बुधवार, 2 जून 2010

साईकिल का अरमान

बात उन दिनों की है जब मैं 1995 में इंटर पास करके B Sc. (Math) में नामांकन कराया था। उस वक़्त मैंने tuition के लिए आदर्श नगर, सोनारी में कोपरेटिव कालेज के प्रोफेसर के यहाँ अपना नामांकन कराया। मेरे घर से सोनारी की दूरी लगभग 10 किलो मीटर थी। मेरे पास वोही पुरानी साईकिल जो मेरे पापा की थी जिसका उपयोग मैं 1992 से करता आ रहा था। इसी साईकिल से मैंने KMPM स्कूल, बिस्टुपुर जाकर क्लास IX और X की पढाई की और मेट्रिक पास किया, इसी साईकिल से मैं KMPM इंटर कॉलेज, बिस्टुपुर जाकर XI और XII की पढाई की और इंटर पास किया। अब चूँकि मैंने SP कॉलेज, parsudih में Graduation के लिए अपना नाम लिखा लिया था और tuition के लिए मुझे सोनारी जाना पड़ रहा था इसलिए मैंने अपने पापा से एक नयी साईकिल के लिए कहा। ऐसा नहीं कि मैंने अपनी साईकिल के लिए पहली बार अपने पापा से कही हो, ये मैं विगत 4 वर्षों से उनसे कहता आ रहा था, लेकिन मुझे नयी साईकिल नहीं मिल रही थी। मगर इस बार मैं जिद पर आ गया और मैंने भूख हड़ताल कर दी और कहा कि जब तक मुझे नयी साईकिल नहीं मिलेगी मैं खाना नहीं खाऊंगा।

अंततः मेरे पापा मुझे लेकर साईकिल खरीदने के लिए घर से निकले। हम दोनों पैदल ही जा रहे थे। मेरा रोम रोम नयी साईकिल मिलने की ख़ुशी में हर्षित हो रहा था। मैं येही सोचता जा रहा था कि मैं मोटे चक्के वाला हीरो रेंजर साइकिल ही लूँगा। हीरो रेंजर साइकिल की तमन्ना मेरे मन में विगत 4 वर्षों से थी। अपने साथ के लड़कों को अच्छी साईकिल पर चलते देख मुझे अपनी साइकिल पर बैठने में खराब महसूस होती थी। मैंने कैसे कैसे करके मेट्रिक से इंटर का सफ़र पार किया लेकिन जब graduation में पंहुचा तो में इसे बर्दास्त नहीं कर सका। मुझे अपनी जिद को हकीकत का जमा पहनने के लिए अंततः भूख हड़ताल का ही सहारा लेना पड़ा।

मुझे याद आ रहा था वो लम्हा जब हमारे घर में टीवी नहीं थी, उस वक़्त बुधवार और शुक्रवार को रात 8 बजे चित्रहार DD1 पर प्रदर्शित होता था जिसमे नए नए फ़िल्मी गाने दिखाए जाते थे, उसे देखने के लिए मैं बगल वाले घर के पीछे के जंगले पर किसी तरह कूद कादकर इसे देखता था और रविवार को जब रामायण का समय होता था मैं और मेरे छोटे भाई लाइन लगाकर काफी समय पहले से बगल वाले के घर के दरवाजे के बाहर खड़े रहते थे, बगल वाले अंकल का जब मन करता तब अपना दरवाजा खोलते थे कभी वक़्त पर तो कभी काफी समय के बाद। एक दिन जब उन्होंने रामायण ख़त्म होने के बाद अपना दरवाजा खोला और मुझसे ये कहकर कि चलो जाओ अपने घर रामायण तो ख़त्म हो गया है, मुझे बहुत ही खराब लगा था, उसी दिन मैं घर आया और भूख हड़ताल पर बैठ गया और अपनी माँ से मैंने येही कहा अब तो मैं तभी खाना खाऊँगा जब मेरी घर में अपनी टीवी आएगी। और फिर अंततः मेरे घर में टीवी आ ही गई। ऐसा नहीं था कि टीवी के लिए घर में इससे पहले बात नहीं हुए कई वर्षों से हमलोग अपने पापा से एक टीवी लाने के लिए कह रहे थे मगर पता नहीं क्यूं टीवी घर में नहीं आ रहा था। ऐसा भी नहीं था कि मेरे पापा के औकात नहीं थी या फिर वे बेरोजगार थे। वे तो टिस्को में परमानेंट थे और साथ ही बहुत सारे घर किराए पर दिए हुए थे फिर भी ना जाने क्यूं हम तरसते रहे हर उस छोटी छोटी चीज के लिए जो एक सामान्य घर के लिए बहुत ही जरुरी होती है।

साइकिल के लिए जाते समय रास्ते भर मेरे दिमाग में पुरानी बातें याद आ रही थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्यूं आखिर क्यूं हमारे साथ ये सब कुछ हो रहा है। क्यूं महज एक साईकिल के लिए भी पापा तैयार नहीं हो रहे थे। मेरे कदम जैसे जैसे आगे बढ़ रहे थे मेरी निगाहों के सामने मेरा वो ही अरमान हीरो रेंजर साईकिल दिख रहा था। अचानक ही मैंने देखा मेरे पापा तो किसी साईकिल दूकान की बजाय कपडे के दूकान के अन्दर जा रहें हैं, ये वोही कपड़ा का दूकान था जहाँ से कई वर्षों से हमारे घर में उधार में कपडे लिए जा रहे थे, मेरे पापा के कोई जान पहचान वाले का ही दूकान था। मेरे पापा अंदर गए और गल्ले पर बैठे उस अंकल से बोले कि देखो भाई तुम्हारा भतीजा साईकिल लेने की जिद कर रहा है, तुम इसे कोई साईकिल खरीद दो, इसने तो खाना पीना तक छोड़ दिया है। उस अंकल ने हँसते हुए मुझे कहा इसमें कहाँ कोई परेशानी है चलो मेरे साथ बगल में ही तो दूकान है अभी खरीद देता हूँ। इतना कहकर वो आगे की और निकल पड़े और मैं उनके पीछे पीछे चलने लगा।
थोड़ी हो दूर पर जाकर वे एक छोटी सी दूकान, जिसके सामने गिनती के महज चार साईकिल लगी हुई थी और वो दूकान कोई रोड पर फूटपाथ पर लगाए जाने वाला दूकान सा लग रहा था, के सामने रूक गए और मुझसे कहा कि देख लो कौन सी साईकिल लेनी है। उस दूकान को देखकर मैं समझ नहीं पा रहा था कि ये क्या हो रहा है, क्यूंकि महज चार साईकिल ही तो दिख रही थी यहाँ, मैंने उन साइकिलों को देखकर कहा कि इसमें से तो मुझे कोई पसंद ही नहीं मुझे तो मोटे चक्के वाला हीरो रेंजर साईकिल चाहिए। मेरी बात सुनकर अंकल ने कहा देखो यदि साईकिल चाहिए तो जो यहाँ दिख रहा है उसमें से कोई एक ले लो। मैं दुविधा में था, मैं तो बीते चार वर्षों से हीरो रेंजर साईकिल के अरमान लिए भटक रहा हूँ और यहाँ तो पुराने मॉडल वाले साईकिल ही हैं और एक साईकिल नयी मॉडल की है भी तो वो पतले चक्के वाली है। मैंने झिझकते हुए ये सोचकर कि यदि ये नहीं मिला तो पापा फिर कभी दुबारा देंगे भी नहीं मैंने अपना मन मारते हुए पतले चक्के वाला साईकिल चुन लिया और फिर थोड़ी देर के बाद वो साईकिल अनमने मन से लेकर घर वापस आ गया।
मेरा हीरो रेंजर साईकिल खरीदने का वो अरमान आज तक अधूरा है। शादी हो गयी, बच्चे हो गए मैं परमानेंट नौकरी कर रहा हूँ मगर मेरा हीरो रेंजर साईकिल का वो खवाब आज तक अधूरा ही है शायाद जीवन भर अधूरा ही रहे? अब तो पिछले साल अपने बेटे के लिए छोटी साईकिल खरीदी मैंने। मेरी सारी हसरत तो दफ़न ही है, अब अपने अरमानों को पूरे करने का समय ही नहीं, पारिवारिक हसरतों को तवज्जो देना ही मेरी पहली प्राथमिकता है। मैं वो सारे सुख अपने परिवार को देना चाहता हूँ जिसके लिए मैं बचपन से लेकर आज तक तरसता रहा।
आज तक में ये नहीं समझ पाया कि आखिर क्यूं हमारे साथ ही ये सब कुछ हुआ, जबकि मेरे पापा तो उस समय परमानेंट नौकरी में थे। हर एक चीज के लिए हम तरसते रहे। पिता का स्नेह क्या होता है ये तो आज तक मैं जान ही नहीं पाया।

मंगलवार, 1 जून 2010

कैसे मैं भूल जाऊं उसे?

कितना आसान है ये कहना कि भूल जाओ। मगर क्या ऐसा मुमकिन है? मैंने अपनी जिन्दगी में ये आजमा कर देखा है? एक तरफा मोहब्बत की तपिस में जल जलकर किसी की निगाहों में अपनी जिन्दगी का सवेरा देखा है। नफरत भरी नज़रों में न जानें क्यूं अपने लिए बेइंतहा प्यार देखा है। किसी को अपनी धडकनों में बसाकर अपनी निगाहों में उसका अख्स बिठाकर फिर उसे भूल पाना भला कैसे संभव हो सकता है? जिसकी याद मेरी सांसों में दोड़ते हुए खून की तरह फ़ैल चुकी हो उसे भला भूल पाना कैसे संभव हो सकता है?
1994 से लेकर आज तक सब कुछ बदल चुका है। यदि नहीं बदला तो सिर्फ मेरा अंतर्मन और मेरी दिल का वो एहसास जो किसी के प्रति समर्पित था। 1994 से 28 नवम्बर, 2000 के बीच जबकि मेरी उससे कोई व्यक्तिगत मुलाकात तक नहीं हुई थी, मेरी आँखे हर दिन उसके दीदार को प्यासी भटकती रहती थी. उसकी एक नज़र पाने भर को मैं बेचैन हो उठता था।
29 नवम्बर, 2000 ने मेरे उन सारे एहसासों को मिटा दिया। मेरी सोच को मुझे बदलने को मजबूर कर दिया। इस दिन में स्वप्न लोक की नगरी से धरातल पर वापस आया और मैंने खुद का सही आंकलन किया। एक तरफ मेरी दम तोडती मोहब्बत थी तो दूसरी तरफ वो जो मेरी मोहब्बत को दोस्ती का रूप देकर मुझसे किनारा काटना चाह रही थी। मैंने अपनी दम तोडती मोहब्बत का साथ दिया और उसकी दोस्ती के पेशकश को सहजता से अस्वीकार कर दिया। ये वही दिन था जब उसने मुझसे कहा था कि "आप शादी कर लीजिये, मुझे भूल जाइये"
30 अप्रैल, 2002 को मेरी शादी हुई और आज 2010 का साल चल रहा है, मेरी शादी को 8 साल से ज्यादा हो गए हैं लेकिन उसे मैं भूला नहीं पाया। शायद पूरी जिन्दगी उसे भुला नहीं पाऊँगा। मेरे अरमान बदल गए, मेरे खयालात बदल गए लेकिन मेरा दिल और उसमें कैद उसकी मोहब्बत कमबख्त आज तक बदलने का नाम ही नहीं ले रही है।
कितना आसान होता है किसी के लिए ये कह देना कि "मुझे भूल जाओ" मगर मैं जनता हूँ कि दिल के करीब लाकर किसी को भूलना संभव ही नहीं।
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कैसे मैं भूल जाऊं उसे
दिए जिसने जख्म
किये जिसने सितम
हरबार दिल पर उठाये हमने ये सितम
जिनसे जुदा होकर आँखे हुई थी नम
कैसे मैं भूल जाऊं उसे
दिए जिसने जख्म
किये जिसने सितम ॥ 1

 
नहीं कह सकता मगर मैं उसको बेरहम
आज भी है वो क्यूंकि दिल के आईने में हरदम
कैसे मैं भूल जाऊं उसे
दिए जिसने जख्म
किये जिसने सितम ॥ 2

 
हपल तड़पता रहता हूँ जिसके बिना मैं "सुमन"
उसको भूलने को अब पूरी जिन्दगी भी पड़ेगी कम
कैसे मैं भूल जाऊं उसे
दिए जिसने जख्म
किये जिसने सितम ॥ 3
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शनिवार, 29 मई 2010

नक्सलवाद नहीं आतंकवाद

विगत कई महीनों से नक्सल वादियों द्वारा किये जा रहे आतंककारी क़दमों ने समूचे हिन्दुस्तान को हिला कर रख दिया है। चाहे वो छत्तीसगढ़ में CRPF पर किया गया हमला हो या फिर झारग्राम में पिछले कई दिनों से ट्रेनों पर किये जा रहे हमले हों, इन सब को देखते हुए वर्तमान परिदृश्य में नक्सली को आतंकवादी कहना गलत नहीं होगा।
नक्सल वादियों ने अपने कृकृत्य से अपने आप को हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा दुश्मन बना लिया है। हालात तो ऐसे हैं कि आज हमे पकिस्तान और आतंकवादियों से भी कई गुना खतरा अपने ही मुल्क के अपने ही लोग नक्सलवादियों से है।
अब तो जरुरत है श्रीलंका के द्वारा अपने मुल्क के अन्दर आतंक कारी गतिविधियों के खाते का अनुसरण करने की। पानी अब सर के ऊपर जा चूका है और हमे अब जरुरत है अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने की।
अब नक्सल आन्दोलन पर पूरी तरह नकेल कसने की जरुरत है इसके लिए हमें अपने आर्मी, नेवी और एयर फौर्स को इसकी जिम्मेदारी दे देनी चाहिए।

रविवार, 9 मई 2010

गोलमुरी थाना और अपनों को बहुत-बहुत धन्यवाद.

मेरी हीरो होंडा motorcycle जो कि 20 अप्रैल 2010 को रात के लगभग 08.30 से 9 बजे के बीच tinplate Reliance फ्रेश के सामने से चोरी हो गयी थी उसे 6 मई 2010 को गोलमुरी थाना द्वारा recover कर लिया गया और इस चोरी में शरीक चोर को हवालात भेज दिया गया। इसके लिए मैं अंतर मन से गोलमुरी थाना और प्रशासन से जुड़े सभी अधिकारीयों और कार्मिको का धन्यवाद देता हूँ। मेरे उपर्युक्त गाड़ी चोरी के सन्दर्भ में गोलमुरी थाना द्वारा उठाये गए क़दमों का मैं शुक्रिया अदा करता हूँ। इस मामले में मैं विशेषकर गोलमुरी थाना में तैनात और मेरे मामले के जाँच अधिकारी श्री K P Singh जी का आतंरिक रूप से आभार प्रकट करता इसके साथ साथ पूरे गोलमुरी थाना के स्टाफ सदस्यों के प्रति भी मैं अपना आभार प्रकट करता हूँ।

मैं उन सभी दोस्तों, परिवार के सदस्यों, सहकर्मियों के प्रति अपना आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने मेरे इस दुःख भरे समयमें अपना शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से मुझे सहयोग दिया या देने की कोशिश की।

अंत में मैं माननीय विधायक श्री Banna Gupta Jee के प्रति अपना तहे दिल से आभार प्रकट करता हूँ जिन्होंने मेरे मामले में अपनी रुचि दिखाई और हरसंभव प्रयास किया साथ ही एक बड़े भाई सा स्नेह मुझे दिया, मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में भी मुझे उनका स्नेह अनवरत मिलता रहेगा।

मेरी किस्मत और हमदर्दों का साथ

आज काफी दिनों के बाद समय निकालकर अपने ब्लॉग पर कुच्छ लिखने बैठा हूँ। पिछले महीने मेरे जीवन में काफी उतार चड़ाव आये। मैं २० अप्रैल २०१० का दिन कभी भी भूल नहीं सकता। एक तरफ ख़ुशी और दूसरी तरफ गम। दोनों का तालमेल एक साथ एक दिन वो दिन था २० अप्रैल २०१०। दोपहर के ३ बजे के करीब मुझे LTC अग्रिम का पैसा ऑफिस से मिला और मैंने तुरंत ही इन्टरनेट से IRCTC द्वारा टाटानगर से जम्मू जाने और वापस आने के लिए ट्रेन का ticket कटा लिया। ticket को देखने पर मैंने ये पाया कि सारी की सारी ticket उपर बर्थ की थी। तुरंत मैंने उस ticket को कैंसल कराया और पैसे लेकर टाटानगर रेलवे स्टेशन चला गया और वहां से ticket का reservation कराया। मेरे अनुरोध पर मुझे जाने और वापस आने के ticket में एक ticket lower बर्थ का मिल गया। मेरे जम्मू जाने की जानकारी मैंने अपने माँ के घर जाकर माँ और छोटे भाई को दिया और फिर अपनी बहन के ससुराल जाकर अपनी बहन को दिया और फिर अपने घर गोलमुरी वापस आते समय लाल बिल्डिंग स्थित मोटर मेकानिक को अपनी हीरो होंडा के key को बदलने के लिए आने वाले शनिवार को उसके पास आने की बात कही और वापस अपने घर करीब 7.30 बजे आ गया। घर आकर मैं फ्रेश होकर सब्जी लाने के लिए निकलने ही वाला था कि मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि वो भी मेरे साथ बाजार जाना चाहती है। मेरे हाँ कहने के बाद वो भी मेरे बेटे के साथ तैयार हो गयी। करीब 08.30 बजे मैं अपने परिवार के साथ ख़ुशी पूर्वक मेरी घर गोलमुरी के कुछ दूरी पर स्थित tinplate के reliance फ्रेश में सब्जी लेने गया। मैंने अपनी हीरो होंडा motorcycle JH05C 0498 को reliance फ्रेश के सामने लगाया और handel lock करके अन्दर चला गया। मैं अक्सर ही सब्जी आदि लेने के लिए यहाँ कभी अकेले तो कभी अपने बेटे के साथ आया करता था। आज पहली बार मैं अपनी पत्नी के साथ यहाँ सामान लेने आया था।
करीब आधे घंटे अन्दर रहने के बाद सामान खरीदकर जब रात के करीब 9 बजे मैं बाहर निकला तो उस स्थान पर अपनी गाड़ी को नहीं पाकर मैं सन्न रह गया। मैं बेतहासा इधर से उधर दौड़ रहा है और मुख्या सड़क के दोनों और अपनी गाड़ी को खोज रहा था। मेरी पत्नी और मेरे बेटे का तो मुझसे भी बुरा हाल था। वो दोनों पसीने से तर बतर हो गयी थे। तभी वहां भीड़ जमा हो गयी और वे लोग मुझे तुरंत ही गोलमुरी थाना जाकर गाड़ी चोरी होने की बात बतलाने को कह रहे थे। मैं तुरंत ही एक ऑटो को रुकवाकर उसपर अपने परिवार के साथ बैठकर गोलमुरी थाना रात के करीब सवा 9 बजे पहुंचा। मेरा थाना पहुँचाना था कि मुझे वहां बैठे एक अधिकारी नें तुरंत ही अपनी गाड़ी नंबर बताने को कहा और मेरे परिवार को कुर्सी पर बैठने को कहा। करीब 9.20 बजे ही मेरी गाड़ी के चोरी होने सम्बन्धी सूचना वायरलेस द्वारा पूरे जमशेदपुर में फैला दी गयी और फिर इसके बाद उस अफसर ने स्वयं इससे सम्बंधित FIR के लिए मुझे application लिखने लगे। कुछ देर बाद ही उन्होंने कहा कि FIR के लिए आपकी गाड़ी का Engine नंबर और चेसिस नंबर की जरुरत है इसलिए आप कृपया कर के गाड़ी का honor बुक लेकर आइये।
मैं तुरंत ही अपने परिवार के साथ ऑटो में बैठकर अपने घर गोलमुरी आया और गाड़ी से सम्बंधित सभी कागज़ लाकर अपने ऑफिस में काम करने वाले संतोष राय के साथ उसकी गाड़ी में बैठकर गोलमुरी थाना पहुंचा। मेरे थाना पहुँचते ही मुझे ये जानकारी दी गयी कि आपकी गाड़ी नंबर से मिलती एक गाड़ी mango में पकड़ी गयी है। उस अधिकारी ने, जो मुझे FIR लिखा रहे थे, मुझे अपनी गाड़ी के पीछे आने को कहा और फिर वे mango के लिए निकल गए। मैं संतोष राय की गाड़ी के पीछे बैठा हुआ था और हमलोग उस अधिकारी को follow कर रहे थे। रात के 10.30 बज चुके थे और हमलोग mango पुल के पास पहुंचे वहां कोई गाड़ी नहीं पकड़ी गयी थी फिर हमलोग mango थाना पहुंचे वहां भी यही हाल था। फिर उस अधिकारी ने गोलमुरी थाना फ़ोन करके लोकेशन के बारे में पूछा और हमें बताया कि गाड़ी mango के चेपा पुल के पास पकड़ी गयी है। फिर हमलोग mango चेपा पुल के लिए निकल गए। इसी बीच मैं इश्वर से अपनी गाड़ी के बरामदगी के लिए दुआ कर रहा था। mango चेपा पुल पहुँचाने पर मैंने देखा कि एक गाड़ी रोक कर रखी हुई है मगर वो मेरी गाड़ी नहीं थी। उसका भी गाड़ी नंबर 0498 ही था मगर उसका रंग और series अलग था वो गाड़ी JH05T series की थी। रात के ११.30 बज चुके थे। हमलोग वापस आने लगे तो उस अधिकारी ने कहा कि आपलोग सीधे थाना जाएँ और FIR जरुर दर्ज कराएँ मैं अपने घर जा रहा हूँ। रात के करीब 12 बजे हम दोनों थाना पहुंचे तो वहां मैंने अपने पडोसी श्री बिपिन बिहारी राय के बड़े बेटे पंकज को वह पाया। थाना पहुँचने पर मुझे FIR लिखवाया गया और फिर हमलोग रात के करीब 12.30 बजे वापस अपने घर गोलमुरी आ गए।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

नक्सलवाद और हिन्दुस्तान

आतंक के साए में सांसे ले रहा हिन्दुस्तान आज त्रस्त है। हर तरफ आतंक और आतंक पसरा हुआ है। हर कोई आतंक के साये में सांसे ले रहा है। पहले तो हम दूसरे देशों से आये आतंकवादियों से संग्राम कर रहें थे, और आज हम अपने ही देश में पाले बढे यहाँ के विघटनकारी तत्वों अर्थात नक्सलवादिओं से लड़ भीड़ रहें हैं। दोनों और से हमारे ही लोग मर रहें हैं, और इसका खामियाजा पूरी तरह से हमें ही भुगतना पड़ रहा है।
कहीं सैनिक शहीद हो रहें हैं तो कहीं नक्सलवादी मर रहें हैं। एक भाई के हाथों दूसरा का खून तो हो ही रहा है। नक्सल को आन्दोलन का नाम देलेवालों को इस पर सोचना चाहिए। एक तरफ वो अपने आपको गरीबों के आन्दोलन का हिस्सा मानती है तो दूसरी तरफ उनके द्वारा इसी देश के लोगों की निर्मम हत्याएं की जाती हैं। एक तरफ वो सरकार को जमीं, शिक्षा और गरीबी में मुद्दे पर कटघरे में हमेशा ही खड़ा करती है तो दूसरी तरफ उनके द्वारा गावों कस्बों के विद्यालय भवनों को महज़ इसलिए नेस्तनाबूत कर दिया जाता है कि वहां उनके खात्मे के लिए सैनिकों को पानाह दिया जाता है। ये क्या है? एक विद्यालय जहाँ ना जाने कितने अशिक्षित लोग शिक्षित हो सकते है उसे बस एक धमाके में ध्वस्त कर देना कहाँ तक उचित है?

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

सानिया मिर्ज़ा और शोएब मल्लिक विवाद

सानिया और शोएब विवाद पर पिछले कई दिनों से जो हंगामा हो रहा है मुझे लगता है की वो बिलकुल ही ठीक नहीं है। मीडिया को इस तरह की खबरों को मुख्य खबर बनाकर पेश करने से बचना चाहिए। मैं व्यक्तिगत रूप से शोएब के मर्दानिगी पर दाद देना चाहूँगा जिसने ये जानते हुए भी कि हिन्दुस्तान में उसके साथ कुछ भी हो सकता है इसके बावजूद भी वो निडर होकर अकेला ही सानिया के पास चला आया। पाकिस्तान और हिंदुस्तान कि वाशिंदे शोएब के बारे में कुछ भी बोले मगर इसके इस साहसपूर्ण कार्य ने ना सिर्फ सानिया के दिल को बल्कि हर मोहब्बत करने वालों के दिल को जीत लिया है। एक पाकिस्तानी होकर वो भी हिन्दुस्तान में आकर अपने ऊपर लगे दागों को धोने और उस पर सफाई देने का जो साहस शोएब भाई ने किया है वो काबिले तारीफ है। मैं ये नहीं जनता कि शोएब कहाँ तक सच्चे हैं मगर सच तो येही है कि सच्चे लोग ही अपना सीना तान कर सबके सामने चलते है, जैसा कि शोएब भाई अभी तक करते आ रहें है। हमलोगों को सानिया और शोएब के शादी की ओर बड़ते पाक क़दमों को हिन्दुस्तान और पकिस्तान के बीच एक दोस्ताना रिश्ता मानना चाहिए और उनके इस कदम को अपना अपना समर्थन देना चाहिए.

सोमवार, 8 मार्च 2010

और मत तोड़ो इस देश को !

सिर्फ और सिर्फ सत्ता सुख को पाने की लालसा ने अखंड हिंदुस्तान को टुकड़ों में बांटकर पाकिस्तान और बांग्लादेश बना दिया और फिर उसके बाद शुरू हुए राजनीति की बिसात जिस पर बैठकर राजनेताओं ने इस टूटे फूटे हिन्दुस्तान को कभी संप्रदाय के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर तोडना शुरू कर दिया, सिर्फ और सिर्फ अपनी अपनी राजनीति की रोटी को सकने के लिए। हम कभी हिन्दू मुस्लिम के नाम पर तोड़े गए कभी हम ऊँची और नीची जातियों के नाम पर तोड़े गए और हद तो तब हो गयी जब भाषा के नाम पर हम तोड़े गए। हम हिंदुस्तान के नागरिक जाएँ तो कहाँ जाएँ। धर्म की diwaren बनाते बनाते हमने जाति की दीवार बना डाली। आज फिर से एक बार हम टूटने जा रहें हैं मगर इस बार धर्म और jati नहीं बल्कि लिंग है। तोड़ने की हर गुंजाईश को हमने पूरी कर दी है महिला आरक्षण बिल भी तो इसी का नमूना है। इस बार हमें लिंग के रूप में विभाजित किया जा रहा है और हम सभी इस विभाजन का हिस्सा बनाने जा रहें हैं। पता नहीं ये राजनीति इस देश को अंततः कहाँ ले जाकर दम लेगी।

रविवार, 31 जनवरी 2010

तुम्हारी याद

आज फिर से तुम्हारी यादों ने हमें बेजार कर दिया। मैंने एक बार फिर से अपने गुजरे जमाने 1994 से लेकर अब तक के बीच के पलों के दौरान घटित हुए सभी दृष्यों का एहसास किया। बहुत याद किया तुम्हे इतना याद किया कि इसे शब्दों में लिखने के लिए आज रविवार होते हुए भी कंप्यूटर पर आकर मैं बैठ गया।
...
तुम कहाँ हो, कैसी हो, क्या कर रही हो? कुछ भी मुझे मालूम नहीं, सिर्फ मुझे इतना पता है मेरे दिल से तुम्हारी मोहब्बत लुप्त होने का नाम ही नहीं ले रही है। मैं खुश हूँ कारण कि मैं इतना जानता हूँ कि तुम जहाँ भी होगी अपनी जिंदगी खुशहाल जी रही होगी। मेरी तो हालात ऐसी है कि मैं किसी से तुम्हारे बारे में पूछ भी नहीं सकता। मेरे दिल में अब तुम्हारे दीदार की ख्वाहिश भी नहीं, तुमसे बातें करने की अब कोई वजह भी नहीं। फिर भी ना जाने क्यूं तुम्हारी यादें मुझे इतना तडपती हैं। मैं बेचैन सा हूँ। मैं परेशान सा हूँ। किसी से अपने दिल की बातें बता भी नहीं पा रहा हूँ। इतना कुछ होने के बाद मैं यही समझ पाया हूँ कि मुझे शादी नहीं करनी चाहिए थी। मैं जिंदगी को दोहरी मानसिकता से जी रहा हूँ। मेरी पत्नी है, एक बेटा है दोनों के प्रति मेरा गहरा लगाव भी है। मैं जिंदगी की सारी खुशियाँ उन्हें देना चाहता भी हूँ मगर इस सब के बीच तुम्हारी यादों से भी घिरा रहता हूँ, ये भी एक कटु सत्य है।
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मेरा पहला प्यार ना जाने क्यूं अधूरा रहा गया? शायद कुछ मेरी नादानियां और शायद कुछ तुम्हारी मानसिकता इसकी जिम्मेवार थी। मैंने प्यार किया था तुमसे। प्यार को जिंदगी समझा था मैंने। अपनी औकात मैं भूल गया था। जिंदगी जीने के लिए सिर्फ प्यार ही काफी नहीं होता है, अपने पैरों पर खड़े होने के बाद ही प्यार को पाने की कोशिश करनी चाहिए। ये बात मैंने पहले से ही जान रखा था। यही कारण था कि तुमसे बेइंतहा मोहब्बत करने के बावजूद मैंने कभी तुम्हे इस बात की जानकारी नहीं दी। मैं पहले अपने पैर पर खड़ा होना चाहता था।
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29 नवम्बर 2000 याद है तुम्हे जब हम दोनों आशीर्वाद होटल, बिस्टुपुर में मिले थे। शायद तुम भूल गयी हो मगर मैं बिलकुल भी भूला क्यूंकि यही तो मेरी मोहब्बत से मेरी पहली और आखिरी व्यक्तिगत मुलाक़ात थी। इसी दिन तो तुमने मेरे भविष्य कि पटकथा लिख डाली थी। इसी दिन तो मेरा सबकुछ लूट गया था। मैं बर्बाद हो गया था।
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मैं तुम्हारा कोई दोष नहीं देता मेरी औकात ही नहीं थी कि तुम्हे मैं अपनी जिंदगी का हमसफ़र बनाता। मैं अपने परिवार वालों का भी कोई दोष नहीं देता उनके तरफ से तो बिलकुल ही ग्रीन सिग्नल था। इसका पूरा का पूरा जिम्मेवार main और मेरी किस्मत को है। पिछले 17 वर्षों से तुम्हारी यादों के साये में जी रहा हूँ। ये पूरी जिंदगी भी कम पड़ेगी तुम्हे भूलने को।
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इतना कुछ होने के बाद भी आज तक तुम मुझे समझ नहीं सकी इसका मुझे अफ़सोस है।
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जमशेदपुर के एस पी नवीन कुमार को हार्दिक बधाई ..

विगत कई दिनों से आतंक के साए में जी रहे जमशेदपुरवासिओं के लिए 27 जनवरी का दिन सुखद रहा। यहाँ के एस.पी श्री नवीन कुमार ने अपने कार्य शैली के कारण पिछले दिनों हुए सभी आपराधिक घटनायों पर से पर्दा उठा दिया और जमशेदपुर जैसे शांत शहर में अपराध की दुनिया में कदम रखने वाले नए आपराधिक गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए लगभग सारे अपराधियों को पकड़ लिया, इसके लिए वे वाकई बधाई के पात्र हैं। जमशेदपुर के सभी वासिओं की तरफ से उन्हें हार्दिक बधाई।

पिछले कई आपराधिक घटनाओं में लिप्त अपराधियों के नामों पर गौर करने से ये दुखद पहलू सामने आ रहा है कि कोई ना कोई अपराधी किसी ना किसी पुलिस अधिकारी का रिश्तेदार निकलता है और तो और जमशेदपुर के मोस्ट वांटेड अपराधी के मामले में तो ये बात भी सामने आई है कि उसकी जमानत तक किसी पुलिस अधिकारी ने ही ले रखी है। ये वाक्य सचमुच में गंभीर है। श्री नवीन कुमार जी को इस पर जरुर से जरुर ध्यान देना चाहिए।

एक बार फिर से मैं व्यक्तिगत रूप से एस.पी श्री नवीन कुमार को उनकी इस कार्यकुशलता और दक्षता के कारण धन्यवाद देता हूँ और आशा करता हूँ कि कांड का खुलासा करने के साथ - साथ दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलवाने में भी वे इसी तरह का प्रयास करेंगे.

शनिवार, 16 जनवरी 2010

जमशेदपुर का नया सवेरा

आज सुबह मैं काफी देर से उठा कारण शनिवार होने के कारण आज ऑफिस बंद थी। मेरी पत्नी हर दिन की तरह ही आज का अखबार लेकर आई, मैं हर दिन की तरह ये सोचकर कि फिर फ्रंट पेज पर कोई कत्ले आम या फिर किसी पर जानलेवा हमले की खबर छपी होगी। इसी अनिष्ट की आशंका से मैंने आज अखबार को लेकर फ्रंट पेज के बदले अन्दर के पृष्ठों को पढ़ना आरम्भ किया। तक़रीबन ३० ४० मिनट के बाद हिम्मत करके फ्रंट पेज को अपने नज़र के सामने किया तो मेरी नज़र बन्ना के "मिशन कचड़ा" से बवाल पर जाकर टिक गयी। हालाँकि नेताओं के समाचारों से मैं नज़र चुराता फिरता हूँ किन्तु इस समाचार का हेडिंग और इसमें दिए गए तस्वीर ने मुझे इसे पढने को बाध्य कराने दिया।
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इसे पढ़कर व्यक्तिगत रूप मुझे ये एहसास हुआ कि यदि नगरपालिका के कर्मचारी अपने अपने काम समय रहते करें तो जमशेदपुर में जो गंदगी का अम्बार जहाँ तहां फैला है वो नहीं रहेगा। आज जमशेदपुर में टिस्को एरिया को छोड़ दें तो जुगसलाई, मानगो आदि इलाको की स्थिति बदतर से बदतर है सिर्फ नगरपालिका के गैर जिमेदाराना रवैये के कारण। एक MLA का इस समस्या को दूर करने के प्रति समर्पित होना और खुद गन्दगी को उठाकर फेंकना जमशेदपुर के आने वाले नए सवेरा को प्रदर्शित करता है। बन्ना गुप्ता पहले से भी सामाजिक समस्याओं के प्रति अपनी कार्यशैली से आम जन में अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए हैं लेकिन MLA होने के बाबजूद इस तरह की समस्याओं के प्रति जागरूक होकर कार्य करना वास्तव में एक प्रशंसनीय कदम है। लगभग एकाध महीने ही हुए हैं और बन्ना गुप्ता जिस तरह से सामाजिक समस्याओं के प्रति गंभीरता दिखा रहें हैं उससे तो येही लगता है कि वे दूसरे नेताओं की तरह नहीं जो वोट लेकर MLA या MP बनाने के बाद बदल जाएँ। जमशेदपुर से नितीश भरद्वाज जैसे कई MP और MLA हुए जिसे यहाँ की जनता ने कई उम्मीदों के साथ अपना वोट देकर जीताया लेकिन जीतने के बाद तो उनका दर्शन तक जमशेदपुर की जनता को नसीब तक नहीं हुआ।
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आज maango की जो स्थिति है वही जुगसलाई की भी है। पता नहीं नगरपालिका के अधिकारी अपनी आँख बंद किये क्यूं हैं। आज गाँधी जी के उपदेशों से समाज सुधार की कोई गुंजाईश नहीं है आज जरुरत है जैसे को तैसा की। जो एक MLA ने maango में किया आज की परिस्थिति में वोही ठीक और वाजिब है। अगर नगरपालिका के कर्मचारी इतने सारे जन आन्दोलन के बावजूद गन्दगी नहीं उठा रहे तो उस गंदगी को नगरपालिका के कार्यालय के सामने फेकना बिलकुल उचित है। उन्हें ये समझ में आने की जरुरत है की अब कामचोर बनकर काम नहीं चलेगा। कम से कम अपना काम तो करना ही पड़ेगा। अगर गुप्ता जी की राह पर एक दो और MLA और MP आ जाये जो वो दिन दूर नहीं जब जमशेदपुर के सारे इलाके साफ़ सुथरे रूप में दिखलाई देंगे।
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आज जमशेदपुर अनेक समस्याओं से घिरा पड़ा है, हर तरफ अपराधियों का बोलबाला है, जमशेदपुर के लोग हर वक़्त किसी आशंका से पीड़ित रहतें है, पता नहीं कब कहाँ कैसे कुछ हो जाए। पुलिस प्रशासन के ऊपर से विश्वास बिलकुल ही उठ चूका है। प्रशासन बिलकुल ही नाकाम हो चुकी है। सामान्य पुलिस से लेकर यातायात पुलिस हर किसी की कार्यप्रणाली चौपट हो चुकी है। उनमें उच्च अधिकारियों का भय बिलकुल ही समाप्त हो चूका है। हर कोई अपने तरीकों से चल रहा hai। ऐसे में एक MLA की इस तरह की कार्यप्रणाली जमशेदपुर में एक आने वाले एक स्वर्णिम काल को दर्शा रही है। हम आशा करतें हैं कि ना सिर्फ वे अपने क्षेत्र के समस्याओं के प्रति बल्कि पूरे जमशेदपुर की समस्याओं के प्रति इसी तरह से गंभीरता दिखाएँ। उनके इस तरह के प्रत्येक आन्दोलन में समस्त जमशेदपुर के लोगों का मानसिक और शारीरिक समर्थंक मिलता रहेगा।
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शनिवार, 9 जनवरी 2010

जमशेदपुर में अपराधी बेखौफ

पिछले दिनों जमशेदपुर पूरी तरह से अस्त व्यस्त रहा। अपराधी पूरी तरह से बेखौफ होकर अपना काम करते रहे। प्रशासन इनके आगे बेबस - असहाय नज़र आ रहा है। मुखबिरी पर पकड़ नहीं होने के कारण ही ये स्थिति बनती जा रही है। मेरा निम्नलिखित सुझाव हैं जिससे मुझे लगता है कि अमल में लाने पर जमशेदपुर में आपराधिक गतिविधियाँ जरुर से जरुर कम होंगी :

  1. लगभग सभी चाक चौराहों पर वाहनों की चेकिंग सही तरीके से होनी चाहिए। ज्यादातर चेकिंग सिर्फ पैसे उगाहने के लिए की जाती हैं, जिस पर अंकुश तभी लग सकता है, जब उच्च अधिकारी स्वयं इसका निरीक्षण करें।
  2. सभी थानों में कंप्यूटर और हाई स्पीड इन्टरनेट कनेक्शन होने चाहिए और सभी थाने एक-दुसरे से इंट्रानेट से जुड़े होने चाहिए।
  3. थानों के सभी प्रकार के रिकॉर्ड कंप्यूटर में होने चाहिए।
  4. वक्त वक्त पर थानों की निगरानी उच्च अधिकारिओं द्वारा स्वयं करनी चाहिए।
  5. वर्तमान में यातायात पुलिस भ्रस्ताचार की सभी सीमायों के पार जा रहा है, इस पर नियंत्रण करने की अति शीघ्र जरुरत है। उच्च अधिकारिओं को यातायात पुलिस के जवानों को अनुशासन का पाठ पठाने की जरुरत है ताकि वे अपनी पाकेट भरने का काम छोड़कर यातायात सँभालने का काम कर सके।
  6. एक नए सिरे से मुखबिर बनाने की और ध्यान देना चाहिए और मुखबिरी करने वालों के भी केरेक्टर का सत्यापन जरुर करना चाहिए।

शनिवार, 2 जनवरी 2010

जीने की तमन्ना

ना हो जमीं और ना ऐ सितारें हो
ना साथ मेरे ऐ महकती बहारें हो
रिश्ते नातों के इस जहाँ में
अब ना कोई अपना है
मगर फिर भी साथ लेकर तेरी यादों का जीने की तमन्ना है !!१!!

आएगी नव वर्ष
साथ खुशियों की बहारें लेकर
मगर हम तो तनहा ही रहेंगे
साथ तन्हाई का लेकर
डरता हूँ फिर से कहीं
फासले ना बढते रहे हम दोनों के दरमयान
टूटकर बिखरते ना रहे कहीं
मेरे दिल के मचलते हुए अरमान
कल को झूमेगा सारा जहाँ
नए साल के नगमों में
हम तो मगर खोये ही रहेंगे
बीते कल के सदमों में
फखत दामन में मेरे दिल के
टुटा हुआ सपना है
मगर फिर भी साथ लेकर तेरी यादों का जीने की तमन्ना है !!२!!

परमार्थ सुमन
25 दिसम्बर 1998
लाल बिल्डिंग हाउस
11:30 PM