आतंक के साए में सांसे ले रहा हिन्दुस्तान आज त्रस्त है। हर तरफ आतंक और आतंक पसरा हुआ है। हर कोई आतंक के साये में सांसे ले रहा है। पहले तो हम दूसरे देशों से आये आतंकवादियों से संग्राम कर रहें थे, और आज हम अपने ही देश में पाले बढे यहाँ के विघटनकारी तत्वों अर्थात नक्सलवादिओं से लड़ भीड़ रहें हैं। दोनों और से हमारे ही लोग मर रहें हैं, और इसका खामियाजा पूरी तरह से हमें ही भुगतना पड़ रहा है।
कहीं सैनिक शहीद हो रहें हैं तो कहीं नक्सलवादी मर रहें हैं। एक भाई के हाथों दूसरा का खून तो हो ही रहा है। नक्सल को आन्दोलन का नाम देलेवालों को इस पर सोचना चाहिए। एक तरफ वो अपने आपको गरीबों के आन्दोलन का हिस्सा मानती है तो दूसरी तरफ उनके द्वारा इसी देश के लोगों की निर्मम हत्याएं की जाती हैं। एक तरफ वो सरकार को जमीं, शिक्षा और गरीबी में मुद्दे पर कटघरे में हमेशा ही खड़ा करती है तो दूसरी तरफ उनके द्वारा गावों कस्बों के विद्यालय भवनों को महज़ इसलिए नेस्तनाबूत कर दिया जाता है कि वहां उनके खात्मे के लिए सैनिकों को पानाह दिया जाता है। ये क्या है? एक विद्यालय जहाँ ना जाने कितने अशिक्षित लोग शिक्षित हो सकते है उसे बस एक धमाके में ध्वस्त कर देना कहाँ तक उचित है?
We are all INDIAN before a Hindu, Muslim, Sikh aur Isai or a Bihari, Marathi, Bengali etc. Love to all human being........
मंगलवार, 13 अप्रैल 2010
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
सानिया मिर्ज़ा और शोएब मल्लिक विवाद
सानिया और शोएब विवाद पर पिछले कई दिनों से जो हंगामा हो रहा है मुझे लगता है की वो बिलकुल ही ठीक नहीं है। मीडिया को इस तरह की खबरों को मुख्य खबर बनाकर पेश करने से बचना चाहिए। मैं व्यक्तिगत रूप से शोएब के मर्दानिगी पर दाद देना चाहूँगा जिसने ये जानते हुए भी कि हिन्दुस्तान में उसके साथ कुछ भी हो सकता है इसके बावजूद भी वो निडर होकर अकेला ही सानिया के पास चला आया। पाकिस्तान और हिंदुस्तान कि वाशिंदे शोएब के बारे में कुछ भी बोले मगर इसके इस साहसपूर्ण कार्य ने ना सिर्फ सानिया के दिल को बल्कि हर मोहब्बत करने वालों के दिल को जीत लिया है। एक पाकिस्तानी होकर वो भी हिन्दुस्तान में आकर अपने ऊपर लगे दागों को धोने और उस पर सफाई देने का जो साहस शोएब भाई ने किया है वो काबिले तारीफ है। मैं ये नहीं जनता कि शोएब कहाँ तक सच्चे हैं मगर सच तो येही है कि सच्चे लोग ही अपना सीना तान कर सबके सामने चलते है, जैसा कि शोएब भाई अभी तक करते आ रहें है। हमलोगों को सानिया और शोएब के शादी की ओर बड़ते पाक क़दमों को हिन्दुस्तान और पकिस्तान के बीच एक दोस्ताना रिश्ता मानना चाहिए और उनके इस कदम को अपना अपना समर्थन देना चाहिए.
सोमवार, 8 मार्च 2010
और मत तोड़ो इस देश को !
सिर्फ और सिर्फ सत्ता सुख को पाने की लालसा ने अखंड हिंदुस्तान को टुकड़ों में बांटकर पाकिस्तान और बांग्लादेश बना दिया और फिर उसके बाद शुरू हुए राजनीति की बिसात जिस पर बैठकर राजनेताओं ने इस टूटे फूटे हिन्दुस्तान को कभी संप्रदाय के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर तोडना शुरू कर दिया, सिर्फ और सिर्फ अपनी अपनी राजनीति की रोटी को सकने के लिए। हम कभी हिन्दू मुस्लिम के नाम पर तोड़े गए कभी हम ऊँची और नीची जातियों के नाम पर तोड़े गए और हद तो तब हो गयी जब भाषा के नाम पर हम तोड़े गए। हम हिंदुस्तान के नागरिक जाएँ तो कहाँ जाएँ। धर्म की diwaren बनाते बनाते हमने जाति की दीवार बना डाली। आज फिर से एक बार हम टूटने जा रहें हैं मगर इस बार धर्म और jati नहीं बल्कि लिंग है। तोड़ने की हर गुंजाईश को हमने पूरी कर दी है महिला आरक्षण बिल भी तो इसी का नमूना है। इस बार हमें लिंग के रूप में विभाजित किया जा रहा है और हम सभी इस विभाजन का हिस्सा बनाने जा रहें हैं। पता नहीं ये राजनीति इस देश को अंततः कहाँ ले जाकर दम लेगी।
रविवार, 31 जनवरी 2010
तुम्हारी याद
आज फिर से तुम्हारी यादों ने हमें बेजार कर दिया। मैंने एक बार फिर से अपने गुजरे जमाने 1994 से लेकर अब तक के बीच के पलों के दौरान घटित हुए सभी दृष्यों का एहसास किया। बहुत याद किया तुम्हे इतना याद किया कि इसे शब्दों में लिखने के लिए आज रविवार होते हुए भी कंप्यूटर पर आकर मैं बैठ गया।
...
तुम कहाँ हो, कैसी हो, क्या कर रही हो? कुछ भी मुझे मालूम नहीं, सिर्फ मुझे इतना पता है मेरे दिल से तुम्हारी मोहब्बत लुप्त होने का नाम ही नहीं ले रही है। मैं खुश हूँ कारण कि मैं इतना जानता हूँ कि तुम जहाँ भी होगी अपनी जिंदगी खुशहाल जी रही होगी। मेरी तो हालात ऐसी है कि मैं किसी से तुम्हारे बारे में पूछ भी नहीं सकता। मेरे दिल में अब तुम्हारे दीदार की ख्वाहिश भी नहीं, तुमसे बातें करने की अब कोई वजह भी नहीं। फिर भी ना जाने क्यूं तुम्हारी यादें मुझे इतना तडपती हैं। मैं बेचैन सा हूँ। मैं परेशान सा हूँ। किसी से अपने दिल की बातें बता भी नहीं पा रहा हूँ। इतना कुछ होने के बाद मैं यही समझ पाया हूँ कि मुझे शादी नहीं करनी चाहिए थी। मैं जिंदगी को दोहरी मानसिकता से जी रहा हूँ। मेरी पत्नी है, एक बेटा है दोनों के प्रति मेरा गहरा लगाव भी है। मैं जिंदगी की सारी खुशियाँ उन्हें देना चाहता भी हूँ मगर इस सब के बीच तुम्हारी यादों से भी घिरा रहता हूँ, ये भी एक कटु सत्य है।
....
मेरा पहला प्यार ना जाने क्यूं अधूरा रहा गया? शायद कुछ मेरी नादानियां और शायद कुछ तुम्हारी मानसिकता इसकी जिम्मेवार थी। मैंने प्यार किया था तुमसे। प्यार को जिंदगी समझा था मैंने। अपनी औकात मैं भूल गया था। जिंदगी जीने के लिए सिर्फ प्यार ही काफी नहीं होता है, अपने पैरों पर खड़े होने के बाद ही प्यार को पाने की कोशिश करनी चाहिए। ये बात मैंने पहले से ही जान रखा था। यही कारण था कि तुमसे बेइंतहा मोहब्बत करने के बावजूद मैंने कभी तुम्हे इस बात की जानकारी नहीं दी। मैं पहले अपने पैर पर खड़ा होना चाहता था।
....
29 नवम्बर 2000 याद है तुम्हे जब हम दोनों आशीर्वाद होटल, बिस्टुपुर में मिले थे। शायद तुम भूल गयी हो मगर मैं बिलकुल भी भूला क्यूंकि यही तो मेरी मोहब्बत से मेरी पहली और आखिरी व्यक्तिगत मुलाक़ात थी। इसी दिन तो तुमने मेरे भविष्य कि पटकथा लिख डाली थी। इसी दिन तो मेरा सबकुछ लूट गया था। मैं बर्बाद हो गया था।
...
मैं तुम्हारा कोई दोष नहीं देता मेरी औकात ही नहीं थी कि तुम्हे मैं अपनी जिंदगी का हमसफ़र बनाता। मैं अपने परिवार वालों का भी कोई दोष नहीं देता उनके तरफ से तो बिलकुल ही ग्रीन सिग्नल था। इसका पूरा का पूरा जिम्मेवार main और मेरी किस्मत को है। पिछले 17 वर्षों से तुम्हारी यादों के साये में जी रहा हूँ। ये पूरी जिंदगी भी कम पड़ेगी तुम्हे भूलने को।
...
इतना कुछ होने के बाद भी आज तक तुम मुझे समझ नहीं सकी इसका मुझे अफ़सोस है।
...
जमशेदपुर के एस पी नवीन कुमार को हार्दिक बधाई ..
विगत कई दिनों से आतंक के साए में जी रहे जमशेदपुरवासिओं के लिए 27 जनवरी का दिन सुखद रहा। यहाँ के एस.पी श्री नवीन कुमार ने अपने कार्य शैली के कारण पिछले दिनों हुए सभी आपराधिक घटनायों पर से पर्दा उठा दिया और जमशेदपुर जैसे शांत शहर में अपराध की दुनिया में कदम रखने वाले नए आपराधिक गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए लगभग सारे अपराधियों को पकड़ लिया, इसके लिए वे वाकई बधाई के पात्र हैं। जमशेदपुर के सभी वासिओं की तरफ से उन्हें हार्दिक बधाई।
पिछले कई आपराधिक घटनाओं में लिप्त अपराधियों के नामों पर गौर करने से ये दुखद पहलू सामने आ रहा है कि कोई ना कोई अपराधी किसी ना किसी पुलिस अधिकारी का रिश्तेदार निकलता है और तो और जमशेदपुर के मोस्ट वांटेड अपराधी के मामले में तो ये बात भी सामने आई है कि उसकी जमानत तक किसी पुलिस अधिकारी ने ही ले रखी है। ये वाक्य सचमुच में गंभीर है। श्री नवीन कुमार जी को इस पर जरुर से जरुर ध्यान देना चाहिए।
एक बार फिर से मैं व्यक्तिगत रूप से एस.पी श्री नवीन कुमार को उनकी इस कार्यकुशलता और दक्षता के कारण धन्यवाद देता हूँ और आशा करता हूँ कि कांड का खुलासा करने के साथ - साथ दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलवाने में भी वे इसी तरह का प्रयास करेंगे.
शनिवार, 16 जनवरी 2010
जमशेदपुर का नया सवेरा
आज सुबह मैं काफी देर से उठा कारण शनिवार होने के कारण आज ऑफिस बंद थी। मेरी पत्नी हर दिन की तरह ही आज का अखबार लेकर आई, मैं हर दिन की तरह ये सोचकर कि फिर फ्रंट पेज पर कोई कत्ले आम या फिर किसी पर जानलेवा हमले की खबर छपी होगी। इसी अनिष्ट की आशंका से मैंने आज अखबार को लेकर फ्रंट पेज के बदले अन्दर के पृष्ठों को पढ़ना आरम्भ किया। तक़रीबन ३० ४० मिनट के बाद हिम्मत करके फ्रंट पेज को अपने नज़र के सामने किया तो मेरी नज़र बन्ना के "मिशन कचड़ा" से बवाल पर जाकर टिक गयी। हालाँकि नेताओं के समाचारों से मैं नज़र चुराता फिरता हूँ किन्तु इस समाचार का हेडिंग और इसमें दिए गए तस्वीर ने मुझे इसे पढने को बाध्य कराने दिया।
..
इसे पढ़कर व्यक्तिगत रूप मुझे ये एहसास हुआ कि यदि नगरपालिका के कर्मचारी अपने अपने काम समय रहते करें तो जमशेदपुर में जो गंदगी का अम्बार जहाँ तहां फैला है वो नहीं रहेगा। आज जमशेदपुर में टिस्को एरिया को छोड़ दें तो जुगसलाई, मानगो आदि इलाको की स्थिति बदतर से बदतर है सिर्फ नगरपालिका के गैर जिमेदाराना रवैये के कारण। एक MLA का इस समस्या को दूर करने के प्रति समर्पित होना और खुद गन्दगी को उठाकर फेंकना जमशेदपुर के आने वाले नए सवेरा को प्रदर्शित करता है। बन्ना गुप्ता पहले से भी सामाजिक समस्याओं के प्रति अपनी कार्यशैली से आम जन में अपनी छाप छोड़ने में सफल हुए हैं लेकिन MLA होने के बाबजूद इस तरह की समस्याओं के प्रति जागरूक होकर कार्य करना वास्तव में एक प्रशंसनीय कदम है। लगभग एकाध महीने ही हुए हैं और बन्ना गुप्ता जिस तरह से सामाजिक समस्याओं के प्रति गंभीरता दिखा रहें हैं उससे तो येही लगता है कि वे दूसरे नेताओं की तरह नहीं जो वोट लेकर MLA या MP बनाने के बाद बदल जाएँ। जमशेदपुर से नितीश भरद्वाज जैसे कई MP और MLA हुए जिसे यहाँ की जनता ने कई उम्मीदों के साथ अपना वोट देकर जीताया लेकिन जीतने के बाद तो उनका दर्शन तक जमशेदपुर की जनता को नसीब तक नहीं हुआ।
...
आज maango की जो स्थिति है वही जुगसलाई की भी है। पता नहीं नगरपालिका के अधिकारी अपनी आँख बंद किये क्यूं हैं। आज गाँधी जी के उपदेशों से समाज सुधार की कोई गुंजाईश नहीं है आज जरुरत है जैसे को तैसा की। जो एक MLA ने maango में किया आज की परिस्थिति में वोही ठीक और वाजिब है। अगर नगरपालिका के कर्मचारी इतने सारे जन आन्दोलन के बावजूद गन्दगी नहीं उठा रहे तो उस गंदगी को नगरपालिका के कार्यालय के सामने फेकना बिलकुल उचित है। उन्हें ये समझ में आने की जरुरत है की अब कामचोर बनकर काम नहीं चलेगा। कम से कम अपना काम तो करना ही पड़ेगा। अगर गुप्ता जी की राह पर एक दो और MLA और MP आ जाये जो वो दिन दूर नहीं जब जमशेदपुर के सारे इलाके साफ़ सुथरे रूप में दिखलाई देंगे।
...
आज जमशेदपुर अनेक समस्याओं से घिरा पड़ा है, हर तरफ अपराधियों का बोलबाला है, जमशेदपुर के लोग हर वक़्त किसी आशंका से पीड़ित रहतें है, पता नहीं कब कहाँ कैसे कुछ हो जाए। पुलिस प्रशासन के ऊपर से विश्वास बिलकुल ही उठ चूका है। प्रशासन बिलकुल ही नाकाम हो चुकी है। सामान्य पुलिस से लेकर यातायात पुलिस हर किसी की कार्यप्रणाली चौपट हो चुकी है। उनमें उच्च अधिकारियों का भय बिलकुल ही समाप्त हो चूका है। हर कोई अपने तरीकों से चल रहा hai। ऐसे में एक MLA की इस तरह की कार्यप्रणाली जमशेदपुर में एक आने वाले एक स्वर्णिम काल को दर्शा रही है। हम आशा करतें हैं कि ना सिर्फ वे अपने क्षेत्र के समस्याओं के प्रति बल्कि पूरे जमशेदपुर की समस्याओं के प्रति इसी तरह से गंभीरता दिखाएँ। उनके इस तरह के प्रत्येक आन्दोलन में समस्त जमशेदपुर के लोगों का मानसिक और शारीरिक समर्थंक मिलता रहेगा।
..........................................................
शनिवार, 9 जनवरी 2010
जमशेदपुर में अपराधी बेखौफ
पिछले दिनों जमशेदपुर पूरी तरह से अस्त व्यस्त रहा। अपराधी पूरी तरह से बेखौफ होकर अपना काम करते रहे। प्रशासन इनके आगे बेबस - असहाय नज़र आ रहा है। मुखबिरी पर पकड़ नहीं होने के कारण ही ये स्थिति बनती जा रही है। मेरा निम्नलिखित सुझाव हैं जिससे मुझे लगता है कि अमल में लाने पर जमशेदपुर में आपराधिक गतिविधियाँ जरुर से जरुर कम होंगी :
- लगभग सभी चाक चौराहों पर वाहनों की चेकिंग सही तरीके से होनी चाहिए। ज्यादातर चेकिंग सिर्फ पैसे उगाहने के लिए की जाती हैं, जिस पर अंकुश तभी लग सकता है, जब उच्च अधिकारी स्वयं इसका निरीक्षण करें।
- सभी थानों में कंप्यूटर और हाई स्पीड इन्टरनेट कनेक्शन होने चाहिए और सभी थाने एक-दुसरे से इंट्रानेट से जुड़े होने चाहिए।
- थानों के सभी प्रकार के रिकॉर्ड कंप्यूटर में होने चाहिए।
- वक्त वक्त पर थानों की निगरानी उच्च अधिकारिओं द्वारा स्वयं करनी चाहिए।
- वर्तमान में यातायात पुलिस भ्रस्ताचार की सभी सीमायों के पार जा रहा है, इस पर नियंत्रण करने की अति शीघ्र जरुरत है। उच्च अधिकारिओं को यातायात पुलिस के जवानों को अनुशासन का पाठ पठाने की जरुरत है ताकि वे अपनी पाकेट भरने का काम छोड़कर यातायात सँभालने का काम कर सके।
- एक नए सिरे से मुखबिर बनाने की और ध्यान देना चाहिए और मुखबिरी करने वालों के भी केरेक्टर का सत्यापन जरुर करना चाहिए।
शनिवार, 2 जनवरी 2010
जीने की तमन्ना
ना हो जमीं और ना ऐ सितारें हो
ना साथ मेरे ऐ महकती बहारें हो
रिश्ते नातों के इस जहाँ में
अब ना कोई अपना है
मगर फिर भी साथ लेकर तेरी यादों का जीने की तमन्ना है !!१!!
आएगी नव वर्ष
साथ खुशियों की बहारें लेकर
मगर हम तो तनहा ही रहेंगे
साथ तन्हाई का लेकर
डरता हूँ फिर से कहीं
फासले ना बढते रहे हम दोनों के दरमयान
टूटकर बिखरते ना रहे कहीं
मेरे दिल के मचलते हुए अरमान
कल को झूमेगा सारा जहाँ
नए साल के नगमों में
हम तो मगर खोये ही रहेंगे
बीते कल के सदमों में
फखत दामन में मेरे दिल के
टुटा हुआ सपना है
मगर फिर भी साथ लेकर तेरी यादों का जीने की तमन्ना है !!२!!
परमार्थ सुमन
25 दिसम्बर 1998
लाल बिल्डिंग हाउस
11:30 PM
ना साथ मेरे ऐ महकती बहारें हो
रिश्ते नातों के इस जहाँ में
अब ना कोई अपना है
मगर फिर भी साथ लेकर तेरी यादों का जीने की तमन्ना है !!१!!
आएगी नव वर्ष
साथ खुशियों की बहारें लेकर
मगर हम तो तनहा ही रहेंगे
साथ तन्हाई का लेकर
डरता हूँ फिर से कहीं
फासले ना बढते रहे हम दोनों के दरमयान
टूटकर बिखरते ना रहे कहीं
मेरे दिल के मचलते हुए अरमान
कल को झूमेगा सारा जहाँ
नए साल के नगमों में
हम तो मगर खोये ही रहेंगे
बीते कल के सदमों में
फखत दामन में मेरे दिल के
टुटा हुआ सपना है
मगर फिर भी साथ लेकर तेरी यादों का जीने की तमन्ना है !!२!!
परमार्थ सुमन
25 दिसम्बर 1998
लाल बिल्डिंग हाउस
11:30 PM
तुम्हारी यादें
मैं कैसे भूल जाऊ उसे
दिए जिसने गम
किये जिसने सितम
हर बार दिल पर उठाये हमने ये गम
जिनसे जुदा होकर आँखें हुई थी नम
मैं कैसे भूल जाऊ उसे
दिए जिसने गम, किये जिसने सितम !!१!!
नहीं कह सकता मगर मैं उसको बेरहम
आज भी है वो क्यूंकि दिल के आईने में हरदम
मैं कैसे भूल जाऊ उसे
दिए जिसने गम, किये जिसने सितम !!2!!
हरपाल तड़पता रहता हूँ जिसके बिना मैं सुमन
उसको भूलने को अब पूरी जिन्दगी भी पड़ेगी कम
मैं कैसे भूल जाऊ उसे
दिए जिसने गम, किये जिसने सितम !!3!!
परमार्थ सुमन
5 अक्टूबर, 2000
IOCL बरौनी
8 PM
दिए जिसने गम
किये जिसने सितम
हर बार दिल पर उठाये हमने ये गम
जिनसे जुदा होकर आँखें हुई थी नम
मैं कैसे भूल जाऊ उसे
दिए जिसने गम, किये जिसने सितम !!१!!
नहीं कह सकता मगर मैं उसको बेरहम
आज भी है वो क्यूंकि दिल के आईने में हरदम
मैं कैसे भूल जाऊ उसे
दिए जिसने गम, किये जिसने सितम !!2!!
हरपाल तड़पता रहता हूँ जिसके बिना मैं सुमन
उसको भूलने को अब पूरी जिन्दगी भी पड़ेगी कम
मैं कैसे भूल जाऊ उसे
दिए जिसने गम, किये जिसने सितम !!3!!
परमार्थ सुमन
5 अक्टूबर, 2000
IOCL बरौनी
8 PM
तुम्हारी जुदाई और मेरा ख्वाब
गमगीन था वो पल मायूस था वो लम्हा
जब उनसे बिछड़ने का झेला था हमने सदमा
अश्क बह ही रहे थे ये सोचकर
कि वो जा रही है
जिनसे है रौशन मेरी ये जिन्दगी
वो ही जा रही है
कुछ पल तक यूँ ही रोते रहे हम
दर्द दिल का खामोश सहते रहे हम
पल भर में वो हमसे छूटने को थे
दिल के खून निगाहों से बहने को थे
तभी किसी ने देकर आवाज़ मुझको संभाला
ये तो वो ही सख्श था जिसने हमें रुलाया
पास खड़ी थी वो खामोश नजरें झुकाए
मैं देखता रहा उसे बिना अपनी पलकें गिराए
याद जो आई फिर मुझे जुदाई की बातें
बेचैन हो गयी फिर मेरे दिल की सांसें
मेरी बेचैनी को देख वो कहने लगी
माना तेरे दिल को ठोकर मैंने ही दी
मगर क्या तू मोहब्बत आज भी करता है मुझसे
कहा मैंने पूछ लो तुम मेरी नजर से
तभी उसने कहा ऐ "सुमन"
कहते हो मुझसे प्यार करते हो तुम
फिर कैसी है ऐ जुदाई और कैसा है ऐ अलाप
मेरे जाने से तू क्यूं होता है उदास
सच्ची है गर तेरी मोहब्बत तो जुदाई कैसी
जो मिल गयी आत्मा तो दीवारें कैसी
करार जो पाना हो दिल का
पलकें बंद कर लेना सुमन
नज़र आउंगी तुझको हर पल
तेरे दामन के साथ हमदम
अपनी नादानी पे हंसकर मैंने उसे WISH करना चाहा
मगर वो तो दूर जा चुकी थी बहुत दूर - बहुत दूर
मगर आज भी जब कभी मैं निगाहें बंद करता हूँ
अपने दिल की हर धड़कन में बस उसे महसूस करता हूँ
कैसी है ऐ मेरी मोहब्बत
मैं किस-किस को बताउं
पागल हो चूका हूँ मगर
पागलपन मैं कैसे छुपाऊं
करीब रहकर इतने जब समझ ना सके
वो मेरे दिल के जज्बात को
क्या ख़ाक समझेगी वो भला
इतने दूर रहकर मेरे हालात को
बस इतनी सी है सदा मेरे इस दिल की
वो फूल बनी रहे मेरे निगाहों के झील की
जब कभी मुझपर तन्हाई का बादल छाए
हर उस पल वो ख्वाब बनकर मेरी नजर में आये
ना कोई तमन्ना है ना कोई अब सपना है
लगता है जैसे मिलकर कोई बिछड़ गया अपना है
सदियों से जिसकी मेरे दिल को तलाश थी
मेरी पहली मोहब्बत की जो पहली एहसास थी
जुदा हो गया उनसे ही आज मैं
जिसके बिना मेरी जिन्दगी बिलकुल निराश थी।
परमार्थ सुमन
19 मई, 1998
लाल बिल्डिंग हाउस
11 PM
जब उनसे बिछड़ने का झेला था हमने सदमा
अश्क बह ही रहे थे ये सोचकर
कि वो जा रही है
जिनसे है रौशन मेरी ये जिन्दगी
वो ही जा रही है
कुछ पल तक यूँ ही रोते रहे हम
दर्द दिल का खामोश सहते रहे हम
पल भर में वो हमसे छूटने को थे
दिल के खून निगाहों से बहने को थे
तभी किसी ने देकर आवाज़ मुझको संभाला
ये तो वो ही सख्श था जिसने हमें रुलाया
पास खड़ी थी वो खामोश नजरें झुकाए
मैं देखता रहा उसे बिना अपनी पलकें गिराए
याद जो आई फिर मुझे जुदाई की बातें
बेचैन हो गयी फिर मेरे दिल की सांसें
मेरी बेचैनी को देख वो कहने लगी
माना तेरे दिल को ठोकर मैंने ही दी
मगर क्या तू मोहब्बत आज भी करता है मुझसे
कहा मैंने पूछ लो तुम मेरी नजर से
तभी उसने कहा ऐ "सुमन"
कहते हो मुझसे प्यार करते हो तुम
फिर कैसी है ऐ जुदाई और कैसा है ऐ अलाप
मेरे जाने से तू क्यूं होता है उदास
सच्ची है गर तेरी मोहब्बत तो जुदाई कैसी
जो मिल गयी आत्मा तो दीवारें कैसी
करार जो पाना हो दिल का
पलकें बंद कर लेना सुमन
नज़र आउंगी तुझको हर पल
तेरे दामन के साथ हमदम
अपनी नादानी पे हंसकर मैंने उसे WISH करना चाहा
मगर वो तो दूर जा चुकी थी बहुत दूर - बहुत दूर
मगर आज भी जब कभी मैं निगाहें बंद करता हूँ
अपने दिल की हर धड़कन में बस उसे महसूस करता हूँ
कैसी है ऐ मेरी मोहब्बत
मैं किस-किस को बताउं
पागल हो चूका हूँ मगर
पागलपन मैं कैसे छुपाऊं
करीब रहकर इतने जब समझ ना सके
वो मेरे दिल के जज्बात को
क्या ख़ाक समझेगी वो भला
इतने दूर रहकर मेरे हालात को
बस इतनी सी है सदा मेरे इस दिल की
वो फूल बनी रहे मेरे निगाहों के झील की
जब कभी मुझपर तन्हाई का बादल छाए
हर उस पल वो ख्वाब बनकर मेरी नजर में आये
ना कोई तमन्ना है ना कोई अब सपना है
लगता है जैसे मिलकर कोई बिछड़ गया अपना है
सदियों से जिसकी मेरे दिल को तलाश थी
मेरी पहली मोहब्बत की जो पहली एहसास थी
जुदा हो गया उनसे ही आज मैं
जिसके बिना मेरी जिन्दगी बिलकुल निराश थी।
परमार्थ सुमन
19 मई, 1998
लाल बिल्डिंग हाउस
11 PM
कफ़न
ना जख्म होंगे ना ही कोई आरजू होगी
मेरी चिताओं की जब लौ भी बुझ चुकी होगी
आएगी तब वो पास मेरे
इतना यकीं है दिल को
बैठकर मजार पर वो मेरे
बहाने लगेगी निगाहों से झील को
आएगी तब वो पास मेरे
इतना यकीं है दिल को !!१!!
ना कारवां होगा, ना ही कोई मंजिल होगी
मेरी जिन्दगी की जब सांसें भी थम चुकी होगी
डूबती हुई जब कश्ती दिल की
ढूंढ़एगी किसी साहिल को
आएगी तब वो पास मेरे
इतना यकीं है दिल को !!२!!
ना कोई करीब होगा ना ही कोई बेकरार होगी
दिल में मेरे जब हर एक जज्बात दफ़न होगी
इन्तजार करती हुई उसकी
फिर भी निगाहें "सुमन" होगी
ना जख्म होंगे ना ही कोई आरजू होगी
मेरी चिताओं की जब लौ भी बुझ चुकी होगी
आएगी तब वो पास मेरे
इतना यकीं है दिल को !!३!!
परमार्थ सुमन
9 अक्टूबर, 2000
IOCL बरौनी
10 PM
मेरी चिताओं की जब लौ भी बुझ चुकी होगी
आएगी तब वो पास मेरे
इतना यकीं है दिल को
बैठकर मजार पर वो मेरे
बहाने लगेगी निगाहों से झील को
आएगी तब वो पास मेरे
इतना यकीं है दिल को !!१!!
ना कारवां होगा, ना ही कोई मंजिल होगी
मेरी जिन्दगी की जब सांसें भी थम चुकी होगी
डूबती हुई जब कश्ती दिल की
ढूंढ़एगी किसी साहिल को
आएगी तब वो पास मेरे
इतना यकीं है दिल को !!२!!
ना कोई करीब होगा ना ही कोई बेकरार होगी
दिल में मेरे जब हर एक जज्बात दफ़न होगी
इन्तजार करती हुई उसकी
फिर भी निगाहें "सुमन" होगी
ना जख्म होंगे ना ही कोई आरजू होगी
मेरी चिताओं की जब लौ भी बुझ चुकी होगी
आएगी तब वो पास मेरे
इतना यकीं है दिल को !!३!!
परमार्थ सुमन
9 अक्टूबर, 2000
IOCL बरौनी
10 PM
इन्तजार
कैसें करूँ अफसाने बयां मैं हाल दिल के अपने
आज भी ढूंढ़ती हैं तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने
बेचैन सी नज़र को तेरा इंतज़ार क्यूं है?
दबी - दबी सी जुबान में तेरा ही नाम क्यूं है?
जख्मों को बना लिया है अब तो रहगुजर हमने
आज भी मगर ढूंढ़ती है तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने !!१!!
हर लम्हा तड़पते रहते हैं बस तेरे दीदार को
सीने से लगाकर आज तक रखा हमने तेरे इनकार को
जाने क्यूं फिर इस कदर नफ़रत किया हमसे तुमने
आज भी मगर ढूंढ़ती है तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने !!2!!
दफ़न हो गयी दिल में अब तो जीने की आस
दिल में कहीं कैद है मगर तेरी ही तलाश
कदम भी तेरे बढ़ रहें हैं अब किसी कि हमसफ़र बनने
आज भी मगर ढूंढ़ती है तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने !!3!!
ना जाने क्या कमी है इस "सुमन" में
अब तो हूँ परेशान मैं इसी उलझन में
आज भी मगर ढूंढ़ती है तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने !!4!!
परमार्थ सुमन
29 दिसम्बर, 2000
NICT Computer
AT 10:30 PM
आज भी ढूंढ़ती हैं तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने
बेचैन सी नज़र को तेरा इंतज़ार क्यूं है?
दबी - दबी सी जुबान में तेरा ही नाम क्यूं है?
जख्मों को बना लिया है अब तो रहगुजर हमने
आज भी मगर ढूंढ़ती है तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने !!१!!
हर लम्हा तड़पते रहते हैं बस तेरे दीदार को
सीने से लगाकर आज तक रखा हमने तेरे इनकार को
जाने क्यूं फिर इस कदर नफ़रत किया हमसे तुमने
आज भी मगर ढूंढ़ती है तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने !!2!!
दफ़न हो गयी दिल में अब तो जीने की आस
दिल में कहीं कैद है मगर तेरी ही तलाश
कदम भी तेरे बढ़ रहें हैं अब किसी कि हमसफ़र बनने
आज भी मगर ढूंढ़ती है तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने !!3!!
ना जाने क्या कमी है इस "सुमन" में
अब तो हूँ परेशान मैं इसी उलझन में
आज भी मगर ढूंढ़ती है तुम्हें मेरे टूटे दिल के सपने !!4!!
परमार्थ सुमन
29 दिसम्बर, 2000
NICT Computer
AT 10:30 PM
बुधवार, 21 अक्टूबर 2009
मुलाक़ात (पहली और आखिरी) - एक सच्ची मोहब्बत की अनकही सच्ची कहानी
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...................दिनांक : 29 नवम्बर, 2000
...................समय : 10.30 बजे सुबह
...................दिन : बुधवार
....................स्थान : आशीर्वाद होटल, बिस्टुपुर
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मेरी पहली और आखिरी मोहब्बत से यह मेरी पहली और आखिरी व्यक्तिगत मुलाकात थी। उससे मैं पिछले 6 वर्षों से एक तरफा मोहब्बत करता चला आ रहा था, यह जानने के बावजूद भी कि उसके दिल में मेरे लिए नफरतों का सैलाब भरा पड़ा है। वह मेरे जीवन में दिल कि धडकनों कि तरह समा चुकी थी, उससे मोहब्बत करके ही मैंने अपने जीवन को दुबारा जीना आरम्भ किया था। इस एक मुलाकात ने ही मेरी एक तरफा बेपनाह मोहब्बत की दिशा और दशा तय कर दी।
4 नवम्बर, 2000 (शनिवार) का दिन मेरे जीवन में भूचाल लेकर आया। यह दिन मेरे जीवन के लिए अप्रत्याशित और ऐतिहासिक रहा। मैं हर दिन की तरह ही NICT Computer में computer की classes ले रहा था तभी उसकी एक सहेली आई और मुझसे बोली की 'उसने आपको गुटखा खाने से मना किया है' यह सुनकर कुछ देर की लिए तो मैं विस्मित-सा हो गया और यह सोचने को विवश हो गया कि मेरी जिंदगी में ये क्या हो रहा है? जिस शख्स के दिल में मेरे लिए नफरतों के सिवा कुछ भी नहीं उसे मेरी जिंदगी कि अचानक इतनी फिक्र क्यों? अचानक ही मेरे दिल में दफ़न उसकी मोहब्बत आक्रोश से भर गई फ़िर स्वयं को सँभालने के बाद मैंने उसकी सहेली से कहा 'आकिर किस रिश्ते के तहत वो मुझसे गुटखा खाने को मना कर रही है?, यह मैं जानना चाहता हूँ।' मेरे इस सवाल पर उसकी सहेली ने मुझसे कहा 'यह तो मैं भी नहीं जानती हूँ' इसके बाद मैंने अपने इस सवाल का जवाब अपनी उस मोहब्बत से लेने के लिए मैंने उसकी सहेली को मुझसे एक बार उससे मिलाने का आग्रह किया। मेरे इस अनुरोध पर उसकी सहेली ने कहा 'मैं कोशिश करती हूँ।' और फ़िर वह चली गयी। इसकी कुछ दिनों बाद उसकी सहेली कंप्यूटर इंस्टिट्यूट आयी और मुझे मेरी मोहब्बत से मिलने की तारीख, समय तथा स्थान बताकर चली गयी।
तारीख 29 नवम्बर, 2000 समय 10.30 बजे और स्थान आर्शीवाद होटल बिस्टुपुर का पता चलते ही मेरे जीवन में मनो भूचाल-सा आ गया। अभी उससे मिलने को चार - पाँच दिन बाकी हैं मगर मेरी हालत क्या से क्या हो गयी है, यह मैं बता नही सकता। न तो कंप्यूटर की क्लास्सेस लेने का मन कर रहा है और ना ही किसी काम में मेरा मन लग रहा है, बस दिमाग उस तारीख, समय और स्थान पर जाकर स्थिर हो जा रही है जहाँ मुझे अपनी मोहब्बत से मिलने जाना है और फ़िर सोचने लगता है कि आख़िर मैं उस शख्स से मिलने की बाद क्या कहूँगा? क्या बातें करूँगा? जो मेरे दिल में धडकनों की तरह हर पल उफनती रहती है, जिसके बिना मैं अपने जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकता। आख़िर मैं उस शख्स से मिलने के बाद क्या-क्या बातें करूँगा? इसी सोच में मेरा दिन और मेरी रात गुजर रही थी। मेरे दिल की क्या हालत थी, मेरे दिल के अन्दर उस समय क्या कुछ घमासान मच रहा था, यह सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं ही जानता था।
यह सब कुछ होना वाजिब ही था क्योंकि मैं उस शख्स से मिलने जाने वाला था जो एक तरह से मेरी जिन्दगी की मंजिल थी, जिसपर मेरी जिन्दगी की सारी खुशियाँ निर्भर थी, वह भी मेरी पहली और आखिरी मोहब्बत से यह मेरी पहली और शायद आखिरी व्यक्तिगत मुलाकात होगी ये मैंने कभी सोचा ही नहीं था। इसी सब उथलपुथल में कब वह दिन आ गया इसका मुझे आभास ही नही हुआ।
सुबह जल्दी ही उठकर मैं कंप्यूटर इंस्टिट्यूट गया, वहां मैंने अनमने ढंग से एक क्लास ली। इस दौरान मेरे दिल का हाल बेहाल था। बाकी रातों की तरह ही पिछली रात भी मैंने इसी उधेड़बुन में गुजारी की आख़िर उस शख्स से मिलने के बाद मैं उससे क्या बातें करूँगा? जिससे मिलने की तमन्ना शायद मेरे दिल में सदियों से दफ़न थी, जिसका पल भर का दीदार मेरे अंतर्मन में लाखों-करोड़ों की संख्या में खुशियों का आवेश भर देता था। आख़िर आज उससे मिलने के बाद मैं उससे बात करूँगा तो क्या? उससे मिलने को निकलने के बावजूद अभी तक मैं यह तय नहीं कर पाया था कि उससे किस तरह की बातें करूँगा? इसी सोच में न जाने कब मैं उस स्थान आर्शीवाद होटल, बिस्टुपुर पंहुच गया जहाँ मुझे बुलाया गया था।
मैं होटल के अन्दर गया और अपनी निगाहें चारो तरफ़ दौडाई मगर मुझे मेरी मोहब्बत नज़र नहीं आई, इसके बाद मैं होटल के मुख्य दरवाजे के ठीक सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया और फ़िर मेरी नज़रें दरवाजे पर जाकर टिक गई। कुछ ही सेकेण्ड हुए होंगे की मेरी मोहब्बत अपनी उसी सहेली के साथ मेरी नज़रों के सामने आकर खड़ी हो गई। यह दृश्य मेरी लिए रोमांचित कर देने जैसा था। आज वह शख्स मुझसे मुलाकात करने आई थी जो मेरे दिल में धड़कन बनकर धड़क रही है, जो मेरी सांसों में हरपल अपनी यादों का रंग उडेल रही है, जो मेरी जिन्दगी का पर्याय बन चुकी है, जिसके बिना मेरी जिन्दगी आधी-अधूरी है, जिसकी यादों ने मुझे जीना सिखाया है, जिसकी मोहब्बत में मैं दीवानेपन की सारी सीमा को लाँघ चुका हूँ। आज वही मेरे सामने, मुझसे मुलाकात करने, मेरे बुलाने पर आयी है।
उन दोनों को अचानक यूँ सामने खड़ा देख मैं अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और उन दोनों से सामने की कुर्सियों पर बैठने का निवेदन किया। उन दोनों के कुर्सी पर बैठने के बाद मैं उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। इस दौरान मेरे चेहरे पर पसीने तर-बतर फ़ैल चुके थे, जबकि नवम्बर का सर्द माह चल रहा था।
मैं अभी कुर्सी पर ठीक से बैठा भी नही था कि मेरी मोहब्बत के एक सवाल 'क्या बात है? आपने मुझे क्यों बुलाया?' ने मेरे अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। इस एक सवाल ने मेरी मोहब्बत के भविष्य की पटकथा लिख डाली। इस सवाल ने मेरे उस उधेड़बुन को लगभग समाप्त ही कर दिया, जिससे मैं पिछले कई दिनों से परेशान था की मैं अपनी मोहब्बत से मिलने के बाद क्या बातें करूँगा? इस एक सवाल ने मेरी आने वाली जिन्दगी का रुख तय कर दिया।
मेरी मोहब्बत के इस सवाल का मैंने सहजता से जवाब देते हुए कहा 'कोई बात नही थी, बस मैं मानसिक रूप से बहुत ही परेशान था इसलिए आपका दीदार करना चाहता था।' मेरे इस जवाब को सुनकर उसने बड़े ही बेतुके अंदाज में कहा 'ठीक है, तब मैं चलती हूँ।' मैंने सर हिलाकर स्वीकृति भी दे दी और कहा 'ठीक है' अचानक ही हमारे बीच के संवाद में उसकी सहेली आ गयी और उसने कहा 'यह क्या हो रहा है? कुछ तो बात होगी जरुर जो आपने इसे मिलने को बुलाया, शायद आपदोनों को मुझसे कुछ परेशानी हो रही है, इसलिए मैं कुछ देर के लिए बाहर जा रही हूँ, आप दोनों बात कर लें।' इतना कहकर वो होटल से बाहर निकल गयी।
उसके बाहर चले जाने के बाद मेरी मोहब्बत ने फ़िर वही सवाल मुझसे पूछा 'क्या बात है? आपने मुझे क्यों बुलाया?' इस बार मेरा जवाब उसे नहीं मिला, मैं खामोशी से उसकी निगाहों को पढने की असफल कोशिश कर रहा था। वह कुछ पल शांत बैठी रही फ़िर मुझसे बोली, 'अच्छा तो मैं चलती हूँ।' मैंने मुस्कुराने का प्रयास किया और धीमे स्वर में उससे कहा 'ठीक है' यह सुनकर वह कुर्सी छोड़कर उठाने को ही थी की मैंने आवेश में आकर उससे कहा, 'तुमने किस रिश्ते के तहत मुझसे गुटखा खाने को मना किया?' मेरे इस अचानक पूछे गए सवाल पर वह गंभीर हो गयी। कुर्सी पर दुबारा बैठते हुए उसने कहा 'इंसानियत के नाते' इस तरह का जवाब सुनकर मैं अन्दर से पुरी तरह से टूट गया, मेरे दिल में बचे-खुचे जो अरमानों के ढेर थे, वे भी जबरदस्त धमाकों के साथ तत्क्षण ही बिखर गए। मेरे दिल में भयानक पीड़ा की अनुभूति हो रही थी, मेरा पूरा शरीर धधकते हुए ज्वालामुखी की तरह कांप रहा था, ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अंदर ही अंदर ज्वालामुखी फट चुका है और उसके गर्म अंगारे मेरे पूरे शरीर में रक्त बनकर दौड़ रही है। क्या यही मेरी उस मोहब्बत का प्रतिफल था? जिसकी आग में मैं पिछले 6 वर्षों से स्वयं को जलाता आ रहा था। इस दौरान ना तो मैंने कभी उससे मुलाक़ात करने की ख्वाहिश की और ना ही कभी किसी प्रकार की कोई जबरदस्ती या बदतमीजी उसके साथ की। बस मैं अपनी अलग जिंदगी में उसकी यादों को अपने दिल में लिए जीने की कोशिश कर रहा था। मुझे भरोसा था की कभी न कभी मेरी मोहब्बत पर उसका पत्थर दिल जरुर पिघलेगा।
...................दिनांक : 29 नवम्बर, 2000
...................समय : 10.30 बजे सुबह
...................दिन : बुधवार
....................स्थान : आशीर्वाद होटल, बिस्टुपुर
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मेरी पहली और आखिरी मोहब्बत से यह मेरी पहली और आखिरी व्यक्तिगत मुलाकात थी। उससे मैं पिछले 6 वर्षों से एक तरफा मोहब्बत करता चला आ रहा था, यह जानने के बावजूद भी कि उसके दिल में मेरे लिए नफरतों का सैलाब भरा पड़ा है। वह मेरे जीवन में दिल कि धडकनों कि तरह समा चुकी थी, उससे मोहब्बत करके ही मैंने अपने जीवन को दुबारा जीना आरम्भ किया था। इस एक मुलाकात ने ही मेरी एक तरफा बेपनाह मोहब्बत की दिशा और दशा तय कर दी।
4 नवम्बर, 2000 (शनिवार) का दिन मेरे जीवन में भूचाल लेकर आया। यह दिन मेरे जीवन के लिए अप्रत्याशित और ऐतिहासिक रहा। मैं हर दिन की तरह ही NICT Computer में computer की classes ले रहा था तभी उसकी एक सहेली आई और मुझसे बोली की 'उसने आपको गुटखा खाने से मना किया है' यह सुनकर कुछ देर की लिए तो मैं विस्मित-सा हो गया और यह सोचने को विवश हो गया कि मेरी जिंदगी में ये क्या हो रहा है? जिस शख्स के दिल में मेरे लिए नफरतों के सिवा कुछ भी नहीं उसे मेरी जिंदगी कि अचानक इतनी फिक्र क्यों? अचानक ही मेरे दिल में दफ़न उसकी मोहब्बत आक्रोश से भर गई फ़िर स्वयं को सँभालने के बाद मैंने उसकी सहेली से कहा 'आकिर किस रिश्ते के तहत वो मुझसे गुटखा खाने को मना कर रही है?, यह मैं जानना चाहता हूँ।' मेरे इस सवाल पर उसकी सहेली ने मुझसे कहा 'यह तो मैं भी नहीं जानती हूँ' इसके बाद मैंने अपने इस सवाल का जवाब अपनी उस मोहब्बत से लेने के लिए मैंने उसकी सहेली को मुझसे एक बार उससे मिलाने का आग्रह किया। मेरे इस अनुरोध पर उसकी सहेली ने कहा 'मैं कोशिश करती हूँ।' और फ़िर वह चली गयी। इसकी कुछ दिनों बाद उसकी सहेली कंप्यूटर इंस्टिट्यूट आयी और मुझे मेरी मोहब्बत से मिलने की तारीख, समय तथा स्थान बताकर चली गयी।
तारीख 29 नवम्बर, 2000 समय 10.30 बजे और स्थान आर्शीवाद होटल बिस्टुपुर का पता चलते ही मेरे जीवन में मनो भूचाल-सा आ गया। अभी उससे मिलने को चार - पाँच दिन बाकी हैं मगर मेरी हालत क्या से क्या हो गयी है, यह मैं बता नही सकता। न तो कंप्यूटर की क्लास्सेस लेने का मन कर रहा है और ना ही किसी काम में मेरा मन लग रहा है, बस दिमाग उस तारीख, समय और स्थान पर जाकर स्थिर हो जा रही है जहाँ मुझे अपनी मोहब्बत से मिलने जाना है और फ़िर सोचने लगता है कि आख़िर मैं उस शख्स से मिलने की बाद क्या कहूँगा? क्या बातें करूँगा? जो मेरे दिल में धडकनों की तरह हर पल उफनती रहती है, जिसके बिना मैं अपने जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकता। आख़िर मैं उस शख्स से मिलने के बाद क्या-क्या बातें करूँगा? इसी सोच में मेरा दिन और मेरी रात गुजर रही थी। मेरे दिल की क्या हालत थी, मेरे दिल के अन्दर उस समय क्या कुछ घमासान मच रहा था, यह सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं ही जानता था।
यह सब कुछ होना वाजिब ही था क्योंकि मैं उस शख्स से मिलने जाने वाला था जो एक तरह से मेरी जिन्दगी की मंजिल थी, जिसपर मेरी जिन्दगी की सारी खुशियाँ निर्भर थी, वह भी मेरी पहली और आखिरी मोहब्बत से यह मेरी पहली और शायद आखिरी व्यक्तिगत मुलाकात होगी ये मैंने कभी सोचा ही नहीं था। इसी सब उथलपुथल में कब वह दिन आ गया इसका मुझे आभास ही नही हुआ।
सुबह जल्दी ही उठकर मैं कंप्यूटर इंस्टिट्यूट गया, वहां मैंने अनमने ढंग से एक क्लास ली। इस दौरान मेरे दिल का हाल बेहाल था। बाकी रातों की तरह ही पिछली रात भी मैंने इसी उधेड़बुन में गुजारी की आख़िर उस शख्स से मिलने के बाद मैं उससे क्या बातें करूँगा? जिससे मिलने की तमन्ना शायद मेरे दिल में सदियों से दफ़न थी, जिसका पल भर का दीदार मेरे अंतर्मन में लाखों-करोड़ों की संख्या में खुशियों का आवेश भर देता था। आख़िर आज उससे मिलने के बाद मैं उससे बात करूँगा तो क्या? उससे मिलने को निकलने के बावजूद अभी तक मैं यह तय नहीं कर पाया था कि उससे किस तरह की बातें करूँगा? इसी सोच में न जाने कब मैं उस स्थान आर्शीवाद होटल, बिस्टुपुर पंहुच गया जहाँ मुझे बुलाया गया था।
मैं होटल के अन्दर गया और अपनी निगाहें चारो तरफ़ दौडाई मगर मुझे मेरी मोहब्बत नज़र नहीं आई, इसके बाद मैं होटल के मुख्य दरवाजे के ठीक सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया और फ़िर मेरी नज़रें दरवाजे पर जाकर टिक गई। कुछ ही सेकेण्ड हुए होंगे की मेरी मोहब्बत अपनी उसी सहेली के साथ मेरी नज़रों के सामने आकर खड़ी हो गई। यह दृश्य मेरी लिए रोमांचित कर देने जैसा था। आज वह शख्स मुझसे मुलाकात करने आई थी जो मेरे दिल में धड़कन बनकर धड़क रही है, जो मेरी सांसों में हरपल अपनी यादों का रंग उडेल रही है, जो मेरी जिन्दगी का पर्याय बन चुकी है, जिसके बिना मेरी जिन्दगी आधी-अधूरी है, जिसकी यादों ने मुझे जीना सिखाया है, जिसकी मोहब्बत में मैं दीवानेपन की सारी सीमा को लाँघ चुका हूँ। आज वही मेरे सामने, मुझसे मुलाकात करने, मेरे बुलाने पर आयी है।
उन दोनों को अचानक यूँ सामने खड़ा देख मैं अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और उन दोनों से सामने की कुर्सियों पर बैठने का निवेदन किया। उन दोनों के कुर्सी पर बैठने के बाद मैं उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। इस दौरान मेरे चेहरे पर पसीने तर-बतर फ़ैल चुके थे, जबकि नवम्बर का सर्द माह चल रहा था।
मैं अभी कुर्सी पर ठीक से बैठा भी नही था कि मेरी मोहब्बत के एक सवाल 'क्या बात है? आपने मुझे क्यों बुलाया?' ने मेरे अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। इस एक सवाल ने मेरी मोहब्बत के भविष्य की पटकथा लिख डाली। इस सवाल ने मेरे उस उधेड़बुन को लगभग समाप्त ही कर दिया, जिससे मैं पिछले कई दिनों से परेशान था की मैं अपनी मोहब्बत से मिलने के बाद क्या बातें करूँगा? इस एक सवाल ने मेरी आने वाली जिन्दगी का रुख तय कर दिया।
मेरी मोहब्बत के इस सवाल का मैंने सहजता से जवाब देते हुए कहा 'कोई बात नही थी, बस मैं मानसिक रूप से बहुत ही परेशान था इसलिए आपका दीदार करना चाहता था।' मेरे इस जवाब को सुनकर उसने बड़े ही बेतुके अंदाज में कहा 'ठीक है, तब मैं चलती हूँ।' मैंने सर हिलाकर स्वीकृति भी दे दी और कहा 'ठीक है' अचानक ही हमारे बीच के संवाद में उसकी सहेली आ गयी और उसने कहा 'यह क्या हो रहा है? कुछ तो बात होगी जरुर जो आपने इसे मिलने को बुलाया, शायद आपदोनों को मुझसे कुछ परेशानी हो रही है, इसलिए मैं कुछ देर के लिए बाहर जा रही हूँ, आप दोनों बात कर लें।' इतना कहकर वो होटल से बाहर निकल गयी।
उसके बाहर चले जाने के बाद मेरी मोहब्बत ने फ़िर वही सवाल मुझसे पूछा 'क्या बात है? आपने मुझे क्यों बुलाया?' इस बार मेरा जवाब उसे नहीं मिला, मैं खामोशी से उसकी निगाहों को पढने की असफल कोशिश कर रहा था। वह कुछ पल शांत बैठी रही फ़िर मुझसे बोली, 'अच्छा तो मैं चलती हूँ।' मैंने मुस्कुराने का प्रयास किया और धीमे स्वर में उससे कहा 'ठीक है' यह सुनकर वह कुर्सी छोड़कर उठाने को ही थी की मैंने आवेश में आकर उससे कहा, 'तुमने किस रिश्ते के तहत मुझसे गुटखा खाने को मना किया?' मेरे इस अचानक पूछे गए सवाल पर वह गंभीर हो गयी। कुर्सी पर दुबारा बैठते हुए उसने कहा 'इंसानियत के नाते' इस तरह का जवाब सुनकर मैं अन्दर से पुरी तरह से टूट गया, मेरे दिल में बचे-खुचे जो अरमानों के ढेर थे, वे भी जबरदस्त धमाकों के साथ तत्क्षण ही बिखर गए। मेरे दिल में भयानक पीड़ा की अनुभूति हो रही थी, मेरा पूरा शरीर धधकते हुए ज्वालामुखी की तरह कांप रहा था, ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अंदर ही अंदर ज्वालामुखी फट चुका है और उसके गर्म अंगारे मेरे पूरे शरीर में रक्त बनकर दौड़ रही है। क्या यही मेरी उस मोहब्बत का प्रतिफल था? जिसकी आग में मैं पिछले 6 वर्षों से स्वयं को जलाता आ रहा था। इस दौरान ना तो मैंने कभी उससे मुलाक़ात करने की ख्वाहिश की और ना ही कभी किसी प्रकार की कोई जबरदस्ती या बदतमीजी उसके साथ की। बस मैं अपनी अलग जिंदगी में उसकी यादों को अपने दिल में लिए जीने की कोशिश कर रहा था। मुझे भरोसा था की कभी न कभी मेरी मोहब्बत पर उसका पत्थर दिल जरुर पिघलेगा।
मुझे याद है वर्ष 1994 में जब मैं इंटर 1st year का स्टुडेंट था, उसी समय से मेरे दिल में उसकी तस्वीर समाई थी। मेरे घर के बगल में रहने वाली उस लड़की ने मेरे जीवन में एक नयी जिंदगी की तरह दस्तक दी। उसकी निगाहों में मैंने एक नयी जिंदगी का सवेरा महसूस किया। उस दौरान ना जाने मुझे क्या हो गया था कि हर वक्त उसके ख्यालों में खोया-खोया सा रहने लगा था। उसी वर्ष मैंने अपनी मोहब्बत का इकरार करने के लिए एक प्रेम-पत्र लिखकर उसे देने की असफल कोशिश भी की थी, मगर मेरे उस पत्र को उसने मुस्कुराते हुए लेने से इंकार कर दिया था और फ़िर दूसरे ही दिन अपनी सहेलियों के बीच मुझे बुलाकर 'हम आपको पसंद नहीं करते' तक कह दिया था। इसके बाद से मैंने उसके सामने तक जाना छोड़ दिया था। उसका सामना तक करने की हिम्मत मुझमें बची नहीं थी। मैं टूट चुका था मगर मेरे दिल में उसकी मोहब्बत दिन प्रतिदिन बदती ही रही। मैं उसकी मोहब्बत की तपिश में जलता हुआ उसके ख्यालों में रहगुजर करता हुआ जीवन के लम्हों को काटता रहा। इसी दौरान वर्ष 1997 में मैंने अपने घर से कुछ ही दूरी पर स्थित एक कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में कंप्यूटर टीचर के रूप में कार्य करना आरम्भ कर दिया, उसी दौरान उसके पिताजी का प्रमोशन होने के कारण दिनांक 19.05.1998 को वह मेरे पड़ोस के घर से जगह बदलकर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दूसरे घर में चली गयी। इसके बाद तो मैं उसके पल भर के दीदार तक को तरसता रहा। दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा या किसी खास त्यौहार/पर्व के दौरान ही उसकी झलक कभी-कभार देख पता था। अक्सर रातों को मैं बेचैन होकर अकेला उसके घर की तरफ़ निकल जाता, जो मेरे घर से तक़रीबन 2 किलोमीटर दूर था। वहां आने-जाने के दौरान मैं उन राहों को सजदा करता रहता जिन पर उसके कदम पड़ते थे। मात्र उसकी एक झलक पाने के लिए मैं सुबह 4.30 बजे मोर्निंग वॉक के लिए भी निकलता और उसके घर के बगल से गुजरता, क्योंकि सुबह 5 बजे वह मानु दा के यहाँ टूशन पढने घर से निकलती थी। मैं शब्दों में उन एहसासों को नहीं उतार सकता की मुझे उस दौरान कितनी आत्मा-संतुष्टि मिलती थी। बीते 6 वर्षों (1994 से 2000 ) से मैं उसकी एक तरफा मोहब्बत में पागल-सा हो चुका था। इस दौरान मैंने अपने दिल में उसके प्यार की अग्नि जलाकर, उसके प्यार को ही अपनी जिंदगी मानकर, जीता रहा इस आस में कि कभी तो मेरी सच्ची मोहब्बत का मुझे सिला मिलेगा। इस दौरान मैंने दीवानेपन की सारी सीमाएं लाँघ दी थी, मैंने अपने दिल में दफ़न एक तरफा मोहब्बत को इबादत तक का रूप दे दिया था। अब तो मेरी मोहब्बत ने दिल से दिमाग तक का सफर पूरा कर लिया था। इन वर्षों के दौरान कई एक लम्हे आए, नया साल, उसका जन्मदिन, जब मेरे दिल में उसे शुभकामनायें देने की आरजू हुई, मगर मैंने अपने तड़पते-बिलखते ह्रदय को उस वक्त कैसे शांत किया, यह केवल मैं ही जानता हूँ। यह अलग बात है की मैं अपनी मोहब्बत का सालगिरह हर वर्ष 6 फरवरी को कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में मनाता था और ईश्वर से उसके सुखमय जीवन की कामना करता था। इस दौरान मैं स्वयं ही केक काटता और खाता था तथा मेरे इस पागलपन के गवाह कंप्यूटर इंस्टिट्यूट के संचालक श्री किशोर कुमार यादव और कभी-कभी मेरा दोस्त लिजु जोसेफ भी बनते थे। इस दौरान इतना कुछ हुआ कि जो भी लोग मुझे जानते थे चाहे वे मेरे मित्र हों, स्टुडेंट हों या कोई और वे मेरी मोहब्बत को भी मेरे पागलपन की वजह से जान लेते थे। मैंने कभी किसी को अपनी मोहब्बत के बारे में नहीं बताया मगर ना जाने क्यूं जब भी कोई नया मित्र बनता या नया स्टुडेंट आता तो मेरे नाम को सुनने के बाद स्वतः ही मेरी मोहब्बत का नाम ले लेता।
इस दौरान मेरे जीवन में हांलाकि कई एक लड़कियों ने दस्तक दी, यह जानने के बाद भी कि मैं किसी और को बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ, उन सबों ने अपने-अपने तरीकों से मुझे अपनी मोहब्बत का एहसास कराने की कोशिश भी की मगर मैं तो किसी और की यादों में बेसुध होकर पड़ा रहा। मुझे उस मोहब्बत से फुर्सत ही कहाँ मिली जो मैं किसी और के बारे मैं कुछ भी सोच सकता।
इस दौरान मेरे जीवन में हांलाकि कई एक लड़कियों ने दस्तक दी, यह जानने के बाद भी कि मैं किसी और को बेइंतहा मोहब्बत करता हूँ, उन सबों ने अपने-अपने तरीकों से मुझे अपनी मोहब्बत का एहसास कराने की कोशिश भी की मगर मैं तो किसी और की यादों में बेसुध होकर पड़ा रहा। मुझे उस मोहब्बत से फुर्सत ही कहाँ मिली जो मैं किसी और के बारे मैं कुछ भी सोच सकता।
पहले की ही तरह सब कुछ चल रहा था कि अचानक 4 नवम्बर, 2000 को उसकी सहेली कंप्यूटर इंस्टिट्यूट आई और मुझसे बोली 'उसने आपको गुटखा खाने से मना किया है' इतना कहकर वो चली गई मगर अपने पीछे छोड़ गई एक सवाल, जिसका जवाब मुझे किसी भी सूरत में चाहिए था। वह सवाल था, आख़िर किस रिश्ते के तहत उसने मुझसे गुटखा खाने से मना किया है? मैं आख़िर उसका कौन हूँ? मेरे दिल में आग लग चुकी थी।
यह पूरी तरह से सही बात थी कि उस समय मैं रोजाना ही 15 से 20 गुटखा खाया करता था इसी वजह से मुझे अक्सर ही शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था। यह बात मेरे सभी दोस्तों को पता थी और सभी मुझे गुटखा खाने से मना भी करते रहते थे मगर मैं लापरवाह बनकर सबों की बातें अनसुनी करता चला आ रहा था। मगर आज मैं यह बात सोचने पर विवश था की मेरे गुटखा खाने से, मुझे शारीरिक परेशानी होने से, उस शख्स को क्या मतलब? जिसके दिल में मेरे प्रति नफरतों के सिवा कुछ भी नहीं। यह सवाल मेरे अंतर्मन को बार-बार कचोट रहा था जिसका जवाब मेरी मोहब्बत के सिवा और किसी के पास नही था। मेरी मोहब्बत, पहली मोहब्बत, जो मेरी जिन्दगी का आइना थी और यह भी कटु सत्य था की वह मुझसे उतना ही नफ़रत करती थी जितना की मैं उससे मोहब्बत, तो फ़िर आख़िर क्या वजह थी जो उसने मुझे गुटखा खाने से मना किया, क्या कहीं उसके दिल में भी मेरे लिए कोई जगह ...................? यही वह सवाल था जिसका जवाब हासिल करने के लिए मैंने उसकी सहेली से मेरी मोहब्बत को मिलाने की विनती की थी और फ़िर मुलाकात की तारीख का पता चलते ही मेरे दिल में यही बात बार-बार उठने लगा की मैं उससे मिलने के बाद क्या बात करूँगा, क्या नहीं करूँगा? कभी सोचता कि उससे मिलने पर अपने दिल में दफ़न उसकी मोहब्बत के हर पैगाम को उसे सुना दूंगा, तो कभी सोचता कि ऐसा नहीं करूँगा, अपनी बीती जिन्दगी के किसी फ़साने का जिक्र तक उससे नहीं करूँगा, सिर्फ़ मुलाकात कर, उसका दीदार कर, कुछ बातें इधर-उधर की करने के बाद वापस आ जाऊंगा।
इसी उधेड़बुन में घिरकर अंततः मैं अपनी मोहब्बत से मिलने आ पंहुचा था कि, उसके द्बारा पूछे गए पहले ही सवाल 'क्या बात है?, आपने मुझे क्यों बुलाया है?' ने मेरी मोहब्बत के भविष्य की दिशा और दशा तय कर दी। इस एक सवाल ने मेरे उस उधेड़बुन को भी समाप्त कर दिया, जो पिछले कई दिनों से मेरे मन को कचोट रहा था। तत्क्षण ही मैंने स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए अपनी तरफ़ से मामले को समेटने का प्रयास किया, मगर जब वह कुर्सी छोड़कर उठने को थी, मेरे दिल में दफ़न उसकी मोहब्बत ने आक्रोशित होकर आखिरकार उससे पूछ ही लिया, 'आपने किस रिश्ते के तहत मुझे गुटखा खाने से मना किया था?' मेरे इस सवाल का जवाब देते हुए उसने जब 'इंसानियत के नाते' कहा तो फ़िर मैं स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सका और अनियंत्रित होकर कंपकंपाते होठों से मैंने उससे कहा 'यदि आपको इंसानियत ही दिखानी है तो अपने घर की पीछे की बस्ती में जहाँ बहुत सारे लूल्हे - लंगड़े रहते हैं, जिनका कोई अपना नहीं है, उनपर इंसानियत दिखाएँ, मुझ पर नहीं, मेरे माता-पिता, भाई-बहन हैं' इतना कहकर मैं कुछ क्षण शांत रहा फ़िर मैंने कहना शुरू किया, 'आपका मुझपर कोई हक़ नहीं, क्यूंकि हक़ वहां बनता है जहाँ मोहब्बत होती है। मेरा हक़ बाकायदा आपके ऊपर है, क्योंकि मैं आपसे मोहब्बत करता हूँ।' मैंने यह सारी बातें एक स्वर में ही उससे कह डाली। मेरी बातों को सुनकर वह खामोश ही रही। कुछ देर बाद वह बोली, 'एक बात कहूँ?' मैंने उसकी निगाहों में निगाहें डालते हुए कहा, 'हाँ बोलो!' उसने कहा, 'आप मुझे भूल जाइए' मैंने कहा, 'क्या करूँ? भुला ही नहीं पता हूँ'। यह सुनकर वह बोली, 'आप शादी कर लीजिये' कुछ देर खामोश रहने के बाद मैंने कहा, 'वो भी करके देख लूँगा'। हमारे बीच बातचीत चल ही रही थी की उसकी सहेली वापस आ गई और कुर्सी पर बैठते हुए बोली, 'क्या बात है? जब तक मैं थी आप दोनों के मुंह खुल ही नहीं रहे थे और अभी मैं दूर से देखती आ रही हूँ कि आप दोनों के मुंह तो बंद ही नहीं हो रहे'। इतना सुनना था की मैं और मेरी मोहब्बत दोनों हंसने लगे। इसके बाद मैंने अपनी मोहब्बत से पूछा, 'मुझमे क्या कमी है, जो तुम मुझे नापसंद करती हो?' कुछ देर शांत रहने के बाद उसने कहा, 'आप बिहारी हैं!'। इसके बाद उसकी सहेली ने मुझसे कहा, 'आप इनसे दोस्ती क्यों नहीं कर लेते हैं?, इसको आपसे दोस्ती करने में कोई एतराज नही' इस पर मैंने कहा, 'नहीं मैं मोहब्बत के रिश्ते को दोस्ती में परिवर्तित नहीं कर सकता' इसके बाद हमलोगों ने नाश्ता किया और फ़िर मेरी मोहब्बत अपनी सहेली के साथ होटल से निकल गई।
उन दोनों के होटल से वापस जाने के बाद मैं होटल की कुर्सी पर असमजंस की हालत में बैठा रहा और यही सोचता रहा की आख़िर मेरी मोहब्बत अधूरी क्यूं रह गई? आज की मुलाकात ने मुझे अपनी मोहब्बत की स्थिति का स्पष्ट आभास करा दिया। मेरी मोहब्बत ने अस्पष्ट रूप से ही सही लेकिन मुझे मेरी मोहब्बत का अंजाम मुझे बता दिया। उसकी मोहब्बत में बिताये हुए लम्हे अब मुझे बेमानी प्रतीत हो रहे थे। आज मैं पूरी तरह से टूट कर बिखर गया। उसने तो मेरा वह इंतजार भी समाप्त कर दिया जिसको आधार मानकर मैं जीवन के लम्हे बीता रहा था। मैं नहीं जानता मेरी मोहब्बत मैं क्या खामियां थी, बस इतना जानता हूँ कि मेरे दिल से उसकी मोहब्बत कभी ख़त्म नहीं होगी, हाँ मेरी अधूरी एकतरफा मोहब्बत मुझे ताउम्र दम तोड़ती नजर जरूर आएगी।
===================समाप्त===
30 अप्रैल 2025, को मेरी शादी के लगभग 23 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन मेरे दिल की धडकनों पर आज भी उसकी यादें काबिज है, बदलते वक्त में पहले और आज के दौरान बहुत कुछ फर्क हुआ है, पहले उसका दीदार करने की अभिलाषा रहती थी, मगर अब वह अभिलाषा भी नहीं रही। जन्म जन्मांतर की बात तो बहुत दूर की है, मैं तो बस रोजाना ही दिल से अपनी उसको दुआएं देता रहता हूँ, खुशहाल जीवन की। मुझे पता नहीं ये मेरे हृदय के एहसास कैसे हैं, ना जाने क्यूं आज के इस ज़माने में मैं इतिहास की तरह जी रहा हूँ। बस मुझे इतना यकीं हैं समूचा जीवन उसकी तपिश में मैं जलता जरूर रहूँगा।
अब ना जाने क्यों उसके दीदार से डरता हूँ? ना जाने क्यूं अब मुझे खुदपर भरोसा ही नहीं रहा, पता नहीं उसे देखने के बाद मैं ख़ुद को संभल नहीं पायूं। यही कारण है कि उसके जमशेदपुर आने की खबर का पता चलते ही मैं बेचैन हो जाता हूँ। मैं अपने-आप से ही छुपने लगता हूँ। कोई नहीं, कहीं कोई नहीं जो मुझे इस दुविधा से उबार सके, शायद मेरे कर्मों का सिला है, जिन्दगी है पास मगर फ़िर भी जीने की है तलाश। वर्तमान में मैं दोहरा जीवन जीने को बाध्य हूँ। जो दिखता हूँ वो अब मैं वह हूँ ही नहीं और जो मैं अब हूँ वो अब मैं दिखता ही नहीं।
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हे परमपिता परमेश्वर, उसे हर वो खुशी देना जिसके खवाब वो देखती हो।
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