चुप बैठे, खामोश रहें
अब हमें ये गंवारा नहीं
समस्याओं को सुलझाने में
अब नेताओं का लेना सहारा नहीं
उमड पडी है जन शक्ति
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
चुप बैठे, खामोश रहें
अब हमें ये गंवारा नहीं
जन लोकपाल विधेयक लाकर
अब भ्रष्टाचार को आगे बढाना नहीं
एकजुट हो गयी है जन शक्ति
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
चुप बैठे, खामोश रहें
अब हमें ये गंवारा नहीं
गोरे अंग्रेजों से लडकर हमने
एक आजादी पायी है
काले अंग्रेजों से लडकर हमें
अब फिर से आजादी पानी है
संगठित हो गए हैं हिन्दुस्तानी
अब अण्णा के मार्गदर्शन में
जय हिन्द, जय भारत
We are all INDIAN before a Hindu, Muslim, Sikh aur Isai or a Bihari, Marathi, Bengali etc. Love to all human being........
सोमवार, 11 अप्रैल 2011
अण्णा हजारे जी को मेरा शत-शत नमन
अंतत: हम जीत गए । जन शक्ति ने अपना खेल दिखा ही दिया ।
अण्णा जी एवं उनकी पूरी टीम को पूरी हिन्दुस्तान की जनता की तरफ से बधाई ।
पिछले कई वर्षों से ऐसा लग रहा था जैसे कोई नहीं जो आम आदमी की बात सुने, कोई नहीं जो आम आदमी की परेशानी को समझ सके। सारा हिन्दुस्तान त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहा था मगर उपर बैठे लोगों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही थी। लोग खुद को बेबस-लाचार महसूस कर रहे थे। ऐसी परिस्थिति में अण्णा जी के आंदोलन ने वो कमाल कर दिया जैसे लगा सचमुच हम आजादी की दूसरी लडाई लड रहे हों ।
अदभुत वाकई अदभुत-अभूतपूर्व रहा। आम जनता की जीत हुई । अण्णा जी एवं उनकी पूरी टीम को इसके लिए बधाई। हमें आशा है न सिर्फ भ्रष्टाचार अपितु समाज में फैले सभी प्रकार की समस्याओं के निराकरण के लिए उनका मार्गदर्शन हमें मिलता रहेगा।
गुरुवार, 7 अप्रैल 2011
अन्ना हजारे और आधुनिक स्वतंत्रता संग्राम
पिछले तीन दिनों से अन्ना हजारे अनशन पर बैठे हुए हैं। उन्होंने पिछले तीन दिनों से कुछ भी खाया पीया नहीं है मगर इस दौरान हमारे देश के 120 करोड की आबादी के अधिकांश लोग अपना जीवन पूर्व की तरह ही जिए जा रहे हैं जिसमें मैं खुद भी शामिल हॅूं। पिछले तीन दिनों के दौरान जब भी कुछ खा पी रहा हॅूं मेरे जेहन के सामने एक चेहरा अकस्मात ही नजर आ रहा है वह फिर मैं अपने आप को धिक्कारने लगता हॅूं। मुझे आत्मग्लानि महसूस हो रही है। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं वर्ष 1947 के पहले के समय में हॅूं और जबकि समूचा देश स्वतंत्रता संग्राम के लिए आंदोलनरत है मैं अंग्रेजों की वफादारी में अपना समय काट रहा हूँ। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं अपने आप को देशहित के लिए जारी इस आंदोलन में किसी प्रकार शरीक करूँ।
मैं क्या करूँ, कहां जाएं, किस प्रकार अन्ना हजारे के समर्थन में अपने हाथ उठाउं, किसका-कहां विरोध करूँ। आज फिर से एक बार देश को भ्रष्टाचार की गुलामी से छुटकारा दिलाने के लिए एक और गांधी हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं मगर मैं खुद को विवश पा रहा हॅूं इस आंदोलन का हिस्सा नहीं बन पाने के कारण।
जन लोकपाल विधेयक को पारित कराने का प्रयास आने वाले भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास है इसे लेकर किए जा रहे आंदोलन को हालांकि देश भर में भारी समर्थन मिल रहा है मगर इस प्रयास में मैं अपना कोई हिस्सा नहीं दे पा रहा हॅूं इसके लिए मुझे आत्मग्लानि हो रही है।
देश डूब रहा है गर्त के अंधेरे में, देश को डुबाने वालों को इससे कोई मतलब नहीं कि जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम करे या कुछ और यह सब कुछ देखकर तो यही लगता है कि अब देश को दूसरी आजादी की जरूरत है और मुझ जैसे युवा हाथ पर हाथ रखकर सिर्फ तमाश देख रहे हैं हमें भी अपने स्तर पर इस आंदोलन को सफल बनाने की दिशा में प्रयत्न करने की आवश्यकता हैा
जय हिन्द जय भारत ।
आखिर कब तक.........।
कब से सूरज अस्त होगा, कब ऐ जिन्दगी खतम होगी, कब ऐ सांसें जुदा होगी शरीर से, कब आखिर कब तुम्हारे पास होने का एहसास होना बंद होगा.........।
गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011
रिश्तों के मायने
मुझ जैसे कई लोग होंगे जो बेवकूफों की तरह रिश्तों के मायने तलाशते फिर रहे होंगे । पैदा होने से लेकर मरने तक हम कैद रहते हैं रिश्तों के भ्रम जाल में। मां-पिता, भाई-बहन, पत्नी-संतान से लेकर अनगिनत रिश्ते में हम दिन प्रतिदिन फंसते जाते हैं। कहीं हम दूसरों को बेवकूफ बनाते हैं तो कहीं हम दूसरों से बेवकूफ बनते हैं। लोग जाने अनजाने रिश्तों के भ्रम जाल में खुद को कैद करके रखते हैं।
इनकम टैक्स की उपयोगिता
वर्तमान परिस्थिति में जबकि समूचा हिन्दुस्तान भ्रष्टाचार से ग्रसित है पिछले कई महीनों से लगातार ही कभी मघु कोडा के लगभग 4000 करोड रुपए, कभी ए राजा के लगभग कई लाख करोड, कभी कलमाडी के कई हजार करोड मामले प्रकाश में आ रहे हैं, इन सबको देखते हुए लगता है इनकम टैक्स अर्थात आयकर देने वाले लोग पूरी तरह से बेवकूफ बन रहे हैं। सरकार द्वारा सभी प्रकार के टैक्स लेने का प्रयोजन इस पैसों को हिन्दुस्तान के गरीब आम जनता की भलाई के लिए कार्य करना है मगर यदि यही पैसा किसी एक दो आदमी की बपौती बनने लगे तो फिर टैक्स देने वाले लोग तो अपने आपको ठगा हुआ सा महसूस करेंगे ही। कई बार अखबारों में यही विज्ञापन दिया जाता है कि आप कोई भी समान खरीदें आप वैट आदि टैक्स देकर मूल बिल लें ताकि टैक्स द्वारा जमा किए गए पैसे आम जनता की भलाई में खर्च किए जा सके। मगर वास्तविकता इससे कितनी दूर होती जा रही है छोटे से छोटे काम से लेकर बडे से बडे काम में घपले से घपले ही किए जा रहे हैं। सरकारी तंत्र का भी यही मानना है कि सरकार द्वारा भेजी जा रही राशि जो गरीबों के हित में खर्च की जानी है उसका सिर्फ 10 प्रतिशत ही सदुपयोग हो रहा है, इसका मतलब यही कि बाकी 90 प्रतिशत कमीशन आदि के रूप में भ्रष्टाचारियों के जेब में जा रही हैा
एक इनकम टैक्स देने वाले भारतीय की तो बात ही निराली है, एक तो वह अपने पूरे वेतन पर निर्धारित किए गए आयकर अर्थात इनकम टैक्स दे ही रहा है उपर से रोज मर्रा की जरूरी सारी चीजें मसलन पेट्रोल से लेकर पानी तक, चावल से लेकर दवाई तक में अलग से अन्य प्रकार के टैक्स को चुकाना पड रहा है। इसका मतलब जिन रूपयों पर वह पहले से ही सरकार को निर्धारित टैक्स अदा कर चुका है फिर से दुबारा उन्हें कई प्रकार के टैक्स को चुकाना पड ही रहा हैा ऐसे में यदि टैक्स के पैसे का इस तरह से दुरुपयोग किया जाए तो फिर टैक्स देने वाले लोगों में क्या भाव जागृत होगा।
क्या वर्तमान परिदृश्य में टैक्स की उपयोगिता पर सवाल उठाना उचित नहीं, क्या अपनी मेहनत से कमाए गए पैसों से टैक्स देने वाले लोगों को उनके टैक्स के पैसों के खर्च का हिसाब लेने का हक नहीं। इसमें पारदर्शिता की जरूरत है। अब हमें दुबारा नए सिरे से सोचना होगा कि सरकारी सिस्टम के फेल होने के कारण ही यदि एक वार्षिक बजट जितने का पैसा यदि ए राजा, कलमाडी और मधु कोडा जैसे दो चार लोग ही हडप जाते हैं तो फिर आयकर अर्थात इनकम टैक्स से हमें मुक्ति क्यों नहीं। हम क्यों पीसे जा रहे हैं गरीबों आम जनता की भलाई के नाम पर। क्यों हमारी मेहनत के, पसीने के कमाई पर सेंधमारी की जा रही है टैक्स के नाम पर। यह सब कुछ बंद होना चाहिए। सरकारी तंत्र को अब हर हाल में सोचना चाहिए कि क्या हमसे टैक्स लेकर यूं ही हमें बेवकूफ बनाया जाता रहेगा।
भ्रष्टाचारियों पर अंकुश की नाकाम कोशिश
पिछले कई दिनों से भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले प्रकाश में आए। कुछेक मामले में कार्रवाई भी कई गई मगर सवाल यही उठता है कि किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार के मामले में कार्रवाई निचले स्तर तक ही जाकर सिमट जाती हैा कभी भी भ्रष्टाचार के मामले में पूरे दल को अर्थात नीचे से लेकर उपर तक के लोगो को घसीटा नहीं जाता हैा भ्रष्टाचार कभी भी किसी एक स्तर पर नहीं हो सकता। यह नीचे के कार्मिकों से आंरभ होकर उपर के आला अधिकारियों तक जाकर समाप्त होता हैा किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार तभी संभव है जब नीचे से लेकर उपर तक के अधिकारी व कार्मिक मिल जुलकर इसे अंजाम न पहुंचाए। अधिकतर मामले में यही देखा गया कि भ्रष्टाचार का मामला प्रकाश में क्या आया सिर्फ नीचे के स्तर के कार्मिकों पर कार्रवाई की गयी और उपर के अधिकारी जो मुख्य रूप से भ्रष्टाचार से जुडे रहते है उनका नाम तक प्रकाश में नहीं आया। एक दो मामले को यदि छोड दिया जाए जो कि रक्षा से संबंधित हैं बाकी सभी मामले इसी तरह के हैं। चाहे ए राजा प्रकरण हो, मधु कोडा प्रकरण हो या फिर कलमाडी प्रकरण, मुझे यही लगता है ऐ सारे के सारे तो सिर्फ मोहरे मात्र हैं, इनके पीछे इनसे जुडे लोग तो आज भी प्रकाश में नहीं आ पाए हैं।
साधारण से साधारण मामले में भी यही होता आया हैा अभी पिछले कुछ महीनों से ट्राफिक पुलिस से संबंधित लोकल न्यूज पेपरों में आए दिन भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आ रहे हैं और यहां भी वही हो रहा हैा महज उन लोगों पर ही नाम मात्र कार्रवाई की जा रही है जिनसे संबंधित मामले प्रकाश में आ रहे हैं। मगर सवाल यही उठता है कि क्या ट्राफिक पुलिस में कार्यरत कार्मिकों के द्वारा बिना अपने उच्च अधिकारियों की जानकारी के यह सब कुछ अंजाम दिया जा रहा है, यदि ऐसा है तो भी उच्च अधिकारियों के लिए ऐ शर्म की बात है। मुझे तो बिलकुल भी ऐसा नहीं लगता कि बिना आला अधिकारियेां के मिलीभगत के कोई ट्राफिक पुलिस में काम करने वाला नीचे स्तर का कार्मिक दिन दहाडे रोजना वसूली का कार्य करने में मशगूल रहेगा। यहां सिर्फ नीचे स्तर के वैसे कार्मिकों पर कार्रवाई की जा रही है जिनके मामले अखबारों में प्रकाशित हो रहे हैं जबकि इनके द्वारा भ्रष्टाचार को अंजाम दिलाए जाने वाले अधिकारी साफ बचते फिर रहे हैं। क्या इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव है, क्या यह कार्रवाई आम जनता की आंख में धूल झोंकने का प्रयास भर नहीं हैा
आज समूचा हिन्दुस्तान भ्रष्टाचारियों के कारनामे से चर्चित हैा हम हर ओर घिरे पडे हैं इन भ्रष्टाचारियों के जमात से और सरकार, प्रशासन अपनी आंख बंद किए हुए हैा मामले प्रकाश में लाने की जिम्मेदारी लगती है सिर्फ न्यूज चैनलों और अखबारों पर छोड दिए गए हैं।
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011
कसाब की फांसी पर चर्चा
पिछले दिनों हार्इ कोर्ट ने अजमल कसाब की फांसी पर अपना फैसला देते हुए उसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा। उसी रात आईबीएन 7 के न्यूज नेटवर्क पर अजमल कसाब को अधूरा इंसाफ शीर्षक चर्चा प्रसारित की गई और उस चर्चा के दौरान दोनों वकीलों के साक्षात्कार प्रसारित किए गए और फिर लम्बी बहस की गई कि क्या सही हुआ क्या गलत हुआ।
ऐ हिन्दुस्तान है जनाब और यहां की धरती पर आकर यहां के वाशिंदे को कत्लेआम कर देने वालों के साथ भी हमारे अपने मुल्क में कई रहनुमां हैं इसके साथ हमारे देश का कानून भी है जो पूरी सत्यनिष्ठा के साथ मेहमान की तरह रखते हुए फ्री में वकील सुविधा देकर केस को लडने का मौका देता हैा
कसाब की बात तो दूर की है हमारे संसद पर हमला करने वाले मुख्य आरोपी अफजल गुरु जिसको फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने दे रखी है और जिस पर हमारे माननीया राष्टपति महोदया ने भी अपनी रहम की भीख देने से मना कर दी इसके बावजूद आज तक उसे सरकारी मेहमान बना कर रखा गया है सारे सुख सुविधाओं को देकर और तो और अभी हाल ही में ये भी प्रयास किया जा रहा है कि उसे जम्मू कश्मीर की जेल में स्थानांतरण कर दिया जाए ताकि उसकी बूढी मां उसे रोजाना देख सके। ऐ हद की इंतहा हैा
कहां हैं हम, हम से बेहतर तो अरबी देश है जहां महज चोरी करने पर पकडे जाने पर हाथ पैर काट दिया जाता है वो भी सरेआम। आज जबकि समूचे विश्व में आतंकवाद अपना पैर पसार चुका है इस परिद़श्य में जरूरत है सख्त कानून बनाने की न कोई कोर्ट न कोई ट्रायल सिर्फ सजा और भी सख्त से सख्त ताकि इससे दूसरो को सबक मिल सके।
गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011
स्विस बैंक में जमा काला धन
पिछले कई महीनों से कभी बाबा रामदेव जी तो कभी बीजेपी और उनकी सहयोगी पार्टियों द्वारा विदेशों खासकर स्विस बैंक में जमा भारतीयों के काले धन को वापस हमारे देश में लाने की बातें की जा रही हैा कहा यह जा रहा है कि यदि विदेशों में जमा काले धन को भारत लाने में सफलता मिल गई तो भारत की अर्थव्यवस्था काफी मजबूत हो जाएगी, ऐ हो जाएगा, वो हो जाएगा। मैं एक बात जानना चाहता हॅूं कि क्या भारत में रुपये पैसों की कमी रही, क्या कभी किसी बजट में पिछले बजट की अपेक्षा कम बिल पर सहमति बनी। साल दर साल बजट राशि में तो बढोत्तरी होती ही जा रही है। और तो और कई ऐसे रास्ते भी तलाशते जाते हैं जिनसे नेताओं की झोली भरी जा सके। गरीबों के लिए जितने भी योजना संचालित हैं उनमें से सभी योजनाओं का बंदरबाट इस हद तक जारी है कि वास्तविक गरीब तक इसका फायदा 1 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच पाता हैा इस देश को भ्रष्टाचार की घून लग चुकी है, नीचे से लेकर उपर तक के लोग इसमें जकड चुके हैं। पहले की बात और थी जब भ्रष्टाचार में नाम शामिल होने का मतलब होता था राजनीतिक मौत मगर अब न जाने क्या हो गया है वे बिंदास अंदाज में सरकारी तंत्र में शामिल रह रहे हैं और उनके बीबी बच्चे कहीं सांसद तो कहीं राज्यसभा के सदस्य बनाए जा रहे हैं। चाहे कोडा प्रकरण हो या फिर कलमाडी या अभी हाल ही के राजा प्रकरण मुझे लगता है सिर्फ इन तीनों ने ही मिलकर हिन्दुस्तान के इतने बडे भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जिससे शायद इस देश के सारे के सारे गरीबों की गरीबी दूर हो सकती थी। आज की परिस्थिति में मैं बाबा रामदेव महाराज जी के इस आग्रह को कि विदेशों में जमा काले धन को भारत वापस लाया जाए का बिलकुल भी समर्थन नहीं करता क्योंकि जब तक इस देश में लालू यादव, जार्ज फर्नाडीस, मधु कोडा, सुरेश कलमाडी, ए राजा जैसे नेता रहेंगे इस देश में कितने भी पैसे मंगाए जाए देश कंगाली की ओर ही बढता जाएगा। निक्कमाओं की फौजें बढती जा रही है दिन प्रतिदिन। बाबा रामदेव जी से मेरा यही सवाल है कि जब हम अपने पैसों की हिफाजत नहीं कर पा रहे और भ्रष्टाचारी लोग इस पैसों को अपनी बपौती बनाए फिर रहे हैं तो फिर क्या गारंटी है कि विदेशों में जमा किए गए काले धन को भारत वापस लाने पर उन पैसों का सदुपयोग ही किया जाएगा।
इसलिए जब तक इन जैसे भ्रष्टाचारियों पर सख्ती से कार्रवाई करते हुए इनके पूरे जायदाद को सरकारी सम्पत्ति घोषित नहीं किया जाए और इनके पूरे परिवार को राजनीति से बेदखल न कर दिया जाए तब तक इस मसले को छेडना उचित जान नहीं पडता।
सोमवार, 31 जनवरी 2011
तुम्हारा वो घर
आज भी वहां से गुजरते हुए तुम्हारे मकां की तरफ देखने की हिम्मत नहीं होती, कौन कहता है वक्त के साथ सबकुछ बदल जाता है, तुम्हारा भी शायद ऐसा ही मानना था, लेकिन कमबख्त वक्त आज तक मुझे बदल ही नहीं पाया। मैं जहां था 1994 में आज भी लगता है जैसे वहां ही खडा हूं। मेरे आस पास के सारे नजारे पूरी तरह से बदल गए मगर नहीं बदला तो मैं और मेरी मानसिकता।
मुझे अच्छे से याद है 1994 में जबकि मैंने मोहब्बत की राहों में चलना आरंभ ही किया था, मुझे तुम्हारी ओर तो छोडो तुम्हारे मकां तक देखने की हिम्मत नहीं होती थी, चोरी छिपके नजरे बचाके देखने की जुर्रत करता था वो भी काफी हिम्मत करके और ऐ आज का वक्त है जबकि मेरी मोहब्बत के निशां तक बाकी नहीं रहे मगर इसके बावजूद आज भी मुझमें हिम्मत नहीं कि नजरें उठाकर तुम्हारे मकां की ओर देख सकूं। आज भी तुम्हारे मकां की ओर चोरी छिपके ही नजरे फिरती हैं वो भी काफी हिम्मत करने के बाद।
कौन कहता है वक्त के साथ सबकुछ बदल जाता है.............।
मुझे अच्छे से याद है 1994 में जबकि मैंने मोहब्बत की राहों में चलना आरंभ ही किया था, मुझे तुम्हारी ओर तो छोडो तुम्हारे मकां तक देखने की हिम्मत नहीं होती थी, चोरी छिपके नजरे बचाके देखने की जुर्रत करता था वो भी काफी हिम्मत करके और ऐ आज का वक्त है जबकि मेरी मोहब्बत के निशां तक बाकी नहीं रहे मगर इसके बावजूद आज भी मुझमें हिम्मत नहीं कि नजरें उठाकर तुम्हारे मकां की ओर देख सकूं। आज भी तुम्हारे मकां की ओर चोरी छिपके ही नजरे फिरती हैं वो भी काफी हिम्मत करने के बाद।
कौन कहता है वक्त के साथ सबकुछ बदल जाता है.............।
मंगलवार, 23 नवंबर 2010
सी एम ई आर आई, दुर्गापुर में प्रशिक्षण
मुझे विगत 9 नवम्बर से लेकर 17 नवम्बर 2010 तक सी एम ई आर आई, दुर्गापुर जाकर वहां के लडकों को प्रशिक्षण देने का मौका मिला। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम दुर्गापुर के संस्थान के अनुरोध पर मेरे द्वारा दिया गया। मैं इसके लिए उन सबों के प्रति आभार प्रकट करता हॅूं जिन्होंने मेरा चयन इसके लिए किया तथा मुझे वहां आने के लिए आमंत्रित किया।
प्रशिक्षण में नामित अधिकांशत: कार्मिक मेरे ही बैच मेट थे इसलिए मुझे प्रशिक्षण देने में कोई परेशानी नहीं हुई और न ही मुझे वहां रहने-खाने आदि की कोई परेशानी हुई। उनलोगों ने व्यवस्था में किसी तरह की कोई कमी नहीं की थी। मैं जिन्दगी में कभी भी सी एम ई आर आई, दुर्गापुर को भूला नहीं सकता। इसी संस्थान ने मुझे रोजी-रोटी दी है।
मैं वहां इम्प्रेस साफटवेयर तथा आयकर से संबंधित प्रोग्राम का प्रशिक्षण देने गया था तथा मुझे ऐसा लगता है कि मैंने अपने आप से जितना हो सकता उतना प्रशिक्षण देने का प्रयास किया और सफल भी रहा।
मैं व्यक्तिगत रूप से वहां के सभी अनुभाग अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारी महोदय तथा निदेशक महोदय के प्रति कृतज्ञता के भाव अर्पित करता हूँ।
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
बेचारा
बेचारा शब्द से न जाने मुझे क्यों घृणा सी हो गई है। इस शब्द का उपयोग दूसरों पर करने से पहले मैं सौ बार सोचता हूँ क्योंकि मैं खुद को इस शब्द का पर्यायवाची समझता हॅूं। हर रिश्ते नाते से जुडा हुआ हॅूं मगर फिर भी अकेलेपन की अनुभूति होती रहती है। माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची सभी हैं आस-पास इसके बावजूद हर वक्त अकेलेपन का आभास होता है। रिश्ते नाते किसी सागर की लहरों की भांति चोट करते रहते हैं। इन सबके बीच मैं अकेला खडा चोटिल होता हुआ महसूस करता रहता हूँ।
लोग नित नए रिश्ते बनाते हैं मगर मैं रिश्ते नातों की दुनिया से दूर रहने की कोशिश करता रहता हॅूं क्योंकि वक्त के थपेडे ने मुझे कटु सत्य से परिचय करा दिया है।
रविवार, 29 अगस्त 2010
बीते कल की कहानी
मैंने अपने जीवन में कई उतार चढाव देखे, कई रिश्तों को पुन:र्जन्म लेते देखा, कई रिश्तों को रिश्तों के मायने तलाशते देखा, कई रिश्तों को सामाजिक बंधनों की मर्यादा मानते हुए निभाते हुए देखा, कई रिश्तों को बदलते बिगडते देखा, कई रिश्तों को महज सामाजिक बंधनों की मार्यादा के कारण ही बंधे रहते देखा। अपने 32 वर्ष के जीवन में मुझे रिश्ते नाते के व्यवहारिक दुनिया ने कई दौर दिखाए। मुझे ऐसा लगता है जैसे कि रिश्ते नाते की इस दुनिया में मैं काफी बूढा हो चुका हूँ।
ऐसा लगने लगा है जैसे हर कोई महज सामाजिक बंधनों की मर्यादा का पालन करते हुए रिश्ते नाते निभाने को बाध्य हैं। अब तो रिश्ते नाते चुभने लगे हैं। रिश्ते नातों की इस दुनियां में सब कुछ के रहने के बावजूद मैं अपने आप को अकेला महसूस कर रहा हूँ। दूर दूर तक कोई तो नहीं है आस पास।
आंखे बंद करता हूँ तो भी रिश्ते नातों से भरे मेरे जीवन में मुझे सिर्फ एक शख्स को छोडकर कोई नहीं दिखता और जो दिखता भी है उससे मेरा कोई खून का रिश्ता है भी नहीं। चाहे खुशी के पल हो या फिर दुख के मैं तो हर वक्त खुद को अकेला ही पाता हॅूं। कोई नहीं जिससे मैं अपने जीवन के सुख-दुख को बांट सकूं। मैं अपनी पत्नी और पुत्र के साथ अकेलेपन की जिंदगी पिछले कई वर्षों से जी रहा हॅू। ईश्वर को समर्पित मेरी हर खुशी और दुख का पता है। उसे मालूम है मैं कैसा जीवन जी रहा हॅूं। उसे एहसास है मेरे अकेलेपन का, मेरे जीवन में सूनापन का। सारे लोग आसपास ही हैं लेकिन फिर भी मैं तनहा ही हूँ।
खून के रिश्ते जो जीवन भर साथ रहते हैं मेरे जीवन में वही बदलते वक्त की दरिया में बहते पानी की बयार के साथ बह रहे हैं। रिश्तों को निभाने की कोशिश दोनों ओर से हो रही है मगर मैं अब थक चूका हॅूं रिश्तों को सामाजिक बंधनों की मयार्दा में निभाने की कोशिश करते करते।
एक दिल का रिश्ता बचा है जिसे मैंने सहेज कर रखा है बीते 16 वर्षों से। यह पाक रिश्ता उसी तरह कायम है जिस तरह यह बीते 16 वर्ष पहले था। मैं अपने इष्ट से यही कामना करता हॅूं कि जीवन भर मैं इस पाक रिश्ते के बंधन में बंधा रहूं। वक्त बदलता है लोग बदलते हैं सोच बदलते हैं लेकिन मैं नहीं बदला मेरी सोच भी नहीं बदली। मैं आज भी तडपता हूँ मगर मेरी इस तडपन में अब उससे मिलने की, उसके दीदार की, उसके साथ जिंदगी बिताने की हसरत नहीं रही। वक्त के साथ मेरी यह हसरत दफन हो गयी। मैं अपनी पत्नी और पुत्र के साथ अपना जीवन जी रहा हूँ मगर दिल के इस रिश्ते के साथ मैं अब भी जुडा हुआ हूँ।
मुझे ऐसा लगता है जैसे बीते कल की ही तो बात है वो मेरे जज्बात को समझ नहीं सकी, वो मेरे इकतरफा मोहब्बत पर यकीन कर नहीं सकी। आज भी बिस्तर पर जब रात को सोने जाता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि मैं उसके पैर के सिराहने पर लेट रहा हूँ और फिर ऐसा सोचकर मैं गहरी नींद के आगोश में चला जाता हॅूं। इस दौरान न तो कोई ख्वाब मैं देखता हॅूं और न ही किसी तरह की बेचैनी महसूस करता हॅूं।
मुझे मालूम है कि मैं कभी उसके लायक था ही नहीं और न ही मेरी औकात ऐसी थी कि वो मेरी जीवन संगिनी बन सके मगर इसके बावजूद न जाने क्यों मेरे दिल ने कभी उसको अपने दिल में बसाने की गुस्ताखी की थी इसका जवाब मैं आज भी खुद से तलाशता फिरता हॅूं।
वो जहां भी है खुश रहे, उसकी जिंदगी खुशहाल रहे मेरी ईश्वर से यही कामना है।
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