गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

भ्रष्‍टाचारियों पर अंकुश की नाकाम कोशिश

पिछले कई दिनों से भ्रष्‍टाचार के अनगिनत मामले प्रकाश में आए। कुछेक मामले में कार्रवाई भी कई गई मगर सवाल यही उठता है कि किसी भी प्रकार के भ्रष्‍टाचार के मामले में कार्रवाई निचले स्‍तर तक ही जाकर सिमट जाती हैा कभी भी भ्रष्‍टाचार के मामले में पूरे दल को अर्थात नीचे से लेकर उपर तक के लोगो को घसीटा नहीं जाता हैा भ्रष्‍टाचार कभी भी किसी एक स्‍तर पर नहीं हो सकता। यह नीचे के कार्मिकों से आंरभ होकर उपर के आला अधिकारियों तक जाकर समाप्‍त होता हैा किसी भी प्रकार का भ्रष्‍टाचार तभी संभव है जब नीचे से लेकर उपर तक के अधिकारी व कार्मिक मिल जुलकर इसे अंजाम न पहुंचाए। अधिकतर मामले में यही देखा गया कि भ्रष्‍टाचार का मामला प्रकाश में क्‍या आया सिर्फ नीचे के स्‍तर के कार्मिकों पर कार्रवाई की गयी और उपर के अधिकारी जो मुख्‍य रूप से भ्रष्‍टाचार से जुडे रहते है उनका नाम तक प्रकाश में नहीं आया। एक दो मामले को यदि छोड दिया जाए जो कि रक्षा से संबंधित हैं बाकी सभी मामले इसी तरह के हैं। चाहे ए राजा प्रकरण हो, मधु कोडा प्रकरण हो या फिर कलमाडी प्रकरण, मुझे यही लगता है ऐ सारे के सारे तो सिर्फ मोहरे मात्र हैं, इनके पीछे इनसे जुडे लोग तो आज भी प्रकाश में नहीं आ पाए हैं।
साधारण से साधारण मामले में भी यही होता आया हैा अभी पिछले कुछ महीनों से ट्राफिक पुलिस से संबंधित लोकल न्‍यूज पेपरों में आए दिन भ्रष्‍टाचार के मामले प्रकाश में आ रहे हैं और यहां भी वही हो रहा हैा महज उन लोगों पर ही नाम मात्र कार्रवाई की जा रही है जिनसे संबंधित मामले प्रकाश में आ रहे हैं। मगर सवाल यही उठता है कि क्‍या ट्राफिक पुलिस में कार्यरत कार्मिकों के द्वारा बिना अपने उच्‍च अधिकारियों की जानकारी के यह सब कुछ अंजाम दिया जा रहा है, यदि ऐसा है तो भी उच्‍च अधिकारियों के लिए ऐ शर्म की बात है। मुझे तो बिलकुल भी ऐसा नहीं लगता कि बिना आला अधिकारियेां के मिलीभगत के कोई ट्राफिक पुलिस में काम करने वाला नीचे स्‍तर का कार्मिक दिन दहाडे रोजना वसूली का कार्य करने में मशगूल रहेगा। यहां सिर्फ नीचे स्‍तर के वैसे कार्मिकों पर कार्रवाई की जा रही है जिनके मामले अखबारों में प्रकाशित हो रहे हैं जबकि इनके द्वारा भ्रष्‍टाचार को अंजाम दिलाए जाने वाले अधिकारी साफ बचते फिर रहे हैं। क्‍या इससे भ्रष्‍टाचार पर अंकुश संभव है, क्‍या यह कार्रवाई आम जनता की आंख में धूल झोंकने का प्रयास भर नहीं हैा
आज समूचा हिन्‍दुस्‍तान भ्रष्‍टाचारियों के कारनामे से चर्चित हैा हम हर ओर घिरे पडे हैं इन भ्रष्‍टाचारियों के जमात से और सरकार, प्रशासन अपनी आंख बंद किए हुए हैा मामले प्रकाश में लाने की जिम्‍मेदारी लगती है सिर्फ न्‍यूज चैनलों और अखबारों पर छोड दिए गए हैं।

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

कसाब की फांसी पर चर्चा

पिछले दिनों हार्इ कोर्ट ने अजमल कसाब की फांसी पर अपना फैसला देते हुए उसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा। उसी रात आईबीएन 7 के न्‍यूज नेटवर्क पर अजमल कसाब को अधूरा इंसाफ शीर्षक चर्चा प्रसारित की गई और उस चर्चा के दौरान दोनों वकीलों के साक्षात्‍कार प्रसारित किए गए और फिर लम्‍बी बहस की गई कि क्‍या सही हुआ क्‍या गलत हुआ।
ऐ हिन्‍दुस्‍तान है जनाब और यहां की धरती पर आकर यहां के वाशिंदे को कत्‍लेआम कर देने वालों के साथ भी हमारे अपने मुल्‍क में कई रहनुमां हैं इसके साथ हमारे देश का कानून भी है जो पूरी सत्‍यनिष्‍ठा के साथ मेहमान की तरह रखते हुए फ्री में वकील सुविधा देकर केस को लडने का मौका देता हैा
कसाब की बात तो दूर की है हमारे संसद पर हमला करने वाले मुख्‍य आरोपी अफजल गुरु जिसको फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने दे रखी है और जिस पर हमारे माननीया राष्‍टपति महोदया ने भी अपनी रहम की भीख देने से मना कर दी इसके बावजूद आज तक उसे सरकारी मेहमान बना कर रखा गया है सारे सुख सुविधाओं को देकर और तो और अभी हाल ही में ये भी प्रयास किया जा रहा है कि उसे जम्‍मू कश्‍मीर की जेल में स्‍थानांतरण कर दिया जाए ताकि उसकी बूढी मां उसे रोजाना देख सके। ऐ हद की इंतहा हैा
कहां हैं हम, हम से बेहतर तो अरबी देश है जहां महज चोरी करने पर पकडे जाने पर हाथ पैर काट दिया जाता है वो भी सरेआम। आज जबकि समूचे विश्‍व में आतंकवाद अपना पैर पसार चुका है इस परिद़श्‍य में जरूरत है सख्‍त कानून बनाने की न कोई कोर्ट न कोई ट्रायल सिर्फ सजा और भी सख्‍त से सख्‍त ताकि इससे दूसरो को सबक मिल सके।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

स्विस बैंक में जमा काला धन

पिछले कई महीनों से कभी बाबा रामदेव जी तो कभी बीजेपी और उनकी सहयोगी पार्टियों द्वारा विदेशों खासकर स्विस बैंक में जमा भारतीयों के काले धन को वापस हमारे देश में लाने की बातें की जा रही हैा कहा यह जा रहा है कि यदि विदेशों में जमा काले धन को भारत लाने में सफलता मिल गई तो भारत की अर्थव्‍यवस्‍था काफी मजबूत हो जाएगी, ऐ हो जाएगा, वो हो जाएगा। मैं एक बात जानना चाहता हॅूं कि क्‍या भारत में रुपये पैसों की कमी रही, क्‍या कभी किसी बजट में पिछले बजट की अपेक्षा कम बिल पर सहमति बनी। साल दर साल बजट राशि में तो बढोत्‍तरी होती ही जा रही है। और तो और कई ऐसे रास्‍ते भी तलाशते जाते हैं जिनसे नेताओं की झोली भरी जा सके। गरीबों के लिए जितने भी योजना संचालित हैं उनमें से सभी योजनाओं का बंदरबाट इस हद तक जारी है कि वास्‍तविक गरीब तक इसका फायदा 1 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच पाता हैा इस देश को भ्रष्‍टाचार की घून लग चुकी है, नीचे से लेकर उपर तक के लोग इसमें जकड चुके हैं। पहले की बात और थी जब भ्रष्‍टाचार में नाम शामिल होने का मतलब होता था राजनीतिक मौत मगर अब न जाने क्‍या हो गया है वे बिंदास अंदाज में सरकारी तंत्र में शामिल रह रहे हैं और उनके बीबी बच्‍चे कहीं सांसद तो कहीं राज्‍यसभा के सदस्‍य बनाए जा रहे हैं। चाहे कोडा प्रकरण हो या फिर कलमाडी या अभी हाल ही के राजा प्रकरण मुझे लगता है सिर्फ इन तीनों ने ही मिलकर हिन्‍दुस्‍तान के इतने बडे भ्रष्‍टाचार को अंजाम दिया जिससे शायद इस देश के सारे के सारे गरीबों की गरीबी दूर हो सकती थी। आज की परिस्थिति में मैं बाबा रामदेव महाराज जी के इस आग्रह को कि विदेशों में जमा काले धन को भारत वापस लाया जाए का बिलकुल भी समर्थन नहीं करता क्‍योंकि जब तक इस देश में लालू यादव, जार्ज फर्नाडीस, मधु कोडा, सुरेश कलमाडी, ए राजा जैसे नेता रहेंगे इस देश में कितने भी पैसे मंगाए जाए देश कंगाली की ओर ही बढता जाएगा। निक्‍कमाओं की फौजें बढती जा रही है दिन प्रतिदिन। बाबा रामदेव जी से मेरा यही सवाल है कि जब हम अपने पैसों की हिफाजत नहीं कर पा रहे और भ्रष्‍टाचारी लोग इस पैसों को अपनी बपौती बनाए फिर रहे हैं तो फिर क्‍या गारंटी है कि विदेशों में जमा किए गए काले धन को भारत वापस लाने पर उन पैसों का सदुपयोग ही किया जाएगा।
इसलिए जब तक इन जैसे भ्रष्‍टाचारियों पर सख्‍ती से कार्रवाई करते हुए इनके पूरे जायदाद को सरकारी सम्‍पत्ति घोषित नहीं किया जाए और इनके पूरे परिवार को राजनीति से बेदखल न कर दिया जाए त‍ब तक इस मसले को छेडना उचित जान नहीं पडता।

सोमवार, 31 जनवरी 2011

तुम्‍हारा वो घर

आज भी वहां से गुजरते हुए तुम्‍हारे मकां की तरफ देखने की हिम्‍मत नहीं होती, कौन कहता है वक्‍त के साथ सबकुछ बदल जाता है, तुम्‍हारा भी शायद ऐसा ही मानना था, लेकिन कमबख्‍त वक्‍त आज तक मुझे बदल ही नहीं पाया। मैं जहां था 1994 में आज भी लगता है जैसे वहां ही खडा हूं। मेरे आस पास के सारे नजारे पूरी तरह से बदल गए मगर नहीं बदला तो मैं और मेरी मानसिकता।
मुझे अच्‍छे से याद है 1994 में जबकि मैंने मोहब्‍बत की राहों में चलना आरंभ ही किया था, मुझे तुम्‍हारी ओर तो छोडो तुम्‍हारे मकां तक देखने की हिम्‍मत नहीं होती थी, चोरी छिपके नजरे बचाके देखने की जुर्रत करता था वो भी काफी हिम्‍मत करके और ऐ आज का वक्‍त है जबकि मेरी मोहब्‍बत के निशां तक बाकी नहीं रहे मगर इसके बावजूद आज भी मुझमें हिम्‍मत नहीं कि नजरें उठाकर तुम्‍हारे मकां की ओर देख सकूं। आज भी तुम्‍हारे मकां की ओर चोरी छिपके ही नजरे फिरती हैं वो भी काफी हिम्‍मत करने के बाद।
कौन कहता है वक्‍त के साथ सबकुछ बदल जाता है.............।

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

सी एम ई आर आई, दुर्गापुर में प्रशिक्षण

मुझे विगत 9 नवम्‍बर से लेकर 17 नवम्‍बर 2010 तक सी एम ई आर आई, दुर्गापुर जाकर वहां के लडकों को प्रशिक्षण देने का मौका मिला। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम दुर्गापुर के संस्‍थान के अनुरोध पर मेरे द्वारा दिया गया। मैं इसके लिए उन सबों के प्रति आभार प्रकट करता हॅूं जिन्‍होंने मेरा चयन इसके लिए किया तथा मुझे वहां आने के लिए आमंत्रित किया।
प्रशिक्षण में नामित अधिकांशत: कार्मिक मेरे ही बैच मेट थे इसलिए मुझे प्रशिक्षण देने में कोई परेशानी नहीं हुई और न ही मुझे वहां रहने-खाने आदि की कोई परेशानी हुई। उनलोगों ने व्‍यवस्‍था में किसी तरह की कोई कमी नहीं की थी। मैं जिन्‍दगी में कभी भी सी एम ई आर आई, दुर्गापुर को भूला नहीं सकता। इसी संस्‍थान ने मुझे रोजी-रोटी दी है।
मैं वहां इम्‍प्रेस साफटवेयर तथा आयकर से संबंधित प्रोग्राम का प्रशिक्षण देने गया था तथा मुझे ऐसा लगता है कि मैंने अपने आप से जितना हो सकता उतना प्रशिक्षण देने का प्रयास किया और सफल भी रहा।
मैं व्‍यक्तिगत रूप से वहां के सभी अनुभाग अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारी महोदय तथा निदेशक महोदय के प्रति कृतज्ञता के भाव अर्पित करता हूँ।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

बेचारा

बेचारा शब्‍द से न जाने मुझे क्‍यों घृणा सी हो गई है। इस शब्‍द का उपयोग दूसरों पर करने से पहले मैं सौ बार सोचता हूँ क्‍योंकि मैं खुद को इस शब्‍द का पर्यायवाची समझता हॅूं। हर रिश्‍ते नाते से जुडा हुआ हॅूं मगर फिर भी अकेलेपन की अनुभूति होती रहती है। माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची सभी हैं आस-पास इसके बावजूद हर वक्‍त अकेलेपन का आभास होता है। रिश्‍ते नाते किसी सागर की लहरों की भांति चोट करते रहते हैं। इन सबके बीच मैं अकेला खडा चोटिल होता हुआ महसूस करता रहता हूँ।
लोग नित नए रिश्‍ते बनाते हैं मगर मैं रिश्‍ते नातों की दुनिया से दूर रहने की कोशिश करता रहता हॅूं क्‍योंकि वक्‍त के थपेडे ने मुझे कटु सत्‍य से परिचय करा दिया है।

रविवार, 29 अगस्त 2010

बीते कल की कहानी

मैंने अपने जीवन में कई उतार चढाव देखे, कई रिश्‍तों को पुन:र्जन्‍म लेते देखा, कई रिश्‍तों को रिश्‍तों के मायने तलाशते देखा, कई रिश्‍तों को सामाजिक बंधनों की मर्यादा मानते हुए निभाते हुए देखा, कई रिश्‍तों को बदलते बिगडते देखा, कई रिश्‍तों को महज सामाजिक बंधनों की मार्यादा के कारण ही बंधे रहते देखा। अपने 32 वर्ष के जीवन में मुझे रिश्‍ते नाते के व्‍यवहारिक दुनिया ने कई दौर दिखाए। मुझे ऐसा लगता है जैसे कि रिश्‍ते नाते की इस दुनिया में मैं काफी बूढा हो चुका हूँ।
ऐसा लगने लगा है जैसे हर कोई महज सामाजिक बंधनों की मर्यादा का पालन करते हुए रिश्‍ते नाते निभाने को बाध्‍य हैं। अब तो रिश्‍ते नाते चुभने लगे हैं। रिश्‍ते नातों की इस दुनियां में सब कुछ के रहने के बावजूद मैं अपने आप को अकेला महसूस कर रहा हूँ। दूर दूर तक कोई तो नहीं है आस पास।
आंखे बंद करता हूँ तो भी रिश्‍ते नातों से भरे मेरे जीवन में मुझे सिर्फ एक शख्‍स को छोडकर कोई नहीं दिखता और जो दिखता भी है उससे मेरा कोई खून का रिश्‍ता है भी नहीं। चाहे खुशी के पल हो या फिर दुख के मैं तो हर वक्‍त खुद को अकेला ही पाता हॅूं। कोई नहीं जिससे मैं अपने जीवन के सुख-दुख को बांट सकूं। मैं अपनी पत्‍नी और पुत्र के साथ अकेलेपन की जिंदगी पिछले कई वर्षों से जी रहा हॅू। ईश्‍वर को समर्पित मेरी हर खुशी और दुख का पता है। उसे मालूम है मैं कैसा जीवन जी रहा हॅूं। उसे एहसास है मेरे अकेलेपन का, मेरे जीवन में सूनापन का। सारे लोग आसपास ही हैं लेकिन फिर भी मैं तनहा ही हूँ।
खून के रिश्‍ते जो जीवन भर साथ रहते हैं मेरे जीवन में वही बदलते वक्‍त की दरिया में बहते पानी की बयार के साथ बह रहे हैं। रिश्‍तों को निभाने की कोशिश दोनों ओर से हो रही है मगर मैं अब थक चूका हॅूं रिश्‍तों को सामाजिक बंधनों की मयार्दा में निभाने की कोशिश करते करते।
एक दिल का रिश्‍ता बचा है जिसे मैंने सहेज कर रखा है बीते 16 वर्षों से। यह पाक रिश्‍ता उसी तरह कायम है जिस तरह यह बीते 16 वर्ष पहले था। मैं अपने इष्‍ट से यही कामना करता हॅूं कि जीवन भर मैं इस पाक रिश्‍ते के बंधन में बंधा रहूं। वक्‍त बदलता है लोग बदलते हैं सोच बदलते हैं लेकिन मैं नहीं बदला मेरी सोच भी नहीं बदली। मैं आज भी तडपता हूँ मगर मेरी इस तडपन में अब उससे मिलने की, उसके दीदार की, उसके साथ जिंदगी बिताने की हसरत नहीं रही। वक्‍त के साथ मेरी यह हसरत दफन हो गयी। मैं अपनी पत्‍नी और पुत्र के साथ अपना जीवन जी रहा हूँ मगर दिल के इस रिश्‍ते के साथ मैं अब भी जुडा हुआ हूँ।
मुझे ऐसा लगता है जैसे बीते कल की ही तो बात है वो मेरे जज्‍बात को समझ नहीं सकी, वो मेरे इकतरफा मोहब्‍बत पर यकीन कर नहीं सकी। आज भी बिस्‍तर पर जब रात को सोने जाता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि मैं उसके पैर के सिराहने पर लेट रहा हूँ और फिर ऐसा सोचकर मैं गहरी नींद के आगोश में चला जाता हॅूं। इस दौरान न तो कोई ख्‍वाब मैं देखता हॅूं और न ही किसी तरह की बेचैनी महसूस करता हॅूं।
मुझे मालूम है कि मैं कभी उसके लायक था ही नहीं और न ही मेरी औकात ऐसी थी कि वो मेरी जीवन संगिनी बन सके मगर इसके बावजूद न जाने क्‍यों मेरे दिल ने कभी उसको अपने दिल में बसाने की गुस्‍ताखी की थी इसका जवाब मैं आज भी खुद से तलाशता फिरता हॅूं।
वो जहां भी है खुश रहे, उसकी जिंदगी खुशहाल रहे मेरी ईश्‍वर से यही कामना है।

रविवार, 1 अगस्त 2010

एक लक्ष्य जो अंततः मैंने पा ही लिया...(ईमेल में वेतन स्लिप)

इससे पहले कि मैं इस विषय पर कुछ भी लिखूं सर्वप्रथम मैं अनुभाग अधिकारी श्री राजेश कुमार सिंह रौशन के साथ साथ सूचना व संचार प्रोद्योगिकी इकाई (आई.सी.टी.- यू) के वैज्ञानिक प्रमुख श्री व्योमकेश दास और वैज्ञानिक श्री सुदीप कुंडू को व्यक्तिगत रूप से हार्दिक बधाई देता हूँ जिनके सहयोग से मैंने उस लक्ष्य को अंततः पा ही लिया जो मैंने इस प्रयोगशाला के स्थापना IV / बिल अनुभाग में कार्यभार ग्रहण करने के बाद निर्धारित किया था।
1 सितम्बर, 2008 को CMERI, Durgapur से ट्रान्सफर के बाद मैंने NML जमशेदपुर में अपना कार्यभार ग्रहण किया। उस समय मेरी तैनाती AO Office में हुई। 2 महीनों के बाद नवम्बर, 2008 में मेरी तैनाती इस प्रयोगशाला के बिल अनुभाग में कर दी गयी। बिल अनुभाग में मुझे इस प्रयोगशाला के ग्रुप डी स्टाफ और कैंटीन स्टाफ के वेतन बिल से सम्बंधित कार्य के अलावा ओवर टाइम पेमेंट से सम्बंधित कार्य सोंपा गया। अचानक कुछ ही महीनों के बाद अगस्त, 2009 में मुझे ग्रुप डी स्टाफ और कैंटीन स्टाफ के वेतन बिल के बदले इस प्रयोगशाला के सभी वैज्ञानिको, अनुभाग अधिकारीयों तथा तकनीकी अधिकारियों के वेतन बिल बनाने का काम सोंपा गया साथ ही साथ इस प्रयोगशाला के पूरे कर्मचारियों के आयकर (Income Tax) से सम्बंधित कार्य सौंपा गया। इसी समय से मुझे ये मालूम हुआ कि अधिकतर कार्मिक कई बार बिल अनुभाग आते थे और किसी विशेष माह के वेतन पर्ची को खो जाने की बात करते और उस माह के वेतन पर्ची को दुबारा प्रिंट करके देने की मांग करते ताकि वो अपने आयकर की गणना स्वयं कर सके। ये सबकुछ देखते हुए मेरे मन में ऐसा ख्याल आया क्यूं न सबों के वेतन स्लिप को उनके ईमेल में भेजने की कोशिश की जाय जिससे सबों के ईमेल में उनका वेतन स्लिप सुरक्षित रहे और वे जब चाहें जिस माह के वेतन स्लिप के प्रिंट कर लें। मैंने अपने इस ख़याल को एक लक्ष्य का रूप दे दिया और फिर सचमुच ही कमाल हो गया। जुलाई 2010 का वेतन स्लिप सभी ईमेल अकाउंट धारियों के ईमेल में पहुँच चूका है।
बहुत सारी सेट्टिंग की जाँच करने के बाद उसमें फेर बदल करके फिर उसके बाद वेतन स्लिप को एक सही फॉर्मेट प्रदान करके डाटा को उसमें फीड करना इसके साथ साथ जन्म तिथि, पैन नंबर, घर का पता आदि डाटा को अपडेट करना था। ये सारे होम वर्क मैंने विगत कई महीनों के दौरान किये और फिर मुझे इस प्रयोगशाला के सूचना व संचार प्रोद्योगिकी इकाई के वैगानिक प्रमुख श्री व्योमकेश दास और वैज्ञानिक श्री सुदीप कुंडू जी का सहयोग प्राप्त हुआ। इन दोनों ने कमाल की कोडिंग करते हुए html से pdf के बीच लिंक स्थापित कर दिया और फिर वो हो गया जिसकी कल्पना मैंने की थी। मेरे प्रत्येक कार्य में मुझे मेरे अनुभाग अधिकारी श्री राजेश कुमार सिंह रौशन जी का पूरा का पूरा साथ मिला और मुझे वो हर तरह से अपना दिशा निर्देश देते रहे।
बिल अनुभाग के डाटा और सर्वर के लिंक के बीच सम्बन्ध स्थापित करना और फिर उसे सभी लोगों के ईमेल में स्वतः भेजने के लिए कोडिंग करना ये सारा कुछ संभव हुआ वैज्ञानिक प्रमुख श्री व्योमकेश दास जी के अनुभवी दिशानिर्देश और उनके अधीनस्थ कार्य कर रहे वैज्ञानिक श्री सुदीप कुंडू जी के परिश्रम के कारन।
आज मैंने वो लक्ष्य आख़िरकार पा ही लिया जो मैंने अपने लिए कुछ महीने पूर्व ही निरधारित किया था। बहुत कुछ और भी करना है। हालाँकि मेरे कार्य को देखते हुए मेरा काम सिमित है मगर इसी सिमित दायरे में मैं काफी ऊँची उड़ान भरना चाहता हूँ। आशा है मेरी उच्च अधिकारीयों का साथ मुझे इसी तरह मिलता रहेगा।

रविवार, 25 जुलाई 2010

मेरी अंतिम इच्छा.

बहुत कुछ सोचकर अंततः आज मैं अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त कर रहा हूँ। जन्म से लेकर आज तक मैं जलता ही रहा हूँ। कभी अपनों ने तो कभी अपने बनकर परायों ने मुझे आज तक सिर्फ और सिर्फ जलाया ही है। मैं रोजाना ही इस तपिस में जल ही रहा हूँ। वर्षों से मेरा रोम-रोम इस तपिस की ज्वाला से अन्दर ही अन्दर सुलग रहा है। मैं अब और जलना नहीं चाहता इसलिए मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मरने के बाद मेरे नश्वर शरीर को जलाया नहीं जाय बल्कि इसे दफना दिया जाय। बहुत दिनों तक सोचने के बाद मैंने अपने इस अंतिम इच्छा को व्यक्त की है। कल को मैं रहूँ या ना रहूँ मेरे इस ब्लॉग के माध्यम से अभिव्यक्त टिप्पण को मेरी अंतिम इच्छा मानी जाय।
और एक बात मैंने ROSHANI FOUNDATION के द्वारा अपना नेत्र दान करवा रखा है अतः मेरे मरने के फ़ौरन बाद इसकी सूचना नजदीकी हॉस्पिटल को देकर मेरा नेत्र दान कराने की कृपा की जाय.

मेरी चाहत या मेरा पागलपन.

एक लड़की जो मेरे दिल में मोहब्बत का पैगाम लेकर आई और जिसे जिन्दगी मानकर मैं जीने को विवश हो गया मगर सच्चाई तो यही है कि कभी भी उसके साथ बैठकर दो चार शब्द प्यार भरी बातें तक नहीं हुई। प्यार की बातें तो छोडिये जनाब उसने तो कभी भी मेरी एक तरफा मोहब्बत पर ऐतबार तक नहीं किया। 1994 से आरम्भ हुई मेरी मोहब्बत में हम सिर्फ उनसे व्यक्तिगत रूप से सिर्फ और सिर्फ एक बार ही मुलाकात कर पाए (मेरा ब्लॉग पढ़े - मुलाकात (पहली और आखिरी)-एक सच्ची मोहब्बत की अनकही सच्ची कहानी, ब्लॉग दिनांक 21 अक्टूबर 2009) और उस मुलाकात में भी हम किसी प्रेमी प्रेमिका की तरह नहीं मिले थे। वो मुलाकात का अंजाम भी बस सहानुभूति से शुरू होकर सहानुभूति पर समाप्त हो गयी थी। हमारी मुलाकात एक बार और हुई थी मगर उसे व्यक्तिगत मुलाकात नहीं कहा जा सकता क्यूंकि हम दोनों किसी की शादी में मिले थे और वहां भी हमारी मुलाकात किसी अजनबी की तरह ही हुई थी।
इतना कुछ होने के बावजूद मैं आज तक किसी के एकतरफा प्यार में पागलों की तरह जीवन व्यतीत करता आ रहा हूँ। जो भी मुझे और मेरी एक तरफा मोहब्बत के बारे में जानता है वो मुझपर आज भी हँसता है। मगर मैं क्या करूँ मैंने तो प्यार किया है, मेरी नज़रों में येही प्यार है। उसे पाना या फिर उसके साथ जिन्दगी गुजरना मेरे नसीब में शायद नहीं था मगर उसके प्यार में जिन्दगी गुजरना तो मेरी नसीब में है। आज भी वो मेरी नज़रों के सामने रहती है, उसकी वो मुस्कराहट, उसकी वो नादानी, उसका वो भोलापन, उसकी चाल ढाल सबकुछ आज भी मेरी नज़रों के सामने ही है। 1994 से आज 2010 हो चूका है मगर मेरे लिए तो लगता है जैसे बीते कल की ही बात हो। उसके खवाब मैं अब नहीं देखता उसको पाने की लालसा अब मुझमें नहीं रही मगर उसका प्यार जो मेरे दिल में बरसों पहले था वो आज भी कायम ही है।
वो आज मेरे पास नहीं, मेरे साथ नहीं मगर मैं खुश हूँ कि वो अपनी जिन्दगी में खुश तो है। उसकी खुशियों में ही मेरी खुशियाँ शामिल हैं। मुझे सिर्फ इस बात का दुःख है कि वो मेरी बेपनाह मोहब्बत के प्रति लापरवाह रही, मेरी मोहब्बत को कभी उसने तरजीह नहीं दी, मेरे प्यार को उसने सिर्फ मजाक समझा। मैं नहीं जनता मैं कहाँ गलत था, मैं सिर्फ इतना जनता हूँ कि मैं उसके काबिल नहीं था, मैं अपने पैर पर खड़ा नहीं था, यही कारन था कि मैं खुद को उसकी नज़रों से बचाता फिरता रहा। कभी कभी मैंने कुछ गलतियाँ भी कि इसका ताउम्र अफ़सोस रहेगा।
शायद लोग मोहब्बत के माने अपने हिसाब से लगाते होंगे मगर मेरी नज़रों में येही मोहब्बत है। मैंने मोहब्बत की थी, की है और ताउम्र मेरी मोहब्बत मेरे दिल में धडकनों की तरह धड़कती रहेगी। वो कल भी मेरे पास मेरे साथ नहीं थी, वो आज भी मेरे पास मेरे साथ नहीं है और मुझे मालूम है वो आनेवाले कल को भी मेरे पास मेरे साथ नहीं रहेगी मगर इससे मुझे और मेरी मोहब्बत को क्या फर्क पड़ता है। मैंने उसे चाहा था, उसे अपने दिल के मंदिर में इश्वर का दर्जा दिया था आज भी मेरी चाहतों पर वो ही काबिज है और मेरे मन के मंदिर में आज भी इश्वर के रूप में वो ही समाई हुई है।
अपने इष्ट से मेरी यही दुआ है कि वो जहाँ भी रहे खुश रहे उसकी जिन्दगी खुशहाल रहे.

मंगलवार, 22 जून 2010

सबसे छोटे भाई की मंगनी (इंगेजमेंट)

मेरे घर का सबसे छोटा बेटा और मेरा सबसे छोटा भाई सत्यार्थ सुमन वर्तमान में UCIL जादूगोड़ा में वैज्ञानिक सहायक के पद पर कार्यत है। पिछले कई वर्षों से उसकी शादी की बातचीत चल रही थी। उस दौरान मैं दुर्गापुर में ही था। कई लड़की वालों के प्रस्ताव आये थे। कई लड़कियों के फोटो भी आये थे और कई लड़कियों को देखने मेरे माता पिताजी अपने दामाद और बेटी के साथ गए थे। सितम्बर, 2008 से मैं अपनी पत्नी और बेटे के साथ जमशेदपुर में ही रह रहा हूँ। इस वर्ष मुझे अपने परिवार के साथ अपने भाई की शादी के लिए दो जगह लड़की देखने का न्योता भी मिला। पहले वाली लड़की हमारे परिवार को पसंद नहीं आई मगर दूसरी लड़की जिसे हमलोग देखने राम मंदिर, बिस्टुपुर गए वे हम सबों को पसंद आई। इसके कुछ दिनों के बाद माँ ने हमारी मौसी को गाँव से बुलाया। मौसी गाँव से आई तो हमें बताया गया की मौसी भी लड़की देखने जा रही है। मौसी, माँ घर की मंझली बहू, मंझला बेटा, बेटी और दामाद भी लड़की देखने गए। कुछ दिनों के बाद मुझे किसी और ने ये सूचना दी कि उस दौरान ही मेरे सबसे छोटे भाई की मंगनी कर दी गयी, मंगनी का मतलब एंगेजमेंट अर्थात लड़की और लड़के दोनों ने एक दूसरे को अंगूठी पहनाई। कहने को तो ये एक छोटी सी बात लगाती है मगर मेरे लिए इसके बड़े मायने हैं। मेरे और मेरी पत्नी के साथ वही हुआ जो इससे पहले मेरे मंझले भाई के मामले में हुआ था। (पढ़े मेरा पहले का ब्लॉग "मेरे छोटे भाई की शादी"।) इस बार भी मेरी नजर में मेरे साथ गलत हुआ बिलकुल अन्याय हुआ। घर के छोटे भाई की मंगनी कर दी गयी मगर सिर्फ 3 से 4 किलो मीटर की दूरी पर रहने वाले उसके बड़े भाई को खबर तक नहीं की गयी। ये सब क्या हो रहा है, क्यूं हो रहा है, मेरे माता पिताजी मेरे साथ क्यूं ये सब कर रहें हैं। ये मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ। कहाँ से मैं निभायूं भला एक बड़े बेटे और एक बड़े भाई का फ़र्ज़। शायद यही वजह है कि मैंने आपने आपको समेट लिया है अपने छोटे से परिवार के बीच। मेरे लिए अब परिवार का मतलब मेरी पत्नी और मेरे अबोध बेटे से है। इश्वर सबको खुश रखे, दूर रहकर मैं अपने इष्ट से यही कामना करता हूँ।

बुधवार, 16 जून 2010

मेरे पास तो माँ भी नहीं है.

हर दिन रात को जब कमरे में सोने जाता हूँ, लाईट बंद करके जैसे ही बिस्तर पर लेटता हूँ, मेरे जेहन में दीवार फिल्म का वो सीन तरोताजा हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे बिलकुल ही मेरी आँखों के सामने वो सीन चल रहा है जब एक भाई दुसरे भाई से कहता है "मेरे पास बंगला है, मोटर है, कार है, ............. तुम्हारे पास क्या है" और दूसरा भाई जवाब देते हुए कहता है "मेरे पास माँ है"। ये सीन, ये संवाद हर रात को मेरे जेहन के आर-पार होता है और मुझे ये सोचने पर विवश कर देता है कि फिल्म और असल जिंदगी के बीच कितने फर्क है. कहाँ इस फिल्म में वो माँ जो बचपन से जिस बेटे से ज्यादा प्यार करती रही महज गलत रास्ते पर चलने के कारन वो उस बेटे के बदले अपने दुसरे बेटे का साथ देना पसंद करती है और उसके साथ उसके घर में रहने लगती है।
मेरे अनुसार आज तक मैं अपने रास्ते पर सही था, सही हूँ और मुझे खुद पर विश्वास है कि आगे भी सही ही रहूंगा। मेरी शादी जो कि 30 अप्रैल, 2002 में हुई, इससे पहले मैं अपने घर का दुलारा बेटा था, अपनी माँ का सबसे प्रिय बेटा था। आज मेरे पास जो कुछ भी है वो सिर्फ मेरी माँ की ही देन हैं। इसका एहसास ना सिर्फ मुझे था बल्कि ऐसा घर के अन्य सदस्यों का भी मानना था। ऐसा कहा जाता है कि मैंने जो भी माँगा वो मुझे दिया गया जबकि एक नयी साईकिल तक के लिए मैं आजीवन तरसता रहा। (मेरे पिछला ब्लॉग पढ़ें।) मैं अपने घर में अपनी माँ का प्रिय था ये मैं जानता था। मगर मेरी शादी ने मेरे जीवन में मानो भूचाल ही ला दी। ऐसा कहा जाता है कि शादी के बाद बेटा बदल जाता है मगर मेरे मामले में तो उल्टा ही हुआ, घर के सभी बदल गए। जो बेटा कल तक घर का लाडला हुआ करता था आज तो वो प्यार के एक शब्द तक के लिए तरस गया। हालात बद से बदतर होते गए, मगर मैं नहीं बदला। छोटे भाई की शादी हुई, छोटे भाई ने आर्मी की नौकरी छोड़ दी। वो घर पर ही रहने लगा। घर में हालात और भी तब बदतर हो गए जब उसने हम सबके सामने ही अपनी पत्नी को बेरहमों की तरह से पीटना शुरू कर दिया। मैंने इसका विरोध किया तो मेरे और मेरी पत्नी के खिलाफ कई बातें घर में होने लगी। उस समय मैं दिन में सुबह 909.15 से शाम 05.45 तक NML जमशेदपुर में अ-अस्थाई रूप से परियोजना सहायक के रूप में तथा रात 8 बजे से रात 01.30 बजे तक उदितवाणी प्रेस में पार्ट टाइम कंप्यूटर ओपरेटर के रूप में काम करता था और किसी तरह से 4 हजार तक की कमाई कर पाता था। उस वक़्त मैं रात के 2 बजे से सुबह के 4 - 4.30 बजे तक जागकर प्रतियोगिता की तैयारी करता था, क्यूंकि मैंने परमानेंट नौकरी के लिए कई फॉर्म भरे थे, जिसका लिखित परीक्षा होना था। उस समय ही मुझे एक बेटा भी हुआ था। हालात ऐसे बेकाबू हो गए थे कि अब मुझे इस घर में रहना किसी जेल से कम महसूस नहीं हो रहा था। ये वर्ष 2006 की बात है। ऐसे में मैंने भाड़े के घर में जाने का निर्णय ले लिया और इस सिलसिले में मैं बागबेरा के एक घर को देखा और भाड़े में लेने के लिए इसके मकानमालिक से मिला भी। वे इस घर के लिए 1800 रुपये प्रति महीने मांग रहे थे। मैंने कुछ दिन बाद उनसे मिलने को कहा और वापस घर आ गया। तभी अचानक मुझे अपने ससुराल से ये सन्देश मिला कि वे लोग अपने गाँव जा रहें हैं उनका घर खाली ना रहे इसलिए वे चाहते हैं कि उनके जमशेदपुर वापस आने तक मैं अपने पत्नी और बेटे के साथ उनके घर में रहूँ। मैंने उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और मैं अपनी पत्नी और बेटे के साथ अपने ससुराल में रहने कुछ दिनों के लिए चला गया। इस बीच मैं अपनी पत्नी को बागबेरा का वो घर दिखने ले गया। उस घर को देखकर मेरी पत्नी असंतुष्ट हुई और मुझसे बोली कि इस घर में रहना मुश्किल है, आप कोई दूसरा घर देखें। मैंने अपने करीब के दोस्तों को किसी भाड़े के घर के लिए बोल दिया था और लगभग रोजाना ही मैं NML से छुट्टी होने के बाद कोई ना कोई घर देखने जा ही रहा था कि एक दिन जब NML में ऑफिस के समय में मैंने वो वेबसाइट देखा जिस पर मेरे द्वारा दिए गए परीक्षा का रिजल्ट आने वाला था मगर कई दिनों से नहीं आ रहा था, आज रिजल्ट वेबसाइट पर निकल गया था और मैं CMERI दुर्गापुर के लिए सहायक की लिखित परीक्षा में पास हो गया था और इसका साक्षात्कार अगले महीने 3 अप्रैल, 2006 को कोल्कता में तय किया गया था। NMLसे छुट्टी होने के बाद मैं ख़ुशी ख़ुशी बिस्टुपुर अपने ससुराल पहुंचा और गेट से ही अपनी पत्नी को आवाज लगे, जब मेरी पत्नी सामने आई तो मैंने उसे गले लगाकर कहा "मुबारक हो" उसने मुझे पूछा "क्या बात है, सैलरी बढ़ गयी क्या" मैंने जवाब देते हुए कहा "नहीं रे, अब तुम्हे किसी भाड़े के घर में नहीं रहना, अब तो तुम सरकारी घर में ही रहोगी" इतना कहना था कि मेरी पत्नी के आँखों में आंसू आ गए और उसने रून्ध्ते स्वर में कहा "क्या बात है?" तब जाकर मैंने उसे अपने लिखित परीक्षा में पास होने की जानकारी दी। मुझे अपने ऊपर यकीं था कि मैं किसी तरह का भी साक्षात्कार का सामना आसानी से कर सकता हूँ और हुआ भी यही मेरा साक्षात्कार मेरे अनुसार बहुत बढ़िया रहा। कुछ महीनों के बाद मैंने CMERI दुर्गापुर में परमानेंट नौकरी ज्वाइन कर ली और फिर सीधे बिस्टुपुर ससुराल से अपनी पत्नी और बच्चे तथा अपने घर से अपने सामान को दुर्गापुर शिफ्ट कर लिया। लगभग दो साल मैं वहां रहा और फिर 1 सितम्बर, 2008 को मैं ट्रान्सफर कराकर वापस एक परमानेंट पद पर NML जमशेदपुर आ गया।
इन वर्षों के दौरान मुझे रोजाना ही दीवार फिल्म के इस सीन और इसके डायलाग का सामना करना पड़ा और ये निरंतर जारी है। वर्तमान परिदृश्य में मेरे साथ वो हो रहा है जो उस फिल्म में खलनायक की भूमिका निभा रहे अमिताभ बच्चन के साथ हुआ, जो गलत रास्ते पर चलने के कारन अपनी माँ की ममता से दूर हो गया। आज भी वो डायलाग "मेरे पास माँ है" के अनुभूति मेरे जेहन को जार-जार कर देती है और मुझे ये सोचने पर विवश कर देती है कि आखिर किस गलती की सजा मुझे मिल रही है जो एक खलनायाक की भांति मुझसे पेश आया जा रहा है। मेरा अंतर्मन रोजाना ही चोटिल हो रहा है।
सही रास्ते पर चलने के बावजूद मैं तो आज यही खुद को कहने को विवश हूँ कि "मेरे पास तो माँ भी नहीं है."

बड़ा बेटा और छोटे भाई की शादी.

मुझे मिलाकर हम तीन भाई हैं। इनमें से सबसे बड़ा मैं ही हूँ। मेरे बाद वाले भाई पुरुषार्थ सुमन, जिसे हम सब प्यार से छोटू बोलते थे। वो कम उम्र से ही रंगीला मिजाज का रहा है। दिखने में भी वो अक्षय कुमार से कुछ कम नहीं लगता था। छोटे उम्र से ही उसका झुकाव लड़कियों की तरफ ज्यादा रहा था। इंटर तक की पढाई करने के बाद जमशेदपुर के टेल्को मैदान में ही हुए आर्मी के सेलेक्सन कैंप में उसका चयन हो गया और उसने बड़ी ही कम उम्र में आर्मी ज्वाइन कर ली। उस समय मैं NICT कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में कंप्यूटर शिक्षक के रूप में कार्य कर रहा था। मुझे अच्छे से याद है जब उसकी आर्मी की ट्रेनिंग चल रही थी, एक दिन उसने मुझे फ़ोन किया था और रो रोकर मुझसे आर्मी की नोकरी छोड़ने की बात बोल रहा था। मैंने उसे समझाया था कि पागल हो क्या? आज के ज़माने में भला नोकरी किसी को मिलती है क्या? ऐसा हरगिज नहीं सोचना। वो अक्सर फ़ोन पर माँ से भी यही बातें करता और माँ बोलती थी कि बेटा तुम्हारी शादी कर दूँ फिर तुम ये आर्मी की नोकरी छोड़ देना। मेरी शादी तो हो ही चुकी थी। उसकी शादी के लिए भी लड़की वाले आ ही रहे थे। बहुत सारे लड़की वालों से उसकी शादी की बातचीत हो रही थी, मगर कहीं भी बात फाइनल नहीं हुई थी। इसी बीच मेरे माता पिताजी दोनों ही कुछ काम के सिलसिले में अपने गाँव फरदा, मुंगेर, बिहार गए। उनके गाँव जाने के कुछ दिनों बाद घर में फ़ोन आया कि बेटा यहाँ गाँव में तुम्हारे पापा की तबियत कुछ खराब हो गयी है, ऐसा करो तुम सबसे छोटे भाई सत्यार्थ को उन रूपयों के साथ गाँव भेज दो जो घर के भाड़े के रूप में उसे भाडेदार ने दे दिए होंगे। हमारे पुराने घर के कुछ कमरे किराये पर दिए गयी थे जिनका किराया पापा को मिलता था क्योंकि पापा पुराने घर में ही रहते थे। मैंने अपने सबसे छोटे भाई सत्यार्थ को इस विषय में बताया और उसे अपनी गाड़ी से रेलवे स्टेशन ट्रेन पकड़ने के लिए छोड़ आया। कुछ दिनों बाद फिर मेरे पास मेरी माँ का फ़ोन आया और माँ ने कहा "बेटा हमलोग जमालपुर रेलवे स्टेशन में हैं, यहाँ तुम्हारे छोटे भाई के लिए एक लड़की देखने आयें हुए हैं, लड़की थोड़ी हेल्थी है, क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आ रहा है? तुम ही बताओ" इतना सुनकर मैं विस्मित हो गया और थोड़ी देर के लिए मैं सोचने लगा कि मेरे भाई के लिए लड़की देखने गएँ हैं और मुझे जानकारी तक नहीं। मैंने तुरंत ही अपनी माँ से कहा "देखो माँ जो भी फैसला करना छोटू से बात करके ही करना", इतना कहकर मैंने तुरंत ही छोटू का फ़ोन नंबर अपनी माँ को नोट कर दिया। दुसरे दिन शाम के समय मेरे गाँव से फ़ोन आया कि माँ, पापा और सत्यार्थ गाँव से जमशेदपुर के लिए निकल चुके हैं और मेरे छोटे मौसेरे भाई ने मुझे ये बात बतलाई कि "छोटू भैया का रिश्ता तय हो गया है, मगर मुझे वो लड़की छोटू के लायक नहीं लगती" मेरी मौसी ने मुझसे कहा कि "बेटा तुम्हरे माँ पिताजी ने रिश्ता तय कर दिया है और वे तो लड़की वालों से कुछ रूपए भी लेकर अपने साथ गए हैं" इतना सुनकर मैं कुछ देर के लिए खामोश ही रहा जबकि फोन दूसरी और से कट चूका था। मेरी पत्नी मुझसे बार बार पूछ रही थी क्या बात है? मगर मैं उसे कुछ भी बता पाने के लायक नहीं था। आज मैं अन्दर ही अन्दर पूरी तरह से टूट गया था। मुझे कुछ समझ मैं ही नहीं आ रहा था, ये क्या हो रहा है, ये क्यूं हो रहा है, आखिर मैंने क्या गुनाह किया है? आखिर मेरे अपने सहोदर छोटे भाई का रिश्ता तय कर दिया गया और मैं और मेरी पत्नी को लड़की और उसके परिवार को देखने तक का मौका नहीं दिया गया। सब कुछ इतना अचानक क्यों किया गया मैं समझ ही नहीं पाया। मेरे माता पिताजी ने क्यों घर के एक बड़े बेटे को इस घर के इतने बड़े फैसले में शरीक नहीं किया, ये मैं बिलकुल ही समझ नहीं पाया।
दूसरे दिन मैं अपनी गाड़ी लेकर रेलवे स्टेशन गया अपने माँ पिताजी और सबसे छोटे भाई सत्यार्थ को रिसीव करने। अपनी माँ को मैंने अपनी गाड़ी के पीछे बैठाया जबकि मेरे पिताजी और छोटा भाई टेम्पो से आने लगा। रास्ते में मैंने अपनी माँ से पूछा कि माँ क्या छोटू का रिश्ता तय हो गया है? माँ ने बड़े ही सहजता से जवाब देते हुए कहा कि "अभी कहाँ अभी तो हमने लड़की ही देखी है, छोटू छुट्टी में घर आएगा लड़की पसंद करेगा तभी बात फ़ाइनल होगा" मैंने फिर पूछा "कहीं तुमलोगों ने लड़की वालों से रुपये तो नहीं ले लिए" माँ ने सहज भाव से कहा "नहीं रे पैसे की जल्दी क्या है पहले छोटू को लड़की तो पसंद आ जाय" कुछ देर के बाद हम लोग घर आ गए और तभी मेरे पापा ने मेरी माँ से कहा "बीना हो, रुपयों को ठीक से गिन लीजिये और सैफ में रख दीजिये" इतना सुनना था कि मैं अपनी माँ को देखने लगा, मेरी माँ को काटो तो खून नहीं, उनकी झूठ पकड़ी गयी थी। आनन् फानन में मुझे लड़की का फोटो देखने के लिए दिया गया, फोटो देखकर मैंने उस फोटो को जमीं पर फेंक दिया और अपनी माँ से कहा "माँ तुम्हे ये लड़की किसी भी एंगल से छोटू के लायक लगती है क्या?, कैसे तुमने इसे छोटू के लिए पसंद कर लिया?" इतना कहकर मैं अपने कमरे के अन्दर चला गया फिर मुझे पता चला कि माँ ने फ़ोन करके छोटू को छुट्टी लेकर आने को कहा ताकि वो लड़की दो देख सके मगर उसने माँ को यही कहा जो तुम्हारी पसंद है, उसी से मैं शादी करूँगा। और फिर वो अपनी शादी के लिए आर्मी से 1 महीने की छुट्टी लेकर आया और उसकी धूम धाम से गाँव से ही शादी भी हो गयी मगर शादी के बाद जब छुट्टी ख़तम होने पर वो अपनी आर्मी की नोकरी ज्वाइन करने जम्मू गया तो उसने वहां से माँ को फ़ोन करके कहा कि "माँ मैं नोकरी ज्वाइन नहीं करना चाहता, मैं वापस आना चाहता हूँ, तुम यदि मन करोगी तो मैं यहीं कहीं घूमता रहूँगा मगर नोकरी ज्वाइन नहीं करूँगा" इसपर माँ ने उससे कहा कि "बेटा तुम घर वापस आ जाओ" और फिर मेरा छोटा भाई आर्मी की नोकरी छोड़ वापस अपने घर जमशेदपुर आ गया।
आज भी वो जमशेदपुर में ही अपनी माँ के साथ ही रह रहा है मगर बहुत कुछ बदल चूका है। आज की तिथि में वो एक नंबर का पियक्कड़ हो चुका है। उसका दिन दारू से शुरू होता है और दारू से ही दिन ढलता भी है। सिर्फ उसकी ही वजह से मैं अपनी पत्नी और एक्लोते बेटे के साथ NML कालोनी गोलमुरी में रह रहा हूँ और तनहा जीवन यापन कर रहा हूँ।
अब तो मेरा छोटा भाई छोटू अपनी माँ की ख़ुशी के लिए अपनी बीबी तक को लातों से भी मारने से परहेज नहीं करता है। उसका एक 4 साल का बड़ा प्यारा बेटा भी है, जो अपनी आँखों से ये सबकुछ देखता है। पता नहीं वो क्या समझता होगा जिन्दगी के मायने को। पता नहीं किन संस्कारों में वो अपना जीवन यापन करेगा। आज मेरा छोटा भाई छोटू और उसकी पत्नी और बेटे का पूरा खर्चा मेरे माँ और पिताजी ही उठा रहें हैं। अपने छोटे भाई को दिन प्रतिदिन अँधेरे की ओर गर्त में गिरते देख रहा हूँ, मैं मानसिक रूप से आहत हूँ समझ नहीं पा रहा हूँ कि मैं क्या करूँ?