं
एकजुट हो गयी है जन शक्ति
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
चुप बैठे, खामोश रहें
अब हमें ये गंवारा नहीं
गोरे अंग्रेजों से लडकर हमने
एक आजादी पायी है
काले अंग्रेजों से लडकर हमें
अब फिर से आजादी पानी है
संगठित हो गए हैं हिन्दुस्तानी
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
जय हिन्द, जय भारत
अब हमें ये गंवारा नहीं
समस्याओं को सुलझाने में
अब नेताओं का लेना सहारा नहीं
उमड पडी है जन शक्ति
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
चुप बैठे, खामोश रहें
अब हमें ये गंवारा नहीं
जन लोकपाल विधेयक लाकर
अब भ्रष्टाचार को आगे बढाना नहीं
एकजुट हो गयी है जन शक्ति
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
चुप बैठे, खामोश रहें
अब हमें ये गंवारा नहीं
गोरे अंग्रेजों से लडकर हमने
एक आजादी पायी है
काले अंग्रेजों से लडकर हमें
अब फिर से आजादी पानी है
संगठित हो गए हैं हिन्दुस्तानी
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
जय हिन्द, जय भारत
अण्णा हजारे जी को मेरा शत-शत नमन
अंतत: हम जीत गए । जन शक्ति ने अपना खेल दिखा ही दिया ।
अण्णा जी एवं उनकी पूरी टीम को पूरी हिन्दुस्तान की जनता की तरफ से बधाई ।
पिछले कई वर्षों से ऐसा लग रहा था जैसे कोई नहीं जो आम आदमी की बात सुने, कोई नहीं जो आम आदमी की परेशानी को समझ सके। सारा हिन्दुस्तान त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहा था मगर उपर बैठे लोगों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही थी। लोग खुद को बेबस-लाचार महसूस कर रहे थे। ऐसी परिस्थिति में अण्णा जी के आंदोलन ने वो कमाल कर दिया जैसे लगा सचमुच हम आजादी की दूसरी लडाई लड रहे हों ।
अदभुत वाकई अदभुत-अभूतपूर्व रहा। आम जनता की जीत हुई । अण्णा जी एवं उनकी पूरी टीम को इसके लिए बधाई। हमें आशा है न सिर्फ भ्रष्टाचार अपितु समाज में फैले सभी प्रकार की समस्याओं के निराकरण के लिए उनका मार्गदर्शन हमें मिलता रहेगा।
गुरुवार, 7 अप्रैल 2011
अन्ना हजारे और आधुनिक स्वतंत्रता संग्राम
पिछले तीन दिनों से अन्ना हजारे अनशन पर बैठे हुए हैं। उन्होंने पिछले तीन दिनों से कुछ भी खाया पीया नहीं है मगर इस दौरान हमारे देश के 120 करोड की आबादी के अधिकांश लोग अपना जीवन पूर्व की तरह ही जिए जा रहे हैं जिसमें मैं खुद भी शामिल हॅूं। पिछले तीन दिनों के दौरान जब भी कुछ खा पी रहा हॅूं मेरे जेहन के सामने एक चेहरा अकस्मात ही नजर आ रहा है वह फिर मैं अपने आप को धिक्कारने लगता हॅूं। मुझे आत्मग्लानि महसूस हो रही है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं वर्ष 1947 के पहले के समय में हॅूं और जबकि समूचा देश स्वतंत्रता संग्राम के लिए आंदोलनरत है मैं अंग्रेजों की वफादारी में अपना समय काट रहा हूँ। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं अपने आप को देशहित के लिए जारी इस आंदोलन में किसी प्रकार शरीक करूँ।
मैं क्या करूँ, कहां जाएं, किस प्रकार अन्ना हजारे के समर्थन में अपने हाथ उठाउं, किसका-कहां विरोध करूँ। आज फिर से एक बार देश को भ्रष्टाचार की गुलामी से छुटकारा दिलाने के लिए एक और गांधी हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं मगर मैं खुद को विवश पा रहा हॅूं इस आंदोलन का हिस्सा नहीं बन पाने के कारण।
जन लोकपाल विधेयक को पारित कराने का प्रयास आने वाले भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास है इसे लेकर किए जा रहे आंदोलन को हालांकि देश भर में भारी समर्थन मिल रहा है मगर इस प्रयास में मैं अपना कोई हिस्सा नहीं दे पा रहा हॅूं इसके लिए मुझे आत्मग्लानि हो रही है।
देश डूब रहा है गर्त के अंधेरे में, देश को डुबाने वालों को इससे कोई मतलब नहीं कि जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम करे या कुछ और यह सब कुछ देखकर तो यही लगता है कि अब देश को दूसरी आजादी की जरूरत है और मुझ जैसे युवा हाथ पर हाथ रखकर सिर्फ तमाश देख रहे हैं हमें भी अपने स्तर पर इस आंदोलन को सफल बनाने की दिशा में प्रयत्न करने की आवश्यकता हैा
जय हिन्द जय भारत ।
आखिर कब तक.........।
कब से सूरज अस्त होगा, कब ऐ जिन्दगी खतम होगी, कब ऐ सांसें जुदा होगी शरीर से, कब आखिर कब तुम्हारे पास होने का एहसास होना बंद होगा.........।
गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011
रिश्तों के मायने
मुझ जैसे कई लोग होंगे जो बेवकूफों की तरह रिश्तों के मायने तलाशते फिर रहे होंगे । पैदा होने से लेकर मरने तक हम कैद रहते हैं रिश्तों के भ्रम जाल में। मां-पिता, भाई-बहन, पत्नी-संतान से लेकर अनगिनत रिश्ते में हम दिन प्रतिदिन फंसते जाते हैं। कहीं हम दूसरों को बेवकूफ बनाते हैं तो कहीं हम दूसरों से बेवकूफ बनते हैं। लोग जाने अनजाने रिश्तों के भ्रम जाल में खुद को कैद करके रखते हैं।
इनकम टैक्स की उपयोगिता
वर्तमान परिस्थिति में जबकि समूचा हिन्दुस्तान भ्रष्टाचार से ग्रसित है पिछले कई महीनों से लगातार ही कभी मघु कोडा के लगभग 4000 करोड रुपए, कभी ए राजा के लगभग कई लाख करोड, कभी कलमाडी के कई हजार करोड मामले प्रकाश में आ रहे हैं, इन सबको देखते हुए लगता है इनकम टैक्स अर्थात आयकर देने वाले लोग पूरी तरह से बेवकूफ बन रहे हैं। सरकार द्वारा सभी प्रकार के टैक्स लेने का प्रयोजन इस पैसों को हिन्दुस्तान के गरीब आम जनता की भलाई के लिए कार्य करना है मगर यदि यही पैसा किसी एक दो आदमी की बपौती बनने लगे तो फिर टैक्स देने वाले लोग तो अपने आपको ठगा हुआ सा महसूस करेंगे ही। कई बार अखबारों में यही विज्ञापन दिया जाता है कि आप कोई भी समान खरीदें आप वैट आदि टैक्स देकर मूल बिल लें ताकि टैक्स द्वारा जमा किए गए पैसे आम जनता की भलाई में खर्च किए जा सके। मगर वास्तविकता इससे कितनी दूर होती जा रही है छोटे से छोटे काम से लेकर बडे से बडे काम में घपले से घपले ही किए जा रहे हैं। सरकारी तंत्र का भी यही मानना है कि सरकार द्वारा भेजी जा रही राशि जो गरीबों के हित में खर्च की जानी है उसका सिर्फ 10 प्रतिशत ही सदुपयोग हो रहा है, इसका मतलब यही कि बाकी 90 प्रतिशत कमीशन आदि के रूप में भ्रष्टाचारियों के जेब में जा रही हैा
एक इनकम टैक्स देने वाले भारतीय की तो बात ही निराली है, एक तो वह अपने पूरे वेतन पर निर्धारित किए गए आयकर अर्थात इनकम टैक्स दे ही रहा है उपर से रोज मर्रा की जरूरी सारी चीजें मसलन पेट्रोल से लेकर पानी तक, चावल से लेकर दवाई तक में अलग से अन्य प्रकार के टैक्स को चुकाना पड रहा है। इसका मतलब जिन रूपयों पर वह पहले से ही सरकार को निर्धारित टैक्स अदा कर चुका है फिर से दुबारा उन्हें कई प्रकार के टैक्स को चुकाना पड ही रहा हैा ऐसे में यदि टैक्स के पैसे का इस तरह से दुरुपयोग किया जाए तो फिर टैक्स देने वाले लोगों में क्या भाव जागृत होगा।
क्या वर्तमान परिदृश्य में टैक्स की उपयोगिता पर सवाल उठाना उचित नहीं, क्या अपनी मेहनत से कमाए गए पैसों से टैक्स देने वाले लोगों को उनके टैक्स के पैसों के खर्च का हिसाब लेने का हक नहीं। इसमें पारदर्शिता की जरूरत है। अब हमें दुबारा नए सिरे से सोचना होगा कि सरकारी सिस्टम के फेल होने के कारण ही यदि एक वार्षिक बजट जितने का पैसा यदि ए राजा, कलमाडी और मधु कोडा जैसे दो चार लोग ही हडप जाते हैं तो फिर आयकर अर्थात इनकम टैक्स से हमें मुक्ति क्यों नहीं। हम क्यों पीसे जा रहे हैं गरीबों आम जनता की भलाई के नाम पर। क्यों हमारी मेहनत के, पसीने के कमाई पर सेंधमारी की जा रही है टैक्स के नाम पर। यह सब कुछ बंद होना चाहिए। सरकारी तंत्र को अब हर हाल में सोचना चाहिए कि क्या हमसे टैक्स लेकर यूं ही हमें बेवकूफ बनाया जाता रहेगा।
भ्रष्टाचारियों पर अंकुश की नाकाम कोशिश
पिछले कई दिनों से भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले प्रकाश में आए। कुछेक मामले में कार्रवाई भी कई गई मगर सवाल यही उठता है कि किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई निचले स्तर तक ही जाकर सिमट जाती हैा कभी भी भ्रष्टाचार के मामले में पूरे दल को अर्थात नीचे से लेकर उपर तक के लोगो को घसीटा नहीं जाता हैा भ्रष्टाचार कभी भी किसी एक स्तर पर नहीं हो सकता। यह नीचे के कार्मिकों से आंरभ होकर उपर के आला अधिकारियों तक जाकर समाप्त होता हैा किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार तभी संभव है जब नीचे से लेकर उपर तक के अधिकारी व कार्मिक मिल जुलकर इसे अंजाम न पहुंचाए। अधिकतर मामले में यही देखा गया कि भ्रष्टाचार का मामला प्रकाश में क्या आया सिर्फ नीचे के स्तर के कार्मिकों पर कार्रवाई की गयी और उपर के अधिकारी जो मुख्य रूप से भ्रष्टाचार से जुडे रहते है उनका नाम तक प्रकाश में नहीं आया। एक दो मामले को यदि छोड दिया जाए जो कि रक्षा से संबंधित हैं बाकी सभी मामले इसी तरह के हैं। चाहे ए राजा प्रकरण हो, मधु कोडा प्रकरण हो या फिर कलमाडी प्रकरण, मुझे यही लगता है ऐ सारे के सारे तो सिर्फ मोहरे मात्र हैं, इनके पीछे इनसे जुडे लोग तो आज भी प्रकाश में नहीं आ पाए हैं।
साधारण से साधारण मामले में भी यही होता आया हैा अभी पिछले कुछ महीनों से ट्राफिक पुलिस से संबंधित लोकल न्यूज पेपरों में आए दिन भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ रहे हैं और यहां भी वही हो रहा हैा महज उन लोगों पर ही नाम मात्र कार्रवाई की जा रही है जिनसे संबंधित मामले प्रकाश में आ रहे हैं। मगर सवाल यही उठता है कि क्या ट्राफिक पुलिस में कार्यरत कार्मिकों के द्वारा बिना अपने उच्च अधिकारियों की जानकारी के यह सब कुछ अंजाम दिया जा रहा है, यदि ऐसा है तो भी उच्च अधिकारियों के लिए ऐ शर्म की बात है। मुझे तो बिलकुल भी ऐसा नहीं लगता कि बिना आला अधिकारियेां के मिलीभगत के कोई ट्राफिक पुलिस में काम करने वाला नीचे स्तर का कार्मिक दिन दहाडे रोजना वसूली का कार्य करने में मशगूल रहेगा। यहां सिर्फ नीचे स्तर के वैसे कार्मिकों पर कार्रवाई की जा रही है जिनके मामले अखबारों में प्रकाशित हो रहे हैं जबकि इनके द्वारा भ्रष्टाचार को अंजाम दिलाए जाने वाले अधिकारी साफ बचते फिर रहे हैं। क्या इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव है, क्या यह कार्रवाई आम जनता की आंख में धूल झोंकने का प्रयास भर नहीं हैा
आज समूचा हिन्दुस्तान भ्रष्टाचारियों के कारनामे से चर्चित हैा हम हर ओर घिरे पडे हैं इन भ्रष्टाचारियों के जमात से और सरकार, प्रशासन अपनी आंख बंद किए हुए हैा मामले प्रकाश में लाने की जिम्मेदारी लगती है सिर्फ न्यूज चैनलों और अखबारों पर छोड दिए गए हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)